00:00रात के बार है बज रहे हैं, पहरवगरडगाव की तरफ जा रही ट्रेन का जनरल डिबबा एकदम खाली है, चट
00:07की लाइट जल रही है लेकिन बहुत कमजोर पीली रोशनी में, बाहर घना अधिरा है, खिड़की के काँच पर बारिश
00:16की बूंदें धीरे धीरे फिसल रही है
00:19और इसी डिबबे की एक सीट पर विक्रम और समीर बैठे हैं, विक्रम फाइल देख रहा है, उसके चहरे पर
00:28जुंजला हट है, पूरे डिबबे में सन्नाटा है, ट्रेन के चलने की एक करस आवाज, और कभी-कभी सीटी की
00:41लंबी डरावनी गूंज,
00:46अचानक ट्रेन के सन्नाटे में समीर का मोबाइल बज उठता है, वह चौक कर जेब से फोन निकालता है, स्क्रीन
00:54पर नाम चमक रहा था, H.B. साहाब, नेटवर्क की बस एक-दो लकीरे थी, जैसे कॉल अभी तूट ही
01:04जाएगी, समीर कॉल उठा लेता है,
01:07हेलो, सर, हाँ, हम बस पहुँचने ही वाले हैं, लेकिन सर, ये कैसी जगह भेज दिया है आपने, मैप पर
01:17तो ये गाउँ दिखता भी नहीं है,
01:18हाँ, इसलिए तुम्हें कॉल किया है, समीर, गाउं में जाकर फाइल साइन करो, और दोनों सुभे वापस आ जाओ, मुझे
01:28अभी पता चला, वो गाउं कुछ ठीक नहीं है,
01:31समीर कहता है, हेलो, सर आवाज कट रही है, मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है, कल बात करते हैं,
01:41ऐसा कहकर समीर कॉल काट देता है, तभी विक्रम हलकी, चिन्ता और जिन्यक के साथ पूछता है,
01:49क्या हुआ, सर ने क्या कहा, समीर सिर हिलाते हुए, थोड़ा घुस्से में जवाब देता है, कुछ नहीं, बस आवाज
01:58कट गई, यहाँ नेटवर्क सही से काम ही नहीं कर रहा,
02:00तभी विक्रम बैग में फाइल रखते हुए जुझला कर बोला, हद है यार, प्रमोशन के लिए लोग शेहर भेजे जाते
02:08हैं, और हमें इस जंगल जैसे गाव में भेज दिया गया है,
02:12विक्रम ने धीरे से बैग को गोद में टिकाया और फाइल पर हाथ फेरते हुए,
02:17हम ग्राम विकास अधिकारी हैं, यहाँ विकास किसका करेंगे, इस जंगल का,
02:23तभी ट्रेन के डिब्बे में अचानक गहरी खामोशी चाह जाती है,
02:28पहियों की खड़खडा हट अब पहले से ज्यादा तेज और पास से आती लगती है,
02:33जैसे अंधिरे में कोई उनकी हर हरकत देख रहा हो,
02:38तभी डिब्बे के आखिरी छोर से एक आकरती धीरे धीरे नजर आती है,
02:45जो एक टीटी था, लेकिन कुछ भी सामान्य नहीं था,
02:50उसका कोट पुराना था, चेहरा टोपी के साय में आधा छिपा था,
02:55वह धीरे धीरे किसी जल्दी के बिना समीर के पास आता है,
03:00हाथ में रजिस्टर और पैन लिये हुए, तभी समीर टिकट दिखाते हुए कहता है,
03:07ये लीजिए सर, भैरवघड स्टेशन आने वाला है ना,
03:11टीटी बिना टिकट देखे कहता है,
03:13भैरवघड के लिए कोई टिकट नहीं लेता,
03:16विक्रम पूछता है,
03:17मतलब,
03:18टीटी दोनों के करीब जुक कर,
03:21फुस-फुस आते हुए कहता है,
03:22उस स्टेशन पर ट्रेन रुकती नहीं है,
03:25रोकी जाती है,
03:27अकसर वहाँ हाथ से होते रहते हैं,
