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  • 5 months ago

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00:05कभी कभी सबसे कहरी बातों को सब्दों में नहीं उतारा जा सकता और सायद यही कारण है कि जब भी
00:14किसी ने गुरू की महिमा लिखने की कोशिश की तो कलम भी रुक रुक कर चली और अंत में लेखक
00:22स्वयम ही जुग गया
00:23गुरू की महिमा पर आज तक जितना लिखा गया वो सब मिल कर भी उसका पूण्ड वर्ण नहीं कर पाया
00:32इसलिए नहीं कि लेखकों में कमी थी बल्कि इसलिए क्योंकि विशय सब्दों से भी पड़ा था जिसे दुनिया के शब्दों
00:41में पिरोपाना नामुम्किन है इसलिए
00:46गुरु को समझने की कोशिश में बुद्धी तक जाती है
00:49क्योंकि गुरु कोई विचार नहीं
00:52जिसे परभाशा में बान दिया जाए
00:54गुरु कोई ऐसा सिधान्त नहीं
00:57जिसे पंक्तियों में कैद कर लिया जाए
01:00गुरु कोई विशे नहीं
01:02गुरू तो अनुभव है और अनुभव न समझाया जाता है ना सिखाया जाता है वो तो बस मिल जाता है
01:11और जिस दिन गुरू मिलता है उस दिन जीवन की दिशा ही बदल जाती है
01:17फिर मनुश्य भीड नहीं बलकि भीतर से चलता है
01:21लेकिन यहां एक बहुत सूश मसा सत्ते है
01:24मनुश्य स्वभाव से लोगों का आदी होता है
01:28लोगों की राय, लोगों की सहमती, लोगों की प्रसंसा
01:33और यही आदत उसे भीतर से कमजोर बना देती है
01:37इसलिए किसी ने बहुत सरल परंतु बहुत गहरी बात कही है
01:43कि खुद को लोगों का आदी मत बनाओ, खुद को गुरू की खिदमत का आदी बनाओ
01:50यह कोई साधरन सा वाक्य नहीं है
01:53यह जीवन की दिशा बदल देने वाला सुत्र है
01:57लोगों की आदत मनुश्य को बाहर की और फैलाती है
02:01और गुरू की खिदमत मनुश्य को बीतर की और जुका देती है
02:06जहां बाहर फैलाव है, वहां अशान्ती है
02:09और जहां बीतर से जुकाव है, वहीं पर सुकून है
02:13इसलिए जो गुरू की खिदमत में रम गया
02:17उसने सिकायत करना ही छोड़ दिया
02:19क्योंकि अब उसके जीवन का केंद्र लोग नहीं है
02:23बल्कि गुरू है
02:25और जब गुरू केंद्र बन जाते है
02:28तो जीवन का कड़ित ही बदल जाता है
02:31मनुश्य को अब हर मोड पर
02:33लोगों से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती
02:36बल्कि वो भीतर एक दिशा महसूस करने लगता है
02:40क्योंकि गुरू सिर्फ मार्ग नहीं दिखाते
02:44बल्कि वो मार्ग बन जाते है
02:46सायद इसी कारण गुरू की महिमा पर लिखते लिखते
02:51हर सचा लेखक एक जगा आकर रुक जाता है
02:54वो समझ जाता है कि लिखना अब नहीं है
02:58अब तो जुकना है
03:00अब कहना नहीं है स्वीकार करना है
03:04यही वो बिंदू है जहां शब्द तो मौन हो जाते है
03:09और मौन महिमा बन जाता है
03:11अनन्त है सत्कुरू की महिमा, अनन्त है उपकार भी, सत्कुरू को ही शीष नवाओ, नित जांप लिहार भी
03:41और यहीं से एक प्रश्न जनुम लेता है, बहुत सभाविक, बहुत जरूरी प्रश्न, अगर गुरू अनुभव हैं, अगर गुरू हमारे
03:52खुद के पीतर मिलते हैं, अगर गुरू जीवन की दिशा बदलते हैं, तो फिर क्या ऐसा अनुभव भीना सत्कुरू के
04:01संभव है?
