00:00दिल्ली की उस दोपहर में एक उमारत ही नहीं गिरी, कई घरों की उमूदे तूटी, कई आखों की नेंदूडी, जो
00:09कल तक सपने लेकर आएं थे, अज मल्बे में दबे मिली, किसी मा का बेटा था, उनमें किसी पिता का
00:16सहरा था,
00:17किसी ने सोचा होगा, कल घर फोन करूँगा, किसी ने भविस सजाया होगा, किसी ने नया सपना देखा होगा, मगर
00:26कुछ पल की उस हलचन ने सब कुछ बदल दिया, अस्ता खेलता आस याना मौत का मनजर बन गया,
00:33मलबे के नीचे से आती आवाजे आज भी दिल को हिला देती है, मुझे बचा लो की वो कारे इंसानियत
00:42को जगा देती है,
00:43सवाल सिर्फ इतना नहीं इमारत आखिर क्यों गिरी, सवाल यह भी है कि लापारवाही आखिर ठीक इसकी,
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