लंका युद्ध के अंतिम पहर में रावण ने एक ऐसा गुप्त 'चंडी यज्ञ' रचा था, जिसके सफल होते ही वानर सेना का विनाश तय था।
नियम यह था कि रावण आसन से हिल नहीं सकता था।
वानरों के उत्पात के बाद भी जब रावण टस से मस न हुआ, तब महाबली हनुमान एक मासूम ब्राह्मण बालक बनकर पहुंचे। उन्होंने पुरोहितों की सेवा कर दक्षिणा में मंत्र का केवल एक
अक्षर बदलवा दिया:
👉 'हरिणी' (दुखों को हरने वाली) ➡️ 'कारिणी' (विनाश करने वाली)
जैसे ही अंतिम आहुति पड़ी, महाकाली रावण पर प्रसन्न होने के बजाय प्रचंड क्रोध में प्रकट हो गईं और रावण का समूचा तंत्र छिन्न-भिन्न हो गया।
शास्त्र कहते हैं कि जहां छल और अधर्म हो, वहां ईश्वर की बुद्धि ही सबसे बड़ा अस्त्र बनती है।
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