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  • 5 months ago

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00:05परम्पिता परमात्मा जो अनंत है असीम है अजन्मा है अगोचर है अधा है जिसका ना कोई ओर है और ना
00:18ही कोई छोर है और ना ही इसका अंत है
00:22जिसके बारे में भगवान स्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी विराट सरूप के बारे में समझाते हुए कहते हैं कि ही पार्थ
00:32पद के नीचे पाताल देख मुठी में तीनो काल देख मेरा रूप विकराल देख नाग परवत सब मेरे हैं और
00:43चतुरदिग गेरे हैं कोटी-को�
00:48चंद्र देख सब जन्म मुझ से पाते हैं और लोट मुझी में आते हैं धर्ती पर धर्म बचाने को सब
00:58में विश्वास जगाने को मैं समय समय पर आता हूँ और लीला अनंत दिखलाता हूँ
01:06मुझ में जिसकी पीड़ा होती उसमें जलती मेरी जूत वो जीव सैंग मेरा होता सैम बहीन मुझ में खोता अर्थात
01:17हे पार्थ, भूत, भविश्य एवं वर्तमान तीनों मेरे सेही उत्पन एवं मेरे मेही समाप्त होते हैं कहते हैं कि तू
01:29देख रहा इन आखों से ये र�
01:34अंचभूत का बंगला है, माया ने इसको गेरा है, अर्थात हे पार्त, मैं देह नहीं, मैं देही हूँ, मैं सृष्टी
01:45करता सर्वशक्ति मान हूँ, सर्वेश्वर अंतर्यामी निर्विकार हूँ, मैं ही निराकार हूँ, और मैं ही जानने योग्य हूँ, और ये
01:58तभी संभ�
01:59है जब सद्कुरू जीवन में आता है अनन्त है सद्कुरू की महिमां अनन्त है उपकार भी
02:18सद्कुरू को ही शीष नवाओं नित जांप लिहार भी
02:45परमसत का बोध कराके रमजाल से मुक्त किया
03:13सद्कुरू जब जीवन में आता है तो व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर अपना कदम रखता है
03:19ये दातार प्रभू पहले हमें स्रिष्ट पुरुष बनाता है और फिर पुरुष से महा पुरुष बनाता है
03:27हमारा नाता जहां निरंकार के साथ चोड़ता है वहीं लगातार अपने वच्चनों द्वारा
03:35हमें भक्ति में जीवन जीने का मार्ग दिखाता है फिर भक्त को अपार दौलत मिल जाने पर भी वो खुशी
03:44नहीं मिलती जो सिद्गुरु से मिलकर प्राप्थ होती है
03:48सिद्गुरु को ना दौलत ना विद्धवता ना ही उपादियां बान सकती है ये तो केवल भक्तों के निश्चल प्यार से
03:57ही बंदा होता है
03:58सद्गुरु अपनी शरण में आये प्रतीक व्यक्ति को प्यार देता है
04:03भक्त को गुरु से प्यार पाने और उस प्यार को बनाई रखने के लिए अपना आप मिटाना पड़ता है
04:11क्योंकि रास्ता दिखाने वाले तो संसार में लाकों मिल जाते हैं
04:16परन्तु मंजल पर पहुँचाने वाला केवल सद्गुरु होता है
04:21इसलिए हर समय हमें ऐसे ही संतों का संकरना चाहिए
04:26जो सद्गुरु और निरंकार का ध्यान दिलाए
04:29जो इंसान जगत में करता जैसी जैसी संगत है
04:35उसके मन के उपर चलती वैसी वैसी रंगत है
04:40सजन का संग करने वाला घुर्मत को अपनाता है
04:51कच्चों का संग बरने वाला बटकेगा बटकाएगा
04:57जो पकों का संग करेगा गुर्मत में ढ़ल जाएगा
05:02हर भाग, हर बस्तु सब य तार चाता है
05:06अनंत तक असीम की और
05:12मानव अज्यानता को छोड़कर ज्यान का विस्तार चाता है
05:16अंदकार से आगे असीम की ओर जाने का विस्तार
05:21नफरत को छोड़कर प्रेम का विस्तार