03:30अगर जान प्यारी है,
03:31तो उतरते ही स्टेशन मास्टर के कमरे में चले जाना,
03:35और पीछे मुड़कर पठरियों को मत देखना,
03:37समीर अचम्बित होकर,
03:39क्यों,
03:40ऐसा क्या है इस गाम में,
03:42टीटी जवाब नहीं देता,
03:44और वहाँ से चला जाता है,
03:48ट्रेन के ब्रेक लगने की बहुत तेज,
03:50कान फाड़ देने वाली आवाज,
03:54समीर और विक्रम,
03:55दोनों ट्रेन से उतरते हैं,
03:56स्टेशन बेहत पुराना है,
03:58दीवारों पर जाड़ियां उगाई है,
04:00कई पीपल के पेडों के बीच,
04:02एक छोटा सा स्टेशन खड़ा है,
04:04जहां भैरव घड लिखा बोर्ड जंग खा चुका है,
04:07तोनों के उतरते ही ट्रेन तुरंत चल पड़ती है,
04:11जैसे वह वहाँ एक पल भी रुकना नहीं चाहती,
04:14स्टेशन पर कुत्ते के रोने की आवाज गूंज रही है,
04:19कोई इंसान नहीं है,
04:20सिर्फ गना कोहरा और जींगुरों की तेज आवाज है,
04:25विक्रम और समीर स्टेशन मास्टर के केबिन की तरफ जाते हैं,
04:29खिड़की पर एक लाल टेन टंगी है,
04:32अंदर एक बहुत बुढ़ा स्टेशन मास्टर बैठा है,
04:35जो रजिस्टर में कुछ लिख रहा है,
04:37तभी समीर कहता है,
04:38सुनिये काका,
04:40हम इस गाव के नए अधिकारी हैं,
04:42गाव जाने का रास्ता कहां से है,
04:45बुढ़ा धीरे से सिरोठाता है,
04:48उसकी एक आँख पत्थर की है,
04:51पूरी सफेद,
04:52स्टेशन मास्टर कापती आवाज में बोलता है,
04:55आज रात यहीं रुख जाओ बाबुजी,
04:58यहां की वेटिंग रूम में,
05:00सुबह चले जाना,
05:02तभी समीर कहता है,
05:04नहीं काका,
05:05ड्यूटी है,
05:06हमें आज ही रिपोर्ट करना है,
05:08रास्ता बता देंगे तो हम चले जाएंगे,
05:11स्टेशन मास्टर उंगली उठा कर,
05:13अंधेरे जंगल की तरफ इशारा करता है,
05:16और कहता है,
05:16वो पगडंडी देख रहे हो,
05:18पट्रियों के उस पार,
05:20वहां से दो किलो मीटर दूर है गाउं,
05:22तभी समीर कहता है,
05:24ठीक है, शुक्रिया काका,
05:25यहां कोई रिक्षा मिलेगा,
05:28स्टेशन मास्टर अजीब सी हसी हसता है और कहता है,
05:32रिक्षा,
05:33उस रास्ते पर तो परिंदा भी पर नहीं मारता,
05:37पैदल ही जाना होगा,
05:38और सुनो,
05:39रास्ते में अगर कोई तुम्हारा नाम पुकारे,
05:42तो जवाब मत देना,
05:55और सवेरे तक मत खोलना,
05:57समीर अपने डर को छिपाते हुए कहता है,
06:01आप लोग भी ना,
06:03हमें डरा रहे हैं,
06:05हम चलते हैं,
06:06विक्रम सोच में पढ़ जाता है,
06:08और स्टेशन मास्टर से कहता है,
06:10काका, ऐसे क्यों बोल रहे हो,
06:11क्या इस रास्ते पर कोई खतरा है,
06:14तभी स्टेशन मास्टर कहता है,
06:17ये बहुत लंबी कहानी है बेटा,
06:19एक छलावे की,
06:21तभी समीर विक्रम का हाथ पकड़ कर,
06:24उसे वहाँ से ले जाता है,
06:27और कहता है,
06:29अरे भाई, बहुत देर हो चुकी है,
06:32ये कहानियां सुनने का वक्त नहीं है,
06:36दोनों पटरियां पार कर जंगल के रास्ते पर आ जाते हैं,
