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🚂 छलावा: एक खौफनाक सफर | Haunted Train | Hindi Horror Stories
क्या आपने कभी आधी रात को किसी सुनसान पटरी पर अजीब आवाजें सुनी हैं? इस कहानी में हम आपको ले चलेंगे एक ऐसी ट्रेन के सफर पर, जहाँ का मुसाफिर कोई इंसान नहीं, बल्कि एक 'छलावा' है। जब एक साधारण सा दिखने वाला सफर अचानक मौत के साये में बदल जाता है, तो क्या कोई जिंदा बच पाएगा? रोंगटे खड़े कर देने वाली इस Animated Horror Story को अंत तक जरूर देखें।

वीडियो में क्या खास है:

😱 रूह कंपा देने वाला सस्पेंस

👻 छलावे का रहस्यमयी साया

🎨 बेहतरीन 2D/3D एनिमेशन और डरावने साउंड इफेक्ट्स

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⚠️ Disclaimer (डिस्क्लेमर)
अस्वीकरण:
यह वीडियो केवल मनोरंजन (Entertainment) के उद्देश्य से बनाया गया है। इस कहानी के सभी पात्र, स्थान और घटनाएं काल्पनिक हैं। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, धर्म, समुदाय या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। कमजोर दिल वाले और बच्चे इस वीडियो को सावधानी से या बड़ों की देखरेख में देखें।

