00:00अच्छा, जरा एक लम्हे के लिए सूचें, आज कल बच्चे अपना ज्यादातर वक्त कहां गुजारते हैं?
00:05जी हाँ, स्क्रीन्स के सामने.
00:07आज के इस तफसीली जाइजे में, हम दरसल एक ऐसे खामोश बहरान पर बात कर रहे हैं, जो हमारे घरों
00:12में बड़ी तेजी से फैल चुका है.
00:14डिजिटल बच्च्पन का बहरान, स्क्रीन्स ने बच्चों की जिंदग्यों को पूरी तरा अपनी लपेट में ले लिया है.
00:36जी हाँ, महज एक दहाई के अंदर बच्चों के फारिग उकात में स्क्रीन के इस्तिमाल में पूरे 50% तक
00:43का होश और बाएजाफ़ा हुआ है.
00:44ये वाकी एक बहुत बड़ा नमबर है.
00:47इसका सीधा सा मतलब ये है कि वो वक्त जो पहले घर से बाहर भाग दौड़ और शोर शराबे में
00:52गुजरता था, वो अब मुकमल तोर पर खामोशी से इन डिजिटल आलात की नजर हो चुका है.
00:57और सच पूछें, तो स्क्रीन टाइम के इस गलबे ने एक काफी संगीन सुरतिहाल पैदा कर दी है, जिसके नताइच
01:03अब हमारे सामने आ रहे हैं.
01:04और देखें, इस गलबे की हम सब को एक भारी कीमत अदा करनी पड़ रही है. मुक्तलिफ मुस्तनद रिपोर्ट्स, जैसे
01:11के टीपैट बातान और दीगर मारूफ तिप्पी सहाफत के मुताले हमें बताते हैं, कि जब बच्चे बाहर खिलना छोड़ देते
01:17हैं, तो उनके ब
01:31प्रेशर के मसाइल और हड़ियों की कमजूरी का बाइस बन रहा है, और नफसियाती तोर पर ये बच्चों में खामोशी
01:36से तनाव और जहनी दबाव को बढ़ा रहा है. तो चलें, अब जरा इसकी गहराई में चलते हैं. हालात सिर्फ
01:42मायूस कुन ही नहीं है, क्योंकि साइ
02:10अगर हम डिजिटल डिवाइसिस के इस्तमाल और रिवाईती खेलों का आपस में मवाजना करें, तो फर्क आपको खुद बिलकुल वाज़े
02:16नजर आएगा.
02:17डिजिटल स्क्रीन्स बच्चों को बिलकुल गैरफाल, सुस्त और तनहाई पसंद बना देती हैं. उनकी पूरी दुनिया बस एक स्क्रीन तक
02:24महदूद होकर रह जाती है. इसके बिलकुल बरक्स हमारे रिवाईती खेल फितरी तोर पर मतहर्रिक होते हैं. उनमें दूसरे ब
02:44अपनी पुरानी यादों या जजबाती लगाओं की बन्याद पर नहीं कहरे है. इसके पीछे बाकाइदा एक इंतहाई सख्त साइंसी तरीकाकार
02:52मौजूद है. इंडुनेशिया में होने वाली एक रीसर्च में महक्कीन ने 1027 मुख्तलिफ तालीमी मजामीन को एकठठा किय
02:59और फिर उन्हें मुख्तलिफ साइंसी कड़ियों से खुजार कर चांट कर सिर्फ नौ इंतहाई मुस्तनिद मुतालियात तक महदूद किया. यानि
03:06ये कोई हवाई बाते नहीं है. रवायती खेलों के इन फवायत की पुष्ट पर एक ठोस और संजीदा अकेडमिक रिसर्च
03:12मौजूद है. इस पूरी जामे तहकीक का जो निचोड है न वो एक शांदार हकीकत बेयान करता है. वो ये
03:18कि रवायती खेल जो ज्यादातर हमारी मकामी सकाफत से जड़े होते हैं, दरसल बच्चों की नशनुमा के लिए एक मुकमल