06:39समीर ने अपने फोन की फ्लैश लाइट जला रखी है,
06:42गली जैसा पतला रास्ता है,
06:44दोनों तरफ जाडियां और उंचे उंचे बांस के पेड़ खड़े हैं,
06:48हवा चलने पर पांस आपस में रगड़ते हैं,
06:52बांसों के रगड़ने की आवाज ऐसी लगती है,
06:55जैसे कोई रो रहा हो,
06:59समीर और विक्रम तेज कदमों से चल रहे हैं,
07:03अचानक उन्हें महसूस होता है कि उनके कदमों की आवाज के अलावा भी एक तीसरी टाप सुनाई दे रही है,
07:10समीर पलट कर फ्लैश लाइट मारता है,
07:13कुछ नहीं, सिर्फ गना, कोहरा,
07:16समीर दबी आवाज में कहता है,
07:17कौन हैं, हम सरकारी अफसर हैं, जो भी है, सामने आओ,
07:23वरना अंजाम बहुत बुरा होगा,
07:25तभी हवा में एक बहुत ही मधूर लेकिन डरावनी आवाज गूंजती है,
07:31एक औरत की,
07:33कहां जा रहे हो, बाबु जी,
07:35आवाज आते ही,
07:36समीर के फोन की लाइट अचानक फलिकर करने लगती है,
07:40और फिर बंध हो जाती है,
07:43जंगल के बीचों बीच अब समीर और विक्रम घने,
07:47पिच ब्लैक अंधिरे में खड़े हैं,
07:49समीर घबरा कर फोन को ठोकता है,
07:52तभी उसके ठीक कान के पास,
08:05समीर घबरा कर विक्रम का हाथ पकड़ लेता है,
08:08और दोनों आगे की ओर भागने लगते हैं,
08:11वे अंधा धुंद दोड़ते हैं,
08:14उन्हें पता नहीं है कि वो कहां जा रहे हैं,
08:17भागते हुए समीर का पैर अचानक जमीन से,
08:20निकली एक मोटी जड़ में उलज जाता है,
08:25वह संतुलन खो देता है,
08:28और धडाम से गिर जाता है,
08:31उसकी आँखें बंध हो जाती हैं,
08:35विक्रम हाफता हुआ उसके पास पहुँचता है,
08:38घुटनों के बल बैटकर समीर का चेहरा पकड़ता है और कहता है,
08:42समीर, क्या हुआ, उठ, कोई आ रहा है समीर, उठ,
08:46विक्रम उसका कंधा हिला कर है कहता है,
08:48समीर, उठ, उठ जा समीर,
08:51समीर कोई हरकत नहीं करता,
08:54तभी जंगल के भीतर से,
08:56एक धीमी हंसी उबरती है,
08:58पहले बहुत दूर,
09:01फिर अचानक बहुत पास,
09:03तूटी हुई,
09:05सांसों में डूबी हंसी,
09:09विक्रम की उंगलियां,
09:10समीर के कंधे से अपने आप छूट जाती है,
09:13उसकी रीड में सिहरन दौड जाती है,
09:16वह चारों तरफ देखता है,
09:18अंधेरा,
09:20जाडियां,
09:21और वही हंसी,
09:24हंसी अब तेज हो जाती है,
09:27जैसे कोई उसे देख रहा हो,
09:30उसका डर छक रहा हो,
09:33विक्रम की आँखें भर आती हैं और वह कहता है,
09:35माफ कर दे न भई,
09:36वह समीर की तरफ एक आँखिरी नजर डालता है,
09:40और बिना पीछे देखे भाग पड़ता है,
09:43वह दोड़ता है,
09:45सांस टूट रही है,
09:48दिल सीने से बाहर कूदने को है,
09:51अचानक उसके पैर रुख जाते हैं,
09:53उसके सामने एक पुराना कुवा,
09:56कुवें की गोल टूटी हुई मुंडेर,
09:58और ठीक उसके पीछे,
10:00एक विशाल बरगत का पेड,
10:02इतना पुराना कि उसकी जड़े जमीन नहीं,
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