00:00पूने का शनिवार वाड़ा, दिन में ये किला सिर्फ पत्थरों का ढेर लगता है, लेकिन रात होते ही हर दीवार
00:06से अंधेरे की चीख निकलती है.
00:08सदियों पहले इसी किले में एक मासूम राजकुमार की अपने ही रिष्टेदारों ने हत्या कर दी थी.
00:13उसकी लाश खून से लथपत सीडियों पर पड़ी रही और उसकी चीखें आज तक इन गल्यारों में गूंजती हैं.
00:22कहा जाता है, हम आवस्या की राद अगर कोई इस किले में रुख जाए, तो उसे पहले बच्चों की धीमी
00:28-धीमी हंसी सुनाई देती है.
00:29फिर अचानक अंधेरे में एक तीखी चीख फटती है.
00:35लोग कहते हैं जो उस आवाज का पीछा करता है, सुबह उसकी लाश वही मिलती है.
00:40चेहरे पर वही डर, जैसे उसने उस राज कुमार की आखरी सांसे अपनी आखों से देखी हो, और फिर सबसे
00:46डरावना पल, जब अंधेरा खुद तुम्हारे कान में फुस-फुसाता है.
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