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Transcript
00:00रात के दस भज रहे हैं नागपुर का एक छोटा सा स्टेशन विलास नगर
00:04वैसे तो यहां मुंबई जाने वाली ट्रेन हमेशा टाइम पर आती है लेकिन आज घड़ी की सुईयां आगे बढ़ रही
00:10है
00:10पर ट्रेन का कोई अता पता नहीं है
00:17कबीर बेंच पर अकेला बैठा है
00:18कल उसका रेलवे पुलिस का एक्जाम है
00:21दिमाग में टेंशन है और आखों में नींद
00:24लेकिन नींद से ज्यादा उसे वो सन्नाटा परिशान कर रहा है
00:29पूरे स्टेशन पर सिर्फ एक पुरानी पीली लाइट जल रही है
00:33ग्यारह बज गए
00:35कोई एनाउंसमेंट नहीं कोई टीटी नहीं कोई आतरी नहीं
00:37ऐसा लग रहा है जैसे पूरी दुनिया सो गई है
00:42सिवाय कबीर के
00:43स्टेशन पर बस वो और वो हिलती हुई पीली लाइट दिख रही है
00:47ठीक बारह बजे
00:48पटरियों में एक अजीब सी सिहरन हुई
00:51दूर अंधिरे को चीरती हुई
00:54एक हेडलाइट दिखाई दी
00:57ट्रेन आ रही थी
01:06ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी
01:08पूरी ट्रेन साइलेंट थी
01:09कबीर को एक पल के लिए लगा कि उसे नहीं जाना चाहिए
01:13लेकिन एक्जाम का टर उस अंजाने डर से बढ़ा था
01:17उसने एक गहरी सांस ले
01:20और उस अंधेरे डिब्बे के अंदर कदम रख दिया
01:30कबीर बोगी के अंदर दाखिल हुआ
01:33उसकी नजरें एक कोने से दूसरे कोने तक गई
01:36सीटें गलियारा उपर की बर्थ सब कुछ खाली था
01:40पूरी बोगी में एक भी यात्री नहीं था
01:43कबीर एक बल के लिए ठिटका
01:45उसे थोड़ी हैरानी हुई
01:47कबीर आपने आपसे बड़बडाते हुए कहता है
01:50अरे यार यहां तो एक भी पैसेंजर नहीं दिख रहा है ऐसा कैसे
01:55कबीर सोच में पढ़ जाता है और फिर थोड़ा रिलैक्स होकर
01:59खुझ से बात करते हुए कहता है
02:01शायद ट्रेन काफी लेट हुई है
02:03इसी लिए कोई नहीं आया
02:06चलो
02:08अच्छा ही है
02:09भीड नहीं है तो नींद अच्छी आएगी
02:12उसने ये बात कह तो दी
02:14लेकिन सिर्फ अपने मन को बहलाने के लिए
02:18हकीकत वो भी जानता है
02:21जुबान ने जूट बोलकर सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश की है
02:25लेकिन उसका दिल अभी भी जोरों से धड़क रहा है
02:44ट्रेन अब पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी
02:47बाहर सिर्फ घना अंधेरा था
02:49और अंदर ट्रेन के पहियों का कभी न रुकने वाला शोर
02:55कबीर ने सोने की कोशिश की आँखें बंद की
03:00लेकिन डर उसकी पलकों पर बैठा था
03:04नीन दाना तो दूर आग बंद करना भी भारी पड़ रहा था
03:08मन ही मन घबराहट में कबीर सोचता है
03:12यार कोई तो आजाओ
03:14कोई एक पैसेंजर भी आजाए तो जान में जाना आए
03:17तभी घड़ी देखकर खुद को समझाते हुए कहता है
03:22अभी तो दस से बारे घंटे का सफर है
03:28ऐसे बैठकर कैसे कटेगा
03:30मुझे अभी सो जाना चाहिए
03:32चाहे नीन दाए या नाए
03:34कबीर ने हिम्मत करके जैसे ही अपनी आँखें बंद की
03:37तभी डिब्बे के दूसरे छोर से एक आवाज आई
03:48कबीर का दिल एक पल के लिए रुख गया
03:50पायल की आवाज इस खाली ट्रेन में
03:53उसकी हालत डर से और खराब हो गई
03:55उसमें इतनी हिम्मत भी नहीं थी
03:57कि वो उठकर देखे की आवाज किसकी है
04:06पायल की आवाज तेज होती जा रही है
04:09पास आ रही है
04:18तेजी से चलते हुए उसके पास से एक औरत गुजरी
04:21वो औरत सीधे देख रही थी
04:23उसने कबीर की तरफ देखा तक नहीं
04:25जैसे कबीर वहाँ मौजूद ही न हो
04:28वो इतनी तेज गई की कबीर
04:30उसका चेहरा तक देख नहीं पाया
04:33वो आगे निकल रही थी
04:34कि कबीर ने हिम्मत जुटाई
04:36और थोड़ी कापती हावाज में कहा
04:40सुनिये
04:44वो औरत रुख गई
04:46उसने दीरे से पीछे मुड़ कर देखा
04:49उसने राजस्थानी घागरा चोली पहनी है
04:52हाथों में बड़े बड़े कंगन
04:53नाक में बड़ी सी नथनी
04:56आखों में गहरा काला गाजल
04:58और सबसे डरावना
04:59उसके माते और गाल पर चोट का एक
05:01बड़ा काला निशान है
05:03वो चुपचाप खड़ी कबीर को देख रही थी
05:08उसकी आँखों में कोई भाव नहीं था
05:11बस एक गहरा सन नाटा
05:14कबीर किसी तरह हिम्मत जुटा है कहता है
05:18आगे आपके साथ कोई है क्या
05:20औरत ने कोई जवाब नहीं दिया
05:23बस एक पल उसे घूरा
05:26और चुपचाप आगे वाले डिब्बे की तरफ चली गई
05:30कबीर अपने आपसे बढ़बढाते हुए
