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  • 2 days ago

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00:00आज की कवीता दो राहों के बीच, तो चलती ट्रेन की खिड़की से सोचू का सहर गुजरता है, मन के
00:08अंदर एक सवाल धीरे धीरे उभरता है, पढ़ाई भी है जरूरी मेरी, सपनो का भी भार है, रोजी रोटी की
00:18चिंता संग भविस्त का भी बिचार है, एक राह कहती कमरा �
00:23ले लो, अपनी पहचान बनाओ तूं, दूजी रा फुस्फुसाती, पहले खुद को तो सजाओ तूं, किताबों की खुस्बु बुलाती, चौक
00:33डस्ट भी पुकारे हैं, कल का अपसर बनने वाला, आज बच्चों के सहारे हैं, जे में सीमित सिक्के लेके, होसलों
00:44की कमी न
00:49नहीं, घर की दूरी थकान की धूप, सपनों की ठंडी चाओं भी, एक दिल में सो उल्जने पर उमिदों की
00:59नाओं भी, सायद सही समय ही बोले, कब कदम बढ़ाना है, बीज अभी मन में बोना है, पेड कल उग
01:08जाना है, चलो, आज बस इतना कर ले, महनत को अपना मित्र बन
01:14आएं, रास्ते खुद साफ हो जाएंगे, बस हिम्मत को मत घटाएं, दो राहों के इस मोड पर, मन इतना जान
01:23लिया, धीरे चलना हार नहीं, सोच समझ कर बढ़ना ही जीत का पहला दिया, हन्यादू
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