04:11केवल सोच से प्रिकट हो जाता है यदि ऐसा होता तो इतिहास में गुरु शिष्य परंपरा क्यों होती आईए तरक
04:21नहीं बल्कि इतिहास से पूछते हैं कि जब स्वयम ईश्वर ने भी गुरु स्विकार किया तो मनुष्य गुरु विहीन कैसे
04:29रह सकता है भगवान स्रीक्र
04:32जिने हम योगेश्वर भी कहते हैं उन्होंने गीता का उपदेश दिया जिनके मुक से ब्रह्म के स्वर्फ उटे उन्हीं कृष्ण
04:42ने गुरु के बिना ज्यान स्विकार नहीं किया वे बाला वस्था में उज्जैन पहुचे आसरम में प्रवेश किया और शिष्य
04:51बनकर ग
04:56मैं तो ईश्वर हूँ उन्होंने कहा मैं शिष्य हूँ गुरु ने जो दिया कृष्ण ने सिर जुका कर ले लिया
05:04और सुख्षा पोड होने पर गुरु दक्षडा पूछी गई गुरु ने मांगा अपना खोया हुआ पुत्र और स्री कृष्ण ने
05:12मृत्यों लोक से उस प
05:27अब स्री राम को ही देखिए मर्यादा पुर्शोत्तम सत्यत्याग और धर्म की मूर्ति पर राम भी ग्यान के लिए गुरु
05:36की शरण में गए महरेशी वशिष्ट ने राम को उपदेश दिया केवल धनुष चलाना नहीं आत्म का बोध करना भी
05:45युद्ध से पहले ग्यान �
05:47राज से पहले विवेक यदि गुरु वशिष्ट ना होते तो राम के वल एक महान राजा होते आदर्श पुत्र कभी
05:55नहीं इतिहास यहां एक बहुत गहरी बात कह रहा है यदि ईश्वर स्वेम बिना गुरु के लोग का ल्यान नहीं
06:04कर पाते तो आज का मनुश्य एक ब्र
06:08परम सत का बोध करा के रम जाल से मुक्त किया सत को रूने ही इस मन को है मैं
06:32मेरी से रित किया
06:40बैरभाव का बैरभाव का कृपा करके अंत किया है इस जीवन में प्रेम को है सत कुरू ने जीवन्त किया
07:09महाभारत के मैदान में अर्जुन खड़ा है धनुश हात में है पर नेड़े डगमगा रहा है ग्यान तो है शक्ती
07:19भी है पर दिशा नहीं है तभी रत में बैठे गुरु ने कहा उठो पार्थ गीता का उबदेश विद्धाले में
07:28नहीं संकट की अवस्था में दे दिया ग
07:38कि पंक्तियां साकार सिद्ध होती है कि जब मश्वरा गुरु से मांगा जाता है तो मश्वरा भी मिलता है और
07:46गैवी मदद भी अर्जुन को किवल सला नहीं मिली भलकि उनका युद्ध दिशा में आ गया
07:53इतहास में एक भी उदारण ऐसा नहीं मिलता जहां ब्रमग्यान बिना गुरु के मिला हो और इसलिए किसी ने बहुत
08:02सची बात कही है कि मैंने अपनी जिंदगी का हर फैसला अपनी गुरु पर छोड़ दिया मेरा गुरु मुझे मायूस
08:10नहीं करता क्योंकि जिसने गुरु
08:13वो पकड़ लिया उसने सत्य को पकड़ लिया और हर पल गुरु ने भी साथ दिया इतहास में गुरु सिष्य
08:21का संबंद किसी अनुबंद से नहीं रहा ना वहां शर्ती थी ना अपेक्षाई थी वहां केबल प्रीम था नी स्वार्थ
08:31प्रीम ऐसा प्रीम जो प्रष्ट नह
08:42यह नहीं पूछता कि चंद्रमा से मुझे क्या मिलेगा कितना मिलेगा वो केवल उसे देखता रहता है फूल और भवरे
08:50जैसा जैसे भवरा फूल पर मंडराता रहता है यह नहीं देखता कि कितना रस मिल रहा है क्या नहीं मिल
08:57रहा ऐसे ही एक लव्य गुरु द्रोड़ाच
09:08प्रवेश के लिए विशक्ता नहीं होती एक लव्य ने मिट्टी की मूर्थी बनाई और उसे गुरु मान लिया दिन रात
