00:12ुडिशा केंद्रपाडा की इपसिता स्वाई आज सिर्फ ग्रहनी नहीं बल्कि एक सफल एग्रिप्रेमियोर है
00:20इपसिता की कहानी साल 2010 में शुरू हुई
00:24शादी के बाद उनका ज्यादतर वक्त घर ग्रहस्ती में गुजरता था
00:28फिर मशुरूम की खेती ने उनका ध्यान खीचा
00:32कम निवेश, कम जगह और बहतर कमाई की संभावना देखकर
00:37इपसिता ने मशुरूम उत्पादन की शुरूआती जानकारी लेकर ट्रेनिंग हासिल की
00:42और धीरे धीरे एक छोटा प्रयोग काम्याब कारोबार में बदल गया
00:49एक बेड से आमतोर पर 800 ग्राम से एक किलो तक मशुरूम निकलता है
00:54और कभी कभी उत्पादन सवा किलो तक पहुँच जाता है
00:57एक बेड तयार करने में करीब 60 रुपे खर्च होते हैं
01:01और लगबग 40 रुपे तक मुनाफ़ा हो सकता है
01:04धान की पराली से बेड तयार होते हैं
01:06पराली को मशीन से काटा जाता है
01:09करीब 12 घंटे पानी में भिगोया जाता है
01:12फिर चूने से ट्रीट किया जाता है
01:15इसके बाद पराली मश्रूम स्पॉन, ब्रान और थोड़े बेसन की मदद से बेड तयार किये जाते हैं
01:22और करीब 10 दिन बाद शुरू हो जाती है मश्रूम की फसर।
01:26लेकिन इपसिता के सफर में मुश्किले भी आई।
01:29बाहर से खरीदे गए खराब कॉलिटी के स्पॉन की वजह से कई बार मश्रूम बेड खराब हो गए।
01:36तब ही केवीके की विज्ञानिक ने उन्हें खुद स्पॉन तयार करने की सलहा दी।
01:41जिसके बाद साल 2020 में इपसिता ने मशीन खरी दी और शुरू कर दिया अपना स्पॉन प्रोडक्शन।
01:49अब यही स्पॉन दूसरे किसानों और महिलाओं को भी दिया जाता है।
01:54हमारा कारोबार केंदरा पाड़ा से निकल कर कटक, जाजपूर, जगत सिंगपूर और खुरदा तक पहुँच चुका है।
02:01मैंने 500 से जादा महिलाओं को ट्रेनिंग दिये, करीब 200 किसान और मश्रूम उत्पादक नियमे तोर पर हमसे मश्रूम और
02:09स्पॉन खरीदते हैं।
02:11इपसिता के कारोबार से सिर्फ उनका परिवार नहीं चलता, उनके फार्म में 6 लोग काम करते हैं।
02:17वहां काम करने वाली महिलाओं को करीब 9,000 रुपे महिने की सालरी मिलती है।
02:22पती और तीन बच्चे भी इस काम में उनका साथ देते हैं।
02:26अपने काम के लिए उन्हें Best Agripreneur Award भी मिल चुका है।
02:31इपसिता स्वाई की कहानी सिर्फ मश्रून की खेती की कहानी नहीं।
02:35ये उस सोच की कहानी है जहां रसोई से निकले हाथ कारोबार समहलते हैं।
02:41ETV भारत के लिए उडिशा के केंदर पाड़ा से राधाकांत मोहंती की रिपोर्ट।