05:24स्वार्थ को छोड़कर करुड़ा का विस्तार चाता है
05:28शेनशीलता का विस्तार चाता है
05:31जिम्मिदारियों का विस्तार, मानव मूल्यों का विस्तार चाता है, मैं को छोड़कर तू का विस्तार चाता है, दिवार रहित संसार
05:42का विस्तार, कड़वाट को छोड़कर मीठी बोली का विस्तार, मनमत को छोड़कर गुर्मत का विस्तार चाता है,
05:50असीम की और अर्थात परमात्मा से इकमिक हो जाने का विस्तार चाता है
05:57और ये तब ही संभव है जब हम संकुचित भावनाओं से
06:02हम अपने आपको उपर उठा कर विशालता की और आगे बढ़े
06:08आयम निजह परोवेती गरणा लगू चेत साम उदार चिरता नाम
06:15तो वसुदैम कटुम कम अर्थात ये मेरा है ये उसका है
06:21ऐसी सोच संकुचित चित वाले व्यक्तियों की होती है
06:25इससे विपरीत उदार चिरत वाले लोगों के लिए
06:29तो ये संपोंड धर्ती ही एक परिवार जैसी होती है
06:34भोजपुरी का ये लाइन
06:35गरीब के ऐसनेगो सीन हो जाला
06:39कि चिनहलको अदमिया अनचीन हो जाला
06:43अर्थात गरीबी
06:45कि एक ऐसी स्थिती आ जाती है
06:48जहां पहचानने वाला व्यक्ति
06:50भी अंजान बरकर साइट से निकल जाता है
06:54ताकि लोग ये ना कह सकें
06:56कि ये व्यक्ति उसका रिस्तिदार है
06:59और ये इस्तिती व्यक्ति के अज्यानता
07:03और अंधकार में टूबे होने के करण होती है
07:06क्योंकि ज्यानवान व्यक्ति
07:08इस बात को समझता है
07:10एक पिता एकस के हमबारिक
07:13सभी हमारे अपने हैं
07:15सबी आपस में भाई भाई हैं, फिर उच नीच अपने पराय का भेदवाव सता ही समापत हो जाता है
07:51पूछ ना मानू नीच ना मानू जात पात भी मानू ना
07:59मैं सब का हूँ सब है मेरे कह किसी को जानू ना
08:14रंग न देखू रूप न देखू और देश भी देखू ना
08:21प्यार सबी से करता जाओं देश भी देश भी देखू ना
08:29संतों ने कहा है कि गुर्सिक को संसार के अंदर रहना है
08:34पर शरीर के ओपर उठकर आत्मिक इस्तर पर भक्ति करनी चाहिए
08:41पन से उठकर आत्म भाव से अब तो सदा विचरना है
08:48आनंद वाला जो रस्ता है उस पर ही अगधरना है
08:58शरीर के साथ कई प्रकार की जिम्मेवारियां जुड़ी होती है
09:02जैसे परिवार, संसारिक क्रिया कलाब एवं समाज की हर वो चीज जो हमसे संबंदित है
09:11और जिसमें बदलाव आता है
09:14खुशी भी आती है, घम भी आता है
09:17परन्तु इस्तिरता नहीं आती
09:20और अगर जीवन में कोई स्थिरता नहीं आती
09:24तो उस वातावरण से निकलना ही जाहिए
09:29हमने घ्यान लेते समय ये स्विकार किया था
09:33कि मैं शरीर नहीं हूँ
09:35मैं मन या भोतिक संपदा भी नहीं हूँ
09:39मैं आत्मा हूँ
09:40और इस नजर से मैं अपना जीवन जीऊंगा
09:44मैं शरीर शेओ पर उठकर
09:46हाजर नाजर पर मात्मा का होकर जीवन्यापन करूंगा
09:51गुर्सिक हमेशा सद्गरु के ज्यान की समझ मांगता है
09:55भक्ती का दान मांगता है
09:57ताकि आनन पूर्ण जीवन जी सके
10:00रामचरित मानस में तुलसीदास जी लिखते है
10:03कि नाथ भगती अती सुखदाईनी देव कृपा कर यपनाईनी
10:09अर्थात हे नाथ किरपा करके
10:12मुझे अत्यंत सुखदेने वाली अपनी निश्चल भक्ती का दान दीजिए
10:28अगर नहीं है भक्ती तो फिर नीरस ही रह जाएगा
10:50जोड़े जो भगवार भगट को ऐसी कड़ी ये भक्ती है
10:56शातिस्वरू को नन रूपा सुखद वड़ी ये भक्ती है
11:03अगर मगर क्यों किन्तु से तो भक्ती न कर पाएगा