09:16उसी के सामने अभ्यास करते रहते थे उसी को प्रडाम करते उसी को समरपड और प्रडाम क्या निकला इतहास गवा
09:25है अरजुन जैसा राजकुमार भी
09:28एक लव्य के कोसल के आगे चोक उठा जब गुरु ने अंगुठा मांगा तो एक लव्य ने ये नहीं पूछा
09:36कि क्यों उसने पूछा ही नहीं उसने दे दिया यही प्रेम है जहां अधिकार नहीं केवल अरपड होता है केवल
09:47समरपड होता है अब बारी है उपमन्यू की ज
09:58कि स्वेंग का कुछ भान ही नहीं रहता था
10:02भिक्षा मांगते पहले गुरु को देते और फिर कुछ बचता तो स्वेंग खाते
10:07एक दिन अत्यधिक त्याप के काड़न की दिर्ष्टी ही चली गई
10:11गुरु ने पूछा तुमने बताया क्यों नहीं कि तुम्हारी नेत्र ही चली गई
10:16उपमन्यों ने बोला सेवा में बाधा नहीं डालना चाता था
10:20गुरु ने अपने आशीर वाद से उनकी दिर्ष्टी को वापस लोटा दिया
10:26इत्यास कहता है गुरु की सेवा में खुद को जो खो देता है गुरु उसे नया जीवन दे देता है
10:34यहाँ ये पंक्तियां इत्यास की सासे हैं कि गुरु की खिदमत की आदत बना लो
10:42किसी चीज की कमी नहीं रहेगी
10:44उप मन्यों के जीवन में कमी आई
10:47पर अंत में पूनता मिल गई
10:51मनवीना के तार पे बन्दे गीत गुरू के गाये जा
10:58सुख पाएगा गुरू चर्णों से नित नित प्रीत लगाये जा
11:05गुरू ही कारज सिथ करेगा चलता चल तू गुरू सहारे
11:13गुरू खवईया बन जाए तो लग जाती है नाव किनारे
11:30शीष गुरू को अरपन करना तुझको जब आ जाएगा
11:35जन्म मनन से मुक्ती फाके अजर अमर पद पाएगा
11:42गुरू से बढ़ कर इस दुनिया में कौन भलाओ कुकारी है
11:47गुरू है रखा गुरू सहारा गुरू तेरा हितकारी है
11:53गुरू से बेमुखल कभी ना होना अंतकाल पच्चताएगा
11:59कहे हर देव गुरू ही तुझको तो से पार लगाएगा
12:06तुही नीरंका
12:11तुही नीरंका
12:21इसलिए इतिहास स्पस्ट कहता है कि सद्गुरू ग्यान से नहीं बलकी प्रेम से मिलता है
12:29और जरा रुकिए और जरा सैंग से पूछिए क्या ये प्रेम केवल इतिहास में था या आज भी संबव है
12:37यहां आत्मा को उतारने वाली ये पंक्तियां आती है
12:41लोग हजार मिन्नतों के बाद भी नहीं मानते लेकिन मेरा गुरू एक सजदे में मान जाता है
12:49क्यों? क्योंकि गुरू प्रेम की भासा समझते हैं
12:53वहां तरक नहीं, वहां समर्पन चलता है
12:57गुरू शिष्य का प्रेम लेने देने का नहीं, वो तो सौदा नहीं, वो खुद को सौप देना है
13:04और जब शिश्य अपने आपको पूरी तरह गुरू को शौप देता है, तो गुरू भी उसे पूरी तरह थाम लेते
13:12हैं, इसलिए इतिहास में जितने भी महान शिश्य हुए, उन्होंने एक काम समान रूप से किया, उन्होंने अपना निल्डे गुरू
13:21को सौप दिया, और अ�
13:28प्रशने ये है कि सिश्य कैसे जिये, जब उसने गुरू को सुईकार कर लिया, उसने सद्गुरू को सुईकार कर लिया,
13:37जब जीवन का हर मोड, हर फैसला, हर पीडा सद्गुरू के हवाले कर दिया, तो क्या होगा, गुरू शिश्य परमपरा
13:46में सबसे कठिन वाक्य कोई �
