00:00ये आदमी नहीं है, ये घंटा है, ये घंट घड़ियाल है, नियम बजा रहा है बस
00:07विशेशकर हिंदुस्तान में ये बड़ी बात होती है, कि जिन्दगी तो देखो हमारी बिल्कुल नियमित है
00:12सहाब मुणशी जी, जब घर की घंटी बजाते हैं, तो हम अपनी घड़ी सेट कर लेते हैं कि शाम के
00:196 बजे होगे
00:20पिछले पौने 400 साल से मुणशी जी ठीक 6 बजे घर वापस आ जाते हैं, तो जब घंटी बजती है
00:26तो हम घड़ी उससे मिला लेते हैं
00:28अब 6 घड़ी में सेट कर दो मुणशी जी की, अगर घंटी बजी है तो माने 6 बज गया होगा,
00:32देकार है मुणशी जी की जिंदगी पर, यह आदमी नहीं है, यह घंटा है, यह घंट घड़ी आल है, नियम
00:38बजा रहा है बस, मैं तुझी ठीक 6 बजे उठ जाती हूं, क्यों
00:42अब जाती है, क्यों उठ जाती है, मत उठ, और 6 पचास पे इंकम बिल्कुल चाय हाजिर कर देती हूं,
00:49खुद पी जा, क्या बात है सर, क्या बात है सर, क्या बात, यह बात है, कुछ तो अलग कर,
00:55तुझी कैसे पता चलेगा अपना कुछ, मशीन को आत्मग्यान होता है, ते
01:11वो लोगे घड़ी जिन्दा है जिन्दा तो वो है जो समय को भी दुद्कार सके
01:16खुद को तोड़ना जंजोड़ना सीखो जो धर्रे बन गए उनको ढहाना सीखो
01:21जिस भी तरीके से जीने की आदेट डाल ली है सचेश्ट उसको तोड़ो खुद न तूट रहा हो तो जबरदस्ती
01:29तोड़ो
Comments