00:00एक व्रिद्ध थे सत्तर वर्षिय जम से द्रिष्टीन पर उनके पास एक अनोखी द्रिष्टी थी वो लोगों के मन पढ़
00:10लेते एक दिन एक युवक तीस वर्षिय आया बाबा मैं बहुत परिशान हूँ
00:17बाबा ने कहा तुम्हारे दिल में एक गांट है कैसे बता तुम्हारी आवाज में कैसे खुलेगी किसी से माफी मांगो
00:27जिसे तुमने बहुत पहले तकलीव दी युवक गया माफी मांगी लौट कर आया हलका बाबा ने कहा अब दिखा आखे
00:38तो नहीं है दिल की आखें वो का
00:41शिक्षा सनातन में दिव्य द्रिष्टी आखों की नहीं आत्मा की द्रिष्टी जो बाहर देखता है वो सपना देखता है जो
00:52भीतर देखता है वो जागता है ध्यान भीतर की आख खोलता है ओम नमस्षिवाए
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