05:32खुद को तसल्ली देते हुए कहता है
05:34अगर ये औरत आगे गई है
05:36इसका मतलब आगे के डिब्बे में कोई ना कोई जरूर होगा
05:39हाँ मुझे भी वही जाना चाहिए
05:42यहाँ ऐसे अकेले बैठा रहा तो नींद नहीं आएगी
05:52डरते हुए ही सही कबीर ने फैसला किया
05:56वो उस औरत के पीछे अगले डिब्बे की तरफ चल पड़ा
06:02कबीर अगले डिब्बे में दाखिल हुआ
06:05उसकी नजरें उस राजस्थानी आउरत को ढूंड रही है
06:11लेकिन यह डिब्बा भी बिल्कुल खाली था
06:17दूर दूर तक कोई नहीं
06:19वो आउरत जैसे हवा में गायब हो गई थी
06:23कबीर कांपती हुई दबी आवाज में कहता है
06:28कोई, कोई है?
06:31कोई जवाब नहीं आया
06:32सिर्फ ट्रेन के पहियों की खड़-खड़ा हट थी
06:35कबीर का गला सूख गया उसे लगा शायद वो उसका वहम था
06:38हार मानकर वो पीछे मुड़ा
06:40और अपनी सीट की तरफ वापस जाने लगा
06:42तभी
06:43कोई है क्या यहाँ?
06:47कबीर के रोंग्टे खड़े हो गए
06:49उसके ठीक पीछे
06:51उसकी ही उम्र का एक लड़का खड़ा था
06:54साधारण कपड़े
06:55नॉर्मल लहजे में लड़का कहता है
06:57हेलो भाई?
06:58मेरा नाम राजेश है
06:59मैंने आवाज सुने
07:01तुम ही आवाज दे रहते क्या?
07:02कबीर की जान में जान आई
07:03उसे लगा
07:04कम से कम कोई तो इनसान मिला
07:06थोड़ा हाफते हुए कबीर कहता है
07:09हाँ, वो
07:09मैंने अभी किसी औरत को यहां से जाते हुए देखा था
07:12मैं अकेला बैठा था
07:14तो लगा शायद वो इस डिब्बे में आई होगी
07:17तभी राजेश कंधे उचकाते हुए
07:19अच्छा, मुझे पता नहीं भाई
07:22मैं तो कोने वाली सीट पर सो रहा था
07:24शायद मेरी आँख लगी थी
07:26इसलिए पता नहीं चला
07:27थोड़ा रिलैक्स होकर कबीर कहता
07:29अच्छा, तुम कहां जा रहे हो?
07:30मैं मुंबई जा रहा हूँ
07:32कल मेरा एक्जाम है
07:33अरे क्या बात कर रहे हो?
07:35मैं भी एक्जाम देने ही जा रहा हूँ
07:36दोनों का मकसद एक था
07:38मन्जिल एक थी
07:39उस सुनसान डरावनी ट्रेन में
07:41अब वो अकेला नहीं था
07:42अकेले पन का वो भारी डर
07:44अब भरोसे में बदल गया था
07:47दोनों एक साथ सीट पर बैठ गए
07:49कबीर अब सुरक्षित महसूस कर रहा था
07:52लेकिन कबीर ये नहीं जानता था
07:54कि कभी-कभी
07:55इनसान भूतों से ज्यादा खतरनाक होते हैं
08:00तेज रफतार से दोड़ती हुई
08:02ट्रेन की खड़-खड़ा हट
08:03खिड़की के बाहर सिर्फ अंधेरा है
08:05अचानक ट्रेन की रफतार कम होने लगती है
08:08एक सुंसान और धुंदले स्टेशन पर ट्रेन धीरे-धीरे रुकती है
08:12पूरे प्लेटफॉर्म पर सन्नाटा है
08:13सिर्फ एक पीली रोशनी वाली चाय की स्टॉल खुली है
08:17राजिश खिड़की से बाहर जांकता है
08:20उसकी नजर उस अकेले खुले हुए स्टॉल पर पड़ती है
08:24वो अपनी सीट से खड़ा हो जाता है
08:28राजिश कबीर की ओर देखते हुए कहता है
08:31स्टेशन तो पूरा सुनसान है यार
08:33लेकिन वहाँ एक स्टॉल खुला है
08:35मैं कुछ खाने के लिए ला रहा हूँ
08:37तुझे कुछ चाहिए तो बोल
08:40नहीं मुझे कुछ नहीं चाहिए
08:41मुझे बस सोना है अब
08:47जल्दी आना रात के समय ट्रेन यहाँ ज्यादा देर नहीं रुकती
08:57राजेश डिब्बे से नीचे प्लेटफॉर्म पर उतरता है
08:59राजेश चलते हुए उस अकेली जलती हुई स्टॉल पर पहुँचता है
09:03स्टॉल पर एक 65 साल का बुजर्ग बैठा है
09:06उसने सफेद कुर्ता पहना है और गले में एक पुराना मटमेला रुमाल है
09:11उसके चेहरे पर जुर्या है और आँखे थोड़ी अजीब
09:14बुजर्ग इंसान भारी और धीमी आवाज में कहता है
09:18क्या दूँ बेटा?
09:20काका, एक चाय दे ना, अद्रक वाली
09:23केतली की भाप उठ रही है, वह गिलास राजेश को बढ़ाता है
09:28राजेश चाय की चुसकी लेता है
09:30तभी बुजर्ग राजेश को घुरते हुए कहता है
09:34बेटा, ये ट्रेन कौन सी है?
09:37इसे पहले कभी इस रूट पर नहीं देखा
09:38और इस समय तो यहां कोई ट्रेन नहीं आती
09:43अरे काका, ये नागपूर से मुंबई जाने वाली ट्रेन है
09:47क्या? नहीं नहीं बेटा
09:49वो ट्रेन तो राद 11 बजे ही निकल गई
09:52अब तो अगली ट्रेन सुबा आएगी
09:54क्या बात कर रहे हो?
09:55तो फिर हम अचानक ट्रेन की दिशा से
10:01आहा! राजेश!
10:03राजेश चाय छोकर पागलों की तरह ट्रेन की तरफ भागता है
10:07वो डिबे में छटता है
10:09वहां का मंजर देखकर वो सन रह जाता है
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