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Delhi Hostel Collapse #poetry

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Transcript
00:00दिल्ली की उस दोपहर में एक उमारत ही नहीं गिरी, कई घरों की उमूदे तूटी, कई आखों की नेंदूडी, जो
00:09कल तक सपने लेकर आएं थे, अज मल्बे में दबे मिली, किसी मा का बेटा था, उनमें किसी पिता का
00:16सहरा था,
00:17किसी ने सोचा होगा, कल घर फोन करूँगा, किसी ने भविस सजाया होगा, किसी ने नया सपना देखा होगा, मगर
00:26कुछ पल की उस हलचन ने सब कुछ बदल दिया, अस्ता खेलता आस याना मौत का मनजर बन गया,
00:33मलबे के नीचे से आती आवाजे आज भी दिल को हिला देती है, मुझे बचा लोग की वो कारे इंसानियत
00:42को जगा देती है,
00:44सवाल सिर्फ इतना नहीं, इमारत आखिर क्यों गिरी, सवाल यह भी है कि लापारवाही आखिर थी किस की,
00:51नीव कमजोर थी या लालज जिम्यदारी किस ने छोड़ी, कुछ रुपिये बचाने की कीमत किसी जान की तो नहीं थी,
01:00आज जो चले गएं, उन्हें वापस नहीं ला सकते, लेकिन उनके जाने के बाद सवालों को तो दबा नहीं सकते,
01:09हैं इस वर उन आत्माओं को सांति देना, उन परिवारों को हिम्मत देना, और जो खायल हैं इस हादसे में,
01:16उन्हें चलते स्वस्त करना,
01:19बस एक बात याद रखना, इमारते इटों से नहीं, इंसानों की जिन्दगी से बड़ी नहीं होते, आज मलबे में दबे
01:26हैं सपने, कल ऐसा फिर ना हो, हर निर्मान में इमानदारी हो, और किसी मा की गोर फिर खाली ना
01:35हो,
Comments

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  1. Sol.point
    5 months ago