00:00बंध मत जाना हमारी परंपरा कहती है कि बहता पानी निर्मला बंधा गंदा होय और साधु जन रमता भला दाग
00:10न लागे कोय तो बहते पानी जैसे रहो जिसे हिमाले की हमारी पहाड़ी नदियां होती है बहती जा रही है
00:19दृत गती से बहती जा रही है उन्हें कोई रोक के �
00:23वो चंचलता नहीं है वो प्रकृति का सहज प्रवाह है और अगर आप उसको चंचलता कहना चाहते हो तो फिर
00:29मैं कहूंगा कि काश वैसी चंचलता बुढ़ों में भी रह
00:34वो चंचलता तो प्रक्रतिजन्ने है वो चंचलता कभी नहीं रुकनी चाहिए
00:39रुक जाने थम जाने को जीवन नहीं कहते आप बढ़ते रहिए बहते रहिए
00:43और कम से कम जवानी में ही जल्दी से बहुत गहरे फैसले करके आगे का मार्ग अपना अवरुद्ध मत कर
00:52लीजिए