सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को जनसंख्या-नियंत्रण नीतियों पर बड़े पैमाने पर फिर से सोचने का संकेत दिया है. यह देखते हुए कि दो से ज्यादा बच्चों वाले परिवारों को सजा देने वाले कानून अब काम के नहीं रहे, क्योंकि भारत एक बूढ़े होते समाज की ओर बढ़ रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कि ज्यादा जनसंख्या का डर जो कभी ऐसे उपायों को सही ठहराता था वह पिछले दशक में खत्म हो गया है. अदालत ने गौर किया कि प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर (रिप्लेसमेंट लेवल) से भी नीचे चली गई है. ऐसी स्थिति में जनसांख्यिकीय बदलाव (डेमोग्राफिक सिफ्ट) का माहौल तैयार हो रहा है, जिससे भविष्य में आबादी की उम्र बढ़ेगी और काम करने वाली उम्र के लोगों की हिस्सेदारी कम हो जाएगी. यह फैसला जस्टिस पीएस नरसिम्हा की अगुवाई वाली और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने सुनाया. याचिकाकर्ता को महाराष्ट्र ग्राम पंचायत एक्ट 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच ने अपने तीसरे बच्चे के जन्म के बाद अयोग्य ठहराया था. महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत 13 सितंबर 2000 को यह नियम लागू हुआ था कि यदि किसी व्यक्ति को इस तारीख या उसके बाद तीसरा बच्चा पैदा होता है, तो वह ग्राम पंचायत का सदस्य या सरपंच बनने अथवा चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना जाएगा. 1959 के इस अधिनियम में 13 सितंबर, 2000 से जब इस कानून में संशोधन लागू हुआ था. दो से अधिक बच्चे होने पर रोक लगा दी गई थी.