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01:19This is the case.
01:21and we need to have a fight against it.
01:23We have also said that because a small child has been raped and killed in the ghotes,
01:30and we need to have a fight against it.
01:33There is no advantage of living in such a person.
01:37The court has given us to do this.
01:40And the ROP, the people who keep in mind,
01:43the people who keep in mind,
01:45they need to have a fight.
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02:06न्यायपालिका पर जंता के भरोसे को और मजबूत किया है।
02:10और ये साबित कर दिया है कि कानून के हाथ हैवानों को पाताल से भी ढूंड कर फांसी के फंदे
02:16तक पहुचा सकते हैं।
02:18वहाई पेडिता के पिता ने बताया कि हमारी शुरू से ही मांग थी किस दरिंदे को फांसी की सदा हो।
02:48और इकल जंजमेंट आचुका है।
02:49और इसमें आज एक्यूज को जो प्रस्विशन ने एक्यूज के अगेंस चार्ज प्रू किया।
02:56इस चार्ज में तीन दाराई ऐसी हैं जिसमें डेथ पनिश्मेंट की भी प्रिस्ट्राइट पनिश्मेंट है।
03:30वो तीनों में अक्यूज को डेथ पेनल्टी दिया है।
03:31दोनों पक्षों की दलीले सुनने के बाद अधालत ने 137 पन्नों का अंतिम फैसला तयार किया है।
03:38सरकारी वकील ने कोर्ट में दलील दी कैसे दरिंदों को समाज में रहने का कोई हक नहीं है।
03:44फास्ट रेकोर्ट ने भी मामले की समवेदन शीलता को समझा और बिनावक्त गवाए 69 दिनों में गवाहूं और सुबूतों के
03:52आधार पर दोशी को मुकदर की मौत दे दी।
03:54हम आपको बताते हैं कि उस दिन क्या हुआ था।
04:24बच्ची के शरीर पर 18 चोटों के निशान पाए गए थे।
04:27वहीं आरोपी पर बच्ची के साथ 49 मिनट तक दरिंदगी करने का भी आरोप लगा था।
04:34जिसके बाद परीजिनों ने न्याय की गुहर लगाई और आरोपी को फासी की सजा देने की मांग की।
04:40मामले वे कारवाई के दौरान 26 जून को पुणे की विशेश अदालत ने भीमराव कामले को दोशी करार दिया और
04:46आज अदालत ने कामले को दोशी करार देते हुए मौत की सदा सुनाई।
04:52कानून के किताबों में लिखा है कि न्याय मिदेरी न्याय ना मिलने के बराबर है।
04:58लेकिन जब अदालते महस दो महीने यानि उन सट दिनों के भीतर किसी हैवान को सीधे फासी के फंदे तक
05:06का रास्ता दिखा देती हैं तो समाज का कानून पर भरोसा लौट आता है।
05:11पुणे की फास्ट्रे कोट ने चार साल की मासुम बच्ची के साथ दरिंदगी और उसकी अहत्या करने वाले आरोपी को
05:17सजा मौत सुना कर एक मिसाल तो कायम की है।
05:21लेकिन ये त्वरित न्याएं हमें खुश होने से जादा सोचने पर मजबूर करता है। ये कोई पहली घटना नहीं है।
05:28जब भी ऐसी कोई वारदात होती है तो लोग चंद दिनों के लिए मुम्बतियां जलाते हैं, आकरोश यताते हैं और
05:35फिर सो जाते हैं।
05:37ये कहाने सिर्फ एक अदालती फैसले की नहीं हैं, बलकि समाज के गिरते मांसिक स्तर न्याए व्यवस्था की च्छशक्ती और
05:46हमारी सामोहिक्स जिम्मेदारी का एक बड़ा आइना है।