00:00मुंबई में गनेश उत्सों के शुरुवात होते ही शहर की गलियों से लेकर बड़े-बड़े पंडालों तक भक्ती का रंग
00:06दिखाई देने लगा है।
00:08लेकिन इस बार मुंबई के एक बेहद खास गनपती पंडाल में पहुँचे अडानी परिवार ने सब का ध्यान खीचा है।
00:15अडानी एंटर्प्राइजिस के डिरेक्टर प्रणाव अडानी और अडानी पोर्ट्स के मैनेजिंग डिरेक्टर करन अडानी अपने परिवार के साथ मुंबई के
00:23मश्यूर चिंच पोकली चाचंतामनी के दर्बार में पहुँचे और भगवान गनेश के दर्शनकर पू�
00:35कानी मालू है क्यों आडानी परिवार का वहां पहुंचना इतना खास है चलिए आज आपको एक बहुत दल्चस्प कहानी बताते
00:42हैं नमस्कार मैं हूरिचा पराशर और आप देख रहे हैं वान इंडिया हिंदी गनेश चतुर्थि सिर्फिक धार्मिक त्योहार नहीं है
00:49मुं�
01:05सारवजनिक गनपती उत्सव अपने 107 वर्ष में प्रवेश कर चुका है खास बात यह है कि चिंजपोकली चाशंता मनी को
01:11मुंबई के दूसरे सबसे पुराने सारवजनिक गनपती के तौर पर जाना जाता है प्रणाव अडानी और करन अडानी ने परिवार
01:18के साथ वहां �
01:19बहुचकर भगवान गनेश के दर्शन किये, पूजन किये, तस्वीरे खचवाई और ये जो तस्वीरे हैं, विडियोज हैं, सोशल मीडिया पर
01:27इस वक्त वाइरल हैं। इस मौके पर प्रणाव अडानी ने चिंजपोकली सारवजनिक उच्सो मंडल के साथ साज़धारी को
01:33सम्मान की बात बताते हुए कहा कि चिंजपोकली चाशन्ता मनी के विरासत भक्ती एकता और मुंबई की सांस्क्रतिक धड़कन से
01:41जुड़े हुई है। लेकिन इस गनपती की कहाने सिर्फ आज के भवेपंडाल तक सिमित नहीं है। इसकी जुड़े उस मंबई
01:49में हैं जो स
01:49से कभी मीलों का शहर कहा जाता था। परेल, गरगाउं और लाल बाग जैसे इलाके उस दौर में कपड़ा मीलों
01:57और मजदूरों की वजह से शहर की बेहत महतोपुन हिस्से थे। शुरुवाती दौर में मील मजदूर इस गनेश उत्सव का
02:03एहम हिस्सा रहे। और यही वो �
02:05दौर था जब गनेश उत्सव घरों से निखलकर सार्वजनिक उत्सव का रूप ले रहा था। लोकमानेबाल गंगाधरतिलक ने 890 के
02:13दशक में गनेश उत्सव को सार्वजनिक स्वरूप देने में महतोपुन भूमिका निभाई थी। इसका उदेश्य धार्मिक आयोजन क
02:20साथ साथ समाज को एक मंच पर लाना और लोगों के बीच एकता की भावना मजबूत करना भी था। चंचपोकली
02:27चाचंता मनी ने इसी परंपरा को दशकों तक आगे बढ़ाया है।
02:311982 की मील हर्ताल के बाद मुंबई की अर्थ वेवस्थ था और शहर की तस्वीर तेजी से बदली। पुरानी मीले
02:39बंद हुई इलाकों का शहरी करन हुआ और मुंबई का स्वरूप बदलता गया। लेकिन चंचपोकली का ये कंटपती अपने आस
02:47पास के लोगों के लिए सां
03:01भाव्य थीम ही है। इस बार पूरा पंडाल दक्षिन भारतिय मंदिर वास्तुकला से प्रेडित है। भगवान वेंकिटेश्वर बालाजी की थीम
03:09पर गर्णपती की सजावट की गई है। गरून, किर्तिमुक, शंक, चक्र और कपूर तिलग जैसे पारंपरिक धार्वेक
03:15प्रतिकों को इसमें जगहे दी गई है। पंडाल में दक्षिन भारतिय मंदिरों की भव्यता को दोहराने की कोशिश भी की
03:21गई है। जिसमें उचे गोपूरम, दीपस्तम और याली यानि की मंदिरों में दिखाई देने वाली संरक्षक आकृतिया आकरशन का कींद्र
03:30है।
03:30लेकिन शायद रजगनपती के सबसे खास बात ये है कि इसका योगदान सिर्फ गन्वेश उत्सा दक्समत नहीं रहा है। करीब
03:37पांच हजार योगदान करताओं वाला चुंच पोकली सारवजनिक उच्सव मंदल स्वास्त और शिक्षा से जुड़े काम भी करता है। ब्ल
03:58स्वास्त चांच, मेजिकल सहायता और रगदान जासी गतिविधियों के जरिये समुदाय के साथ अपना जुड़ाव बनाई रखा। यानि चिंच पोकली
04:06चाचंता मनी की कहानी सिर्फ एक गणपती की कहानी नहीं है। ये उस मुंबई की कहानी है जो मील मजदूरों
04:12के द�
04:28जहां आस्था, इतिहास, कला और समाज सेवा सब एक ही मंच पर दिखाई दे रहे हैं। इस खबर में इतना
04:36ही। मैं हुरिचा और आप देख रहे हैं One India Hindi.
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