00:28नमस्कार
00:34द्वार सदा खुले हैं, किन्तु पंची उड़ नहीं बाता, यही माया है, यही माटी की इस देह की कहानी है,
00:42कैसा खिलोना है, पंच, कोश और नौ द्वार, दो आख, कान, नाख, मुहुगुदा, मोत्र द्वार, यह सारे पंचे तत्व के
00:51प्रतीख हैं, देही कर्मों के सं�
00:53जालक हैं, सभी स्थूल प्राणी यूगलों में कारे करते हैं, शर्ष्ष्टी के अंग हैं, और प्रक्रती के नियंत्रण में कारे
01:00करते हैं, इनके भीतर ही प्राण रूप आत्मा पंची का वास है, आत्मा भी इस्त्री पुरुष में समान है, देह
01:07भी समान है, फिर इस्त्
01:22,
01:22,
01:22,
01:23,
01:23,
01:23AUTAGNURABANGASYYA KAKA BRAHMINKA MARG HOOTA HAYE
01:24ISKA JIVANKI DHANIC GATIVIDHIYON SE JUDAURAB NAHIN HOOTA
01:28ISKKO DAS BAIN DWAAR KAHA JUATA HAYE
01:30BRAHIN MEH ISI MARG SEY STRI SHAREER MEH PRAVEYASH KARTA HAYE
01:34OR ISI MARG SEYONI ROOP SHAREER DHARAN KARKKE BAHAR AATTA HAYE
01:38YAH MARG CHANDDRAMA DWAARA NILLANTRIT RHETA HAYE
01:42MAASIK AARTM HIN DWAAR KHOLTA HAYE
01:44JOO CHANDRIS MAASSE NILLANTRIT HAYE
01:47AARTMAS SURYANSH HAYE
01:49चंद्रमा सूर्य पत्नी हैं
01:50ये दमपती ही अग्नि सोमात्मक यग्य से ब्रह्म का आवान करते हैं
01:55यही बीज योशागनी में आहुत होकर सूक्ष्म शरीर में प्रतिष्ठित हो जाता है
02:01चांदोग्य उपनिशद में पंचागनी का वर्णन है
02:04जो जीवात्मा की सूक्ष्म से स्थूल तकी यात्रा का विवर्ण है
02:09इस्त्री शरीर में पंचागनी का अंतिम पड़ा होता है
02:12मंत्र कहता है
02:13योशा वाव गोतमा अग्निस तस्या उपस्थ एव समिद्य दुप्त मंत्रयते
02:18सर धुमो योनिर अर्चिर तर्यन
02:21अंतह करोती ते अंगारा
02:24अभिननदा विस्फुलिंगा हा
02:26तस्मिन ने तस्मिन अग्नो देवा रेतो जुमती
02:29तस्या आहुतेर गर्भः संभवती
02:32अर्थात है गोतम
02:33इस्त्री ही अग्नी है उसका उपस्थ समिदा है
02:36शरीर के रोम धुआ है
02:38योनि ज्वाला है
02:39क्रिया अंगारे है
02:40सुख चिनगारिया है
02:42देवता इस अग्नी में रेत की आहुती देते है
02:45संतान पुरुष उत्पन होता है
02:47योशा वा अग्निर गौर्तम
02:49तस्या उपस्थ एव समिल लोमानी
02:52धूमो योनिर अडची
02:54ब्रहदारन्यक उपनिशत का भी यही मंतव्य है
02:56दोनों ही मंत्र लगभग
02:58एक सार्थ कर रहे है
02:59इस्त्री शरीर वेदी है
03:01अग्नी समिधा धुआ
03:03ज्वाला तो स्थूल शरीर के अंग है
03:06अंगारे विक्यान और सुख तो आनंद है
03:09जिसके अभाव में ज्रिष्टी संभव नहीं है
03:11माया का यह संसार इस्त्री के भौतिक शरीर का अंग तो है
03:16किन्तु इसके क्रियाए स्वतंत्र है
03:18क्योंकि प्रजिनन की सभी सूश्म क्रियाएं चंद्रमा पर आधारित है
03:24मासिक चक्र
03:25चंद्रमास तथा मंगल ग्रिह के प्रभाव से होता है
03:28चंद्रमा मन का स्वामी है
03:30संतान के लिए मन चंद्रमा का शक्ति युक्त पूर्ण शांत प्रसन होना आविश्यक है
03:35चंद्रमा जल तत्व और भावना का स्वामी भी है
03:39इस्त्री शरीर भी जल प्रधान, रक्त, रज, गर्भ, द्रव्य आदी होता है
03:45चंद्रमाही पितर लोक भी है, आत्मा गर्भ में चंद्रमा के माध्यम से आता है
03:50चंद्रमाही अत्री पुत्र है, आत्तव ही ज्वार भाटा के सिध्धान्त से प्रभावित होता है
03:56पूर्णिमा अमावस्या भी मन के संचालक है, पूर्णिमा को भावनाय उद्दिप्त रहती हैं और रक्त प्रवाह तेज, अमावस्या को मानसिक
