00:01है दया, आप मत देखिए, इसने तो हद ही कर दी
00:06बच्चे जवान हो रहे हैं, तुम जिन्स पहन रही हो, कैसे पहन सकती हो
00:09मैंने गा क्या हो गया, बच्चे अपनी जगा जवान हो रहे हैं
00:12मैंने मेरा बच्पन जवानी दोनू को कि उनको बढ़ा किया
00:15अब मैं मेरी जिन्दगी नहीं तुम्ही कैसे कर सकती हो, उनकी शादी में मुश्किल होगी, इस तरह की बातों से
00:21मैं इतनी परिशान हूँ कि मैं कुछ करी नहीं सकती, कोई करे तो क्या करे
00:26समस्या ना हमें इस से नहीं होते कि किसी ने हमें बोल दिया
00:29कि हमारी बात सुनो हमसे दब कर रहा हो हमारी आग्या मानो
00:33वास्तविक समस्या हमें इस बात से होती है कि हम भीतर से मजबूर होते हैं उनकी बाते मानने के लिए
00:40ये मजबूरी हटनी चाहिए
00:42ये मजबूरी हट गई तो उसके बाद कोई बोलता रहे
00:44बाहर से हमें क्या फर्क पड़ता है
00:46और जब आपको फर्क पड़ना बंद हो जाएगा
00:48तो लोगों का बोलना भी कम हो जाएगा
00:50लोग बोलते भी इसलिए
00:52क्योंकि उनको पता है कि इसको बोलेंगे
00:54तो ये दबेगी जुकेगी
00:56इस पर अंतर पड़ेगा भले ही
00:58ये क्रोध में प्रतिक्रिया करें
01:00पर इसका क्रोध भी यही बताता है
01:02कि इस पर अंतर पड़ा है
01:04जिस बात से आपको कोई फर्क नहीं पड़ेगा
01:06क्या उस बात पर आपको क्रोध भी आएगा क्या आप शिकायत भी करोगे नहीं पर देखिए अभी आपको क्रोध हा
01:12रहा है आप शिकायत कर रहे हो उसकी वज़ा समझिए एक वज़ा तो है उसकी की दुनिया ऐसा ऐसा बोलती
01:18है एक वज़ा तो यह है और दूसरी वज़ा यह
01:20कि दुनिया जो बोलती है उससे हम पर फर्क पड़ता है फर्क पता है क्यों पड़ता है क्योंकि कटपुतली की
01:27डोर किसी और के हाथ में है तो अपनी डोर किसी और के हाथ में मत दीजिए
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