00:00इस मालुमाती निशस्त में खुश्शामदीद आज के इस तफसीली जाइजे में हमें एक बड़ी ही दिल्चस्प कहानी पर बात करने
00:06वाले हैं।
00:07क्या आपने कभी सोचा है कि हिजरत और पेचीदा सियासी तारीख कैसे हमारे दस्तर खानों को हमेशा के लिए बड़ल
00:13कर रख देती हैं।
00:37क्यासी बिसात को समझेंगे, महाजरीन की शिनाखत के बहरान पर नज़र डालेंगे और आखिर में देखेंगे इस शांदार पाक फन
00:43की मीरास को।
00:45तो आएए, पहले हिस्से से शुरुआत करते हैं।
00:48साए में छुपी एक सकाफ़त।
00:51आखिर एक इतने शांदार विर्से को आलमी सता पर पहचान क्यों नहीं मिल सकी।
00:56देखिए, ये बात वाकई हैरान कर देने वाली है।
01:00पाकिस्तान जोगराफियाई तोर पर अफगानिस्तान, चीन, इंडिया और इरान के बिलकुल बीच में है।
01:07फिर भी इसका अपना वो जो एक मुनफरिद जाइका है ना, उसे आलमी नक्षे पर ढूंडना काफी मुश्किल है।
01:13लगभग 90 लाख पाकिस्तानी इस वक्त दुनिया भर में पहले हुए हैं।
01:17लेकिन इसके बावजूद अक्सर पाकिस्तानी खानों को इंडियन खानों के साथ ही मिला दिया जाता है।
02:15और उनकी जगा वही जाने पचाने नाम ले लेते हैं।
02:17लेकिन रुकें इसमें जो आलू का इस्तमाल है ना वो आज भी हमारे हां एक बहुत बड़ी और गर्मा गरम
02:24बहस का मौजू है।
02:25सोशल मीडिया पर होने वाले इस बड़े पोल को ही देख लें। इसने हमारी इस तफरीही सकाफती बहस को बिलकुल
02:34परफेक्ट अंदाज में दिखाया है।
02:36नताइच देखिए मुकाबला कितना सक्था तकरीबन आधे लोग आलू वाली बिर्यानी के हक में हैं और बाकी आधे उसके बिलकुल
02:44खिलाफ। क्या आलू वाकई इस कौमी डिश का हिस्सा होना चाहिए। ये हमें बताता है कि हम अपने खानों को
02:51लेकर कितने जजबाती है
02:52अब जरा कहानी का रुख मोडते हैं उन सरहदों की तरफ जिन्होंने पिछले 40 सालों से इस खिते को शकल
03:01दी। तीसरा हिस्सा सरहदें और जोगराफियाई बिसात।
03:22अगर हम इन वाकियाद को तर्तीब से देखें तो 1989 से 2001 के दरम्यान ये तीन बड़े तनाजाद हुए। इन
03:32लगताल होने वाले तनाजाद ने यके बाद दीगरे लाखों अफगानों को अपना घर बार छोड़कर सरहद पार पाकिस्तान में पना
03:40लेने पर मजबूर कर दिय
03:42अब अगर हम एक मारूजी तारिख की रिकॉर्ड की बात करें तो ये वाज़ है कि सरजंग के दौरान पाकिस्तान
03:49के पॉलिसी साजों ने महाजरीन की इस आमद और मजबी धड़ों को सोवियत अफवाज के खिलाफ एक बकाइदा हिकमत अमली
03:56के तोर पर इस्तमाल किया।
04:13पाकिस्तान ने दुनिया की इतनी बड़ी महाजर अबादी को जिस कानून के तहत पना दी उससे प्राइमा फेसी कहते हैं।
04:42पाकिस्तान का जारी करदा ये शनाखती पास महाजरीन को मुलक के अंदर चलने फिरने और गहर रस्मी शुबों में काम
04:48करने की इजाज़त तो देता था लेकिन हैरत की बात ये है कि साथ ही इसने उन्हें एक अजीब सी
04:55मुस्तकिल कानूनी उलजन में भी फहसा कर रख दिय
04:57इस तकाबल से रोज मर्रा की हकीकत बिलकुल खुल कर सामने आ जाती है उनके पास कुछ आजादियां जरूर थी
05:05लेकिन बड़ी पाबंदियां भी थी वो जाइदाद नहीं खरीच सकते थे बाकाइदा कारोबार नहीं कर सकते थे यहां तक कि
05:11गाड़ियां भी उनके नाम न
05:27रहें 2014 तक 16 लाख से ज्यादा रिजिस्टर अफगान महाजरीन पाकिस्तान में थे और अगर उनको भी मिला लें जिनके
05:35पास काख़ात नहीं थे तो यह तादाद लगभग 10 लाख मजीद बढ़ जाती है इतनी बड़ी तादाद ने मिलकर मौशरे
05:42के अंदर अपना एक बह�
05:48इसको वापिस दस्तरखान की तरफ लाते हैं पांचमा और आखरी हिसा एक लाजवाल पाक फन की मिरास
05:54आज कल तोर्खम बॉर्डर पर दस लाख से जायद अफगानों को वापस भेजे जाने का दबाव है एक ऐसी जगा
06:03जहां की जिन्दगी शायद उनकी नई नसल जानती तक नहीं
06:07मुलक बदरी की ये पॉलिसियां वक्त के साथ बदलती रही हैं और बाज जुकात काफी सख्त भी रही हैं लेकिन
06:14एक बात तैह है इन दहायों ने पाकिस्तान पर सकाफ्ती और खानों के हवाले से जो मुस्तकिल नकूश छोड़े हैं
06:22वो कभी नहीं मिट सकते
06:23इस बात का सबसे बड़ा सबूत ये खाने हैं अफगान महाजरीन अपने साथ जो काबली पिलाव लाए आज वो पिशावर
06:30की हर शादी की जान है बुरानी बंजान की बात करें तो तले हुए बैंगन और दही की ये शांदार
06:36डिश अब हमारे रोजमर्रा के घरेलो खानों
06:52तो इस तफसीली जाइजे के इखतताम पर ये सवाल हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर हिजरत और ये
07:01बड़े बड़े जोग्राफियाई तनाजवात हमारे इन खानों को कैसे तश्कील देते हैं जो आज हमारे दस्तरखानों की जीनत है
07:07स्यासी दबाव से सरहदे तुशाइद बदलती रहें, बंती बिगरती रहें, लेकिन हिजरत करने वाले लोग अपने साथ जो जाइके और
07:15रिवायाद लेकर आते हैं वो एक ऐसी मिरास छोड़ जाते हैं जो हमेशा हमेशा के लिए जिन्दा रहती है
07:21इस मालूमाती निशिस्त का हिस्सा बनने के लिए बहुत शुक्रिया
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