13:53मैं नहीं क्योंकि मैं एंकार है और मैं डर भी है और नियंतरण की आखरी कोशिश भी मैं है और
14:05जब शिशिक कह देता है कि मैं नहीं बस तू तो वहीं से रहमत जीवन में आ जाती है
14:13कबीर ने गुरू को शब्दों से नहीं अपने आपके मिटने से पाया और उन्होंने कह भी दिया कि जब मैं
14:21था तब गुरू नहीं अब गुरू है तो मैं नहीं
14:25कबीर यहां दर्शन नहीं दे रहे
14:28वे अनुभव सुना रहे हैं
14:31वे कह रहे हैं जब मैं था तो गुरु दिखाई ही नहीं दिये
14:35और जिस दिन मैं मिट गया तो गुरु प्रकट हो गए
14:39गुरु किसी नए के मिलने से नहीं बलकि पुराने के मिटने से आते हैं
14:45जब शिश्य अपनी जीवन का नियंतरण गुरू को सौब देता है, तो उसकी जीवन के भीतर एक अदबुद भरोसा जनम
14:54ले लेता है, यही भरोसा जो इन पंक्तियों में चलगती है,
14:57मैंने अपनी जन्दगी का हर फैसला अपने गुरू पर छोड़ दिया, मेरा गुरू मुझे मायूस नहीं करता, यह वाकि कमजोरी
15:13नहीं है, यह सरवोच शाहस है, क्योंकि हर फैसला खुद लेना असान है,
15:19पर हर फैसला गुरू को सौब देना किफल वही कर सकता है, जिसे गुरू पर पूर्ण यकीन हो, अपने प्राणों
15:27से भी ज़्यादा भरोसा हो,
15:30रहीम ने गुरू के मूर्टी के लिए कुछ भाव कहे थे, गुरू गोविंद दोग खड़े, खाके लागों पाए, बलिहारी गुरू
15:39आपने गोविंद दियो बताए,
15:41रहीम स्पस्ट कहते हैं कि ईश्वर का भी पता गुरू ही बताता है, यानि ईश्वर तक पहुँचाने का मार्ग भी
15:50सद्गुरू से हो कर जाता है, जिस सिश्य ने गुरू को सब कुछ सौप दिया, उसके जीवन में एक बात
16:01जरूर घटती है,
16:02चिंता समाप्त हो जाती है, क्योंकि अब जीवन का भार उसके कंदों पर नहीं, बल्कि गुरू की किर्पा पर होता
16:11है, गुरू की रहमत पर होता है, यहीं ये पंक्तियां भी सच होती हैं, कि जब सुकून की तलब सताया
16:22करे, तब लोगों को नहीं अपने गुरू को याद
16:26किया करो, अपने गुरु को याद किया करो, लोग आपकी समस्या सुन जरूर लेते हैं, लेकिन गुरु आपकी समस्या हल
16:35कर देते हैं, कबीर कहते हैं, गुरु बिन ग्यानिन उपजे, गुरु बिन मिलेन मोग्ष, गुरु बिन लिखेन सत्य को, गुरु
16:45बिन मिटेन दोश, �
16:47ये चारपंग्तियां पूरी इतिहास का निश्कर्श हैं, जहां ग्यान नहीं, मुक्ती नहीं, सत्य नहीं, दोशों का नाश नहीं, बिना गुरू
16:57के कुछ भी नहीं।
16:59एक समर्पित शिष्य की पहचान ये नहीं होती कि वो कितना जानता है, बल्कि उसकी पहचान ये है कि वो
17:07कितना जुगता है, कितना गुरू के उपर अपने आप को सौपता है, कितना चुप रहता है, और जब गुरू देखते
17:16हैं कि शिष्य ने अब अपने आप के लिए कु�
17:29बाद भी नहीं मानते लोग हजारो मिन्नतों के बाद भी नहीं मानते लेकिन मेरा गुरु एक सजदे में मान
17:53लेते हैं लेकिन अब एक आखरी और निर्णायक प्रश्न बज़ता है कि इतहास दोहे कहानिया ये सब तो सिद्ध कर
18:04चुके कि गुरू अनिवारे है पर आज के समय में वो गुरू है कौन जो साकार रूप में हमें थाम
18:13सके और उत्तर है साकार सत्गुरू क्योंकि सदियों से