04:05चिंता और तनाव, चंद्रमा प्रजनन क्षेत्र का कारक है, शिष्टी का मात्री भाव है, कमजोर चंद्रमा इस्त्री रोग क
04:15astra dehan apara prakrati dua tathar dhasmah dhar para prakrati ka kshetra hoonay se sūkšnuk riyao ka kshetra hai dhasmah
04:23dhwar istri ki apani divyata ki swatantra virasat hai is par istri ki devatwa kahi eqadikar rehatta hai
04:30पुरुष शायद इस सथ्य से सर्वथा अन्भिग्य ही रहता है कि इस्त्री शरीर का यह क्षेत्र मूल शरीर से स्वतंत्र
04:38कारे करता है
04:39जहां इस थूल शरीर पंज भूतों से निर्मित जड़ पिंड है वहीं इह स्रिष्टी का प्रवेश द्वार है
04:46इसके माध्यम से नई चेतना जगत में प्रवेश करती है ब्रह्म इसी मार्ग से जीव रूप में अवतरित होता है
04:53अतहर दिव्य मार्ग है इस्त्री रूप में माया निराकार ब्रह्म को साकार रूप देती है
04:59गर्भस्त चेतना पर माके संसकार, भावनाय और विचार सीधे प्रभाव डालते हैं
05:06शांत सात्विक योग मई इस्त्री का गर्भ एक तपोव हुई है
05:10यहीं से उच्च कोटी का आत्मा संसार में प्रविष्ट होता है
05:14इस्त्री का दस्वान द्वार केवल जैविक न होकर चैतन्य का प्रवेश निकास द्वार है
05:20ब्रह्म यहां एक नए आत्मा के रूप में आता है
05:23इस्त्री उस चेतना को कोशित करके जगत के लिए एक दिव्य उपहार बनाती है
05:29वैज्यानिक द्विष्टी से शरीर एक अध्भुत जैविक प्रणाली है
05:32जिसमें स्रीजन की क्षमता प्रकृति का चमत्कार है
05:36चेतना पूरुष और नारी प्रकृति है
05:39चेतना द्रिष्टा निरबुण आधार है
05:42प्रक्रतिस रिजन की क्रियाशील उर्जा और गती है दस्वे ब्रह्म द्वार पर शक्ति चेतना के अवतरण का माध्यम बनती है
05:51अन्य और नाद का युगल सगुन निर्गुन सूक्ष्म स्थूल का पूरक युगल है
05:57केवज शरीर की पुष्टी से चेतना जागरत नहीं होती इसके लिए नाद चाहिए ब्रह्म का इसपंदन ही नाद है
06:04धनी रूप में चेतना का प्रवा है गर्भ में शिशु पहले नाद माकी धरकन धनी संगीत आधी के माध्यम से
06:12चेतना को संसकारित करता है
06:14आने वाली चेतना को जगत के लिए तैयार प्रता है
06:19नाद ही चेतना का भूजन है चेतना की माता है
06:23इस्त्री अन है पुरुष नाद इस्त्री मूर्थ आधार पोशन और धारन करने वाली भूमी है
06:29पुरुष अमूर्थ स्पन्दन चेतना का स्वर है, अन बिना नाद जड़ है और नाद अन के बिना निराधार
06:40एक और हमारे शास्त्रों का यह उद्घोश है और दूसरी और वह विलासिता का साधर बनती जा रही है
06:48इस्त्री माया है, ब्रह्म की शक्ती है, शक्ती चेतना के बिना जड़ है, शक्ती के बिना चेतना अव्यक्त है
06:55इस्त्री दो स्तरों पर जीती है, इस थूल भी सूक्षनों की, उसकी दिवयता का आधार भी उसके दो शरीर ही
07:02है
07:02हम पढ़ चुके हैं कि विवा के बाद इस्तरी का आत्मा पूरुषात्मा से युक्तु होकर सूक्ष मुस्रिष्टी जीवात्मा का अवतरन
07:10जगत में संभव करते हैं
07:12इस्तरी गर्भस्त शिशु की देह का निर्मान स्वयम की देह से ही करती है
07:17वास्तव में तो संतान का शरीर माता ही है
07:20वही जीव के आत्मा को संसकारित करती है
07:24अभिमन्यू बनाती है
07:25अंतर ज्यान और परोक्ष भार्षा भी उसकी दिव्यता का प्रमान है
07:29परोक्ष प्रिया इभी देवाहा कहा गया है
07:33नमस्कार
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