03:24पैकेज है. डिजिटल गेम्स के बिलक�
03:42जस्प है कि हमारे पुराने रिवायती खेल अंजाने में ही बच्चों को कितनी बड़ी लाइफ स्किल सिखा जाते थे. मिसाल
03:48के तौर पर हॉप स्कॉट जैसे खेलों को ही ले ले. ये बच्चों में बरदाश्ट और खुद पर काबू पाना
03:53सिखाते हैं. कई ऐसे खेल हैं
04:08एक जबरदस प्रैक्टिकल क्लास ले रहे होते हैं? और हाँ, इन बातों के पिछे हैरत अंगेज मिगदारी डेटा भी मौझूद
04:15है. मिसाल के तौर पर तहकीक में देखा गया कि जो बच्चे रिवायती खेलों में बकायदगी से हिस्सा लेते हैं,
04:20उन्होंने रवादारी
04:21और बरदाश्ट को जांचने वाले एक पैमाने पर 3.04 का आुसत स्कोर हासिल किया. ये स्कोर आम या दिर्मियाने
04:28दरजे से कहीं ज्यादा है. तो इसका क्या मतलब हुआ? इसका सीधा सा मतलब ये है कि हमारे पास अब
04:34मिगदारी और ठोस सबूत मौझूद है कि ये खेल वा
04:51कि एक बहतरीन रिपोर्ट के मताबिक कुछ खास सरगर्मिया स्क्रीन का बहुत शांदार मतबादिल हो सकती है. जैसे के साइकल
04:58चलाना इस से बच्चों में तवाजन और खुदेतमादी आती है. तेराकी से पूरा जिसम चुस्त रहता है. और बागबानी ये
05:05एक ऐसी जबर
05:21सवाल जहन में आता है. अगर ये खेल इतने ही कमाल के हैं तो फिर आजकल बच्चे गलियों या पारकों
05:27में ये खेल खेलते नजर क्यों नहीं आते? वेल, इसकी रहा में कुछ बड़ी रुकाविटे हैं. सबसे बड़ी वज़ा तो
05:32जाहिर है डिजिटल गेम्स की कशिश औ
05:48इन रुकावटों को कोई एक शखस तो दूर नहीं कर सकता. और बिलकुल इसी लिए माहरीन एक जामे हल पर
05:55जोर देते हैं, जिसे हम एक बाहमी तावन का नाम दे सकते हैं. देखें, बात सीधी सी है. कोई एक
06:01स्कूल या कोई एक वालिदین का जोड़ा, ये जंग अकेले नह
06:09आने वालों और सबसे बढ़कर हम सब को, यानी खानदानों को एक टीम बनकर काम करना होगा. हमें मिलकर रास्ते
06:16निकालने होंगे ताकि इन सदियों पुराने, लेकिन इंतहाई कारामत खेलों को हम आज के बच्चों के रोजमरा मामूलात का दुबारा
06:23हिस्सा बना सकें. य
06:38बच्च्पन को डिजिटल बनाने और बच्चों के हातों में जदीद से जदीद डिवाइस थमाने की इस अंधा धुंद दोड में,
06:44क्या हमने कभी सोचा है कि हम दरसल किन लाजवा लिकदार, रिष्टों और सलाहियतों को हमेशा के लिए पीछे छोड़
06:51रहे हैं? क्या एक
06:52चमकतीवी स्क्रीन वाकई हमारे बच्चों की अखलाकी और जिस्मानी सहत की कीमत पर खरीदी जानी चाहिए, ये हम सब के
06:58लिए एक बहुत बड़ा लम्हे फिकरिया है, हकाइक आपके सामने हैं, अब एक बहतर रासने का इंतखाब करना हम सब
07:03के अपने हाथ में हैं
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