11:15अगर मगर क्यों किन्तु से तो भक्ती न कर पाएगा
11:34भक्ति सफन होगे तेरी जो पल पर शुक मनाएगा
11:43दिवाय मसमर पन के भक्ति में आर न चलती युक्ती है
12:08भक्त की अपनी कोई इक्षा या मांग नहीं होती
12:12वो तो केवल प्रबो का हर पल शुक्राना करता है
12:16और स्वैंग को नचाने वाले के हाथ की कट पुतली मानता है
12:21उसका भाति भाति के पुतले को अपनी धन पर नचाने वाला एक प्रबो में दरड़ विश्वास होता है
12:29भक्त का हिर्दय जब सद्गुरु को समर्पित होता है
12:33तो प्रबो के प्रती अटूट, निरोल प्रेम, स्रिधा, विश्वास, विनम्रता एवं आस्था का भाव होता है
12:43वहीं सद्गुरु भी भक्त के प्रती करुणा, छमा भाव, प्रेम, धयालुता, परोपकार एवं विश्वालता जैसे गुडों से योगत होता है
12:56जैसे मा के आचल में बच्चे द्वारा समिर्पत होने पर, मा अपनी मम्ता, स्नेह, दुलार उडेलते नहीं ठकती, वैसे ही
13:07सद्गुरु भी अपनी रहमत, अपना आशरवाद, भक्तों पर निरंतर बरसाते हैं
13:13और ऐसी स्थिती में भक्त एक देव्या आनंद की अनुभूती करता है
13:19पूरा सद्गुरु जिसके उपर, अपनी महर लुटाता है
13:27सुख्व आनंद वाला जीवन, जग में वही बिताता है
13:46विर्थ की बातों में भगत को पढ़ने से बचाता है
13:55सहज भाव से रहना जग में, सत्गुरु सदा सिखाता है
14:04अपनी एक निगाह से सत्गुरु भक्तों का गलार करे
14:13हर आफत को दूर करे, हर मुश्किल आसान करे
14:22गुरु पीर पैगंबर जब जब धर्ती पर आए
14:26वो हमेशा याद दिलाते रहे और याद कराते रहे
14:31कि प्यार को ही अपनाना है, प्यार को ही इकठा करना है
14:36और प्यार से युक्त होकर प्यार की दौलत ही बाढ़ते चले जाना है
14:41प्यार कोई बाधा माने नहीं करता बलकि ये बाधाओं को पाहर कर जाता है
14:47नफरतों की दीवार को भेदते हुए दीवार रहित संसार बनाता है
14:53जो प्यार और तया से भर जाते हैं
14:57उन्हें जात, पात, भाशा, छेत्र और धर्म संस्कृतियों की दीवार बाट नहीं पाती, इसलिए कहीं पर भी इंसान और इंसार
15:09के दर्म्यान अगर कोई दूरियां होती है, तो उनको मिटाने का हम साधन बने, दूसरों के दुख सुख में शामिल
15:18होकर एक दूसरे की पीड
15:20हरने वाले साधक बने, ऐसे कदमों का निशान इस धर्ती पर छोड़ जाएं, जिन निशानों की पूजा हो, ऐसे कदम
15:30जो भलाई करते हुए आगे बढ़ाए गए हो, मानवता को अपनाते हुए, उस कारवां का हम इस तरह हिस्सा बन
15:40जाएं, कि जिधर से गुजरें, सबके
15:47जीवन को खुशहाल बनते जाएं
16:17वो बंदा नादान है, इश्वर ही तो प्रेम हसाधो, प्रेम स्वयम भगवान है
16:35मतलब पर जो किका है उसको, प्रेम समझना भूल है
16:43प्रेम अगर निश्काम बने तो, एक महकता फूल है
16:52सिर्पर प्रेमी कभी न धोता, बोजा छूते मान का
17:01प्रेम जहां पर बसे वहां पर, ठार नहीं अभिमान का
17:11साथ ही इन गुर्मत एवं मानविय गुडों से स्वयंग युक्त होकर
17:16अपने कर्म द्वारा मानव मात्र को इस ब्रह्म ज्यान की प्राप्ति के लिए प्रेरित करते जाएं
17:24ताकि हमारा लोग सुखी एवं परलोग सुहेला हो सके
17:28कहे हर देव दरगाह में भी प्रेम सदा परवान है
17:38प्रेम रिदय में बस जाए तो हो जाता कल्यान है

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