18:19मनुष्य एक ही सत्य की तलास कर रहा है वो है निराकार वही निराकार जिसे वेदों ने कहा जिसे उपनिशदों
18:30ने खोजा जिसे संतों ने गाया पर प्रश्न ये नहीं कि निरंकार है या नहीं प्रश्न ये है कि मनुष्य
18:39निरंकार को पहचाने कैसे क्योंकि आखें तो सि
19:12परसंसार उन्हें पहचान नहीं पा रहा
19:15और उससे भी अधिक दुखत बात तो ये है, कि कई बार हम उनकी शिश्य होकर भी ब्रहमित हो जाते
19:22हैं, हम ये सोच लेते हैं, ये तो हमारे जैसे ही दिख रहे एक इंसान है।
19:28ये ही नजरों का सबसे बड़ा धोका है, क्योंकि सद्गुरु को देह में सिमित कर देना अग्यान है। इसी सत्य
19:37को बहुत इसपस्ट शब्दों में बाबा हरदेव सिंग जी ने हरदेव वानी में फरमाया है।
19:58गुरु का गुरु होता है, गुरु वचन का पालन हो।
20:28ये ही प्रभु निरंकार है। दम दम पल छिन जोड़े रखना इस से मन की तार है।
20:37सद्गुरु देह का नाम नहीं है, सद्गुरु होता ग्यान है।
20:43सद्गुरु को इक देह समझना भूल है अग्यान है।
20:49सद्गुरु देह का नाम नहीं है, सद्गुरु होता ग्यान है, सद्गुरु को इक देह समझना भूल है अग्यान है।
20:58देह तो माध्यम है, जैसे दीपक तेल से अलग नहीं होता, पर तेल ही दीपक नहीं होता, सद्गरु ज्यान है,
21:07और वो ज्यान आज मानवी रूप में हमारे बीच चल रहा है, बोल रहा है, जी कर सिखा रहा है,
21:16आज सद्गरु हमें उबदेश नहीं दे रहे, वे हमें जीने क
21:20सही तरीका सिखा रहे हैं
21:22खुद जीकर छमा कैसे करा जाए
21:25धैर कैसे रखा जाए
21:27एंकार के बिना अधिकार कैसे निभाया जाए
21:30ये सब सास्त्रों में नहीं
21:33सद्गुरु के जीवन में दिखाई दे रहा है
21:35पर समस्या हमारी दृष्टी में है
21:38हम चमतकार ढूडते हैं
21:40जबकि सद्गुरु हमें अपना चरत दिखा रहे हैं
21:43हम आकाश के उड़ देखते हैं
21:46जबकि सत्य हमारे सामने खड़ा होता है
21:49यहीं किसी ने कोख बहुत खोब लिखा है
21:52कि जब सुकुन की तलब सताया करे
21:56तब लोगों को नहीं अपनी गुरु को याद किया करो
21:59क्योंकि आज सुकुन कहीं बाहर नहीं
22:02सुकुन सद्गुरु की शरण में है
22:04जिस दिन शिशे ये समझ लेता है
22:07कि सद्गुरु कोई साधारण व्यक्ती नहीं
22:10बलकि निरंकार की ही जीवित अभिवक्ती है
22:26भी है, मुस्कुराता भी है, शमा भी करता है, प्यार भी करता है। सद्गुरु साकार के रूप में अब निर्णे
22:35इतिहास को नहीं करना है, सब्दों को नहीं करना है, बलकि निर्णे अब हमें करना है। क्या हम देखेंगे या
22:44फिर हम ग्यान को पहचान कर ग्यान को जीएं�
22:48सद्गुरु साकार की उपर अपनी आज को चिका कर
22:54हर पल इनकी याद में रहकर
22:58इनको हर पल ध्या कर
23:00सिम्रन करके इनका आसरा लेकर
23:04हर पल इनके चरड़ों का ध्यान करके
23:07तो हैपी बटते सद्गुरु मातची
23:11क्योंकि आप से ही हमारा हर दिन हर पल है
23:16इसलिए आपका जनम दिन हम सब को मुबारक है
23:57इक तो ही निरंका है
24:16इसलिए निरंका है

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