00:00चलें, जिन्दगी, सीखने और वक्त के गुजरने की एक बहुत ही गहरी कहानी को समझते हैं, जिसे मौसमों के बदलते
00:07रंगों के जरीए बयान किया गया है.
00:09ये सिरफ एक कहानी नहीं, बलके हम सब के अपने सफर का एक अक्स है.
00:12तो ये कहानी है एक अलग थलग दुनिया की, एक जील पर तेड़ती हुई खानका, जहां एक बहुत ही अकलमंद
00:21उस्ताद और उसका एक नौजवान शागिर्द रहते हैं.
00:24अच्छा, अब यहां एक बहुत दिल्चस बात है. इस खानका में दर्वाजे तो हैं, लेकिन दिवारे नहीं हैं, और बाहर
00:32की दुनिया तक जाने का सिर्फ एक ही रास्ता है, एक कश्ती.
00:36यह इस बात की अलामत है कि असल रुकावटें हमारे इर्दगिर्द नहीं, बलकि हमारे जहन में होती हैं. क्या जबरदस
00:43ख्याल हैं न? तो कहानी का आगाज होता है बहार के मौसम से, यानि पैदाइश और नई शुरुआत का मौसम.
00:51और यहीं पर नौजवान राहिब, अ�
00:56उससे एहम सबक सीखता है. देखने में तो यह एक मासूम शरारत लगती है, एक बचकाना खेल, लेकिन दरासल यह
01:02अपने किये के नताइश को समझने के एक लंबे और मुश्किल सफर का पहला कदम है. और उस्ताद, वो यह
01:09सब खामोशी से देखता है. वो फौरण कुछ नह
01:25लड़के की पीट पर एक भारी पत्थर बांदेता है. यह पत्थर दरासल उसके अपने आमाल का वजन है. एक ऐसा
01:32बोज जिसे अब उससे खुद उठाना होगा. और यह वो लमा है जहां सब कुछ बदल जाता है. लड़का सिर्फ
01:38अपनी गलती को समझता नहीं, बलके इसे
01:40अपनी रू की गहराईयों में महसूस करता है. उसके आमाल का वजन अब उसके जमीर का बोज बन चुका है.
01:46कर्मा का एक ऐसा सबक जो उसके साथ हमेशा रहेगा. तो अब कहानी में कई साल आगे चलते हैं. मासूमियत
01:53की बहार अब जजबे की शदीद गर्मी में बदल चु
02:10रिष्टा बन जाता है. जरा यहां देखें, यह इसकी अंदरूनी कश्मकश को कितनी खुबसूरती से दिखाता है. एक तरफ वो
02:19पुरसकून रूहानी जिंदगी है जिसे वो हमेशा से जानता था. और दूसरी तरफ महबत और दुनिया की पुकार. यह सुकून
02:27और जजब
02:39बात यह है कि वो बुद्धा का एक मुझस्मा अपने साथ ले जाता है. शायद उसका एक हिस्सा जानता है
02:44कि वो अपने माजी से पूरी तरह कभी भाग नहीं सकता. फिर कई साल गुजर जाते हैं. और अब मौसम
02:51है खिजां का, जवाल का मौसम. राहिब वापस आता है. ले
03:09वही महबच जो कभी उसे इस रास्ते से दूर ले गई थी, अब उसी ने उसे एक खौफनाग जुर्म करने
03:14पर मजबूर कर दिया है. तो उसके घुसे को उसकी अजियत को खतम करने के लिए, उस्ताद उसे एक बहुत
03:20ही गहरा काम देता है. उसे खानका के लकड़ी के फर्�
03:36खिफा के औजार में बदलना है. वो जैसे जैसे लकड़ी पर एक एक हर्फ खोदता है, ये तौबा का एक
03:42अमल बन जाता है. ये जिस्मानी मशक्कत दरसल उसके अपने सख्त दिल में रहम दिली को दुबारा तराशने की एक
03:49कोशिश है. जब वो अपनी सजा काट कर वापस
03:53सख्त सर्दी का है. दुनिया जमीवी है, खामोश है और ये खामोशी बिलकुल उसकी अपनी अंदरूनी हालत की अकासी करती
04:00है. उसके घुसे की आगा बुच चुकी है और अब सिर्फ एक पुर सुकून गोर फिकर का माहूल बाकी है.
04:07अब वो वाकई अकेला है, उसका रहन
04:21खत्म हो गई. लेकिन नहीं, जिन्दगी का चक्कर एक बार फिर घुमता है. एक और उसके पास एक बच्चा छोड़
04:28जाती है. और अब उस्ताद बनने की एक नई नसल की रहनमाई करने की बारी इसकी है. और फिर वो
04:36अपने कफारे का आखरी सबसे मुश्किल कदम उठाता
04:39है. वो अपने पहले गुना की तरफ लोटता है. वो चक्की का एक भारी पार्ट खुद से बान कर पहाड़
04:45पर चड़ता है. वो सिर्फ खुद को सजा नहीं दे रहा. बलके वो इस दाइरे को मुकमल कर रहा है.
04:50वो इस बोच को तसलीम कर रहा है जिसे वो सारी जिन्दगी �
04:54करके वो आखिर कार खुद को आजाद कर लेता है. और इस तरह ये दाइरा मुकमल हो जाता है. एक
05:00नई बहार आती है और कहानी एक बार फिर से शुरू होती है. ये इस फिल्म का मरकजी ख्याल है.
05:06जिन्दगी का चक्कर. वो राहिब अब खुद उस्ताद बन चुका है. उस
05:24जिस से ये सारी कहानी शुरू हुई थी. ये एक बहुत ही ताकतवर मनजर है जो हमें बताता है कि
05:30अगरचे लोग बदल सकते हैं लेकिन जिन्दगी के अंदाज, गलतियां और सीखने के असपाक वो एक ना खत्म होने वाले
05:39चक्कर में जारी रहते हैं. तो आखिर में सवाल
05:42ये पैदा होता है कि क्या हम हमेशा एक ही दाइरे में घूमते रहते हैं? क्या हम वो ही गलतियां
05:47दोराने पर मजबूर हैं? या हम माजी से सीख कर खुद को इस चक्कर से आजाद कर सकते हैं? इसका
05:53कोई आसान जवाब नहीं है और शायद यही इस शांदार कहानी का असल नि
05:58चोड़ हैं?
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