00:00हमारे कबीर साहब बोल गए हैं जब पहली बार मैंने ये पढ़ा था दोहा उनका तो बिल्कुल थम गया था
00:06मनेक तो
00:06बोले कि जो ओदी लकडी होती है ओदी लकडी समझते हो गिली ओदी बिरहिन लाकडी सिसके और धुधुआए
00:16छूट पड़े या विरह से जो सगरी जली जाए एक दम मैं थब गया था कि गीली लकडी की तरह
00:26है हमारा जीवन सिसक सिसक कर धुआ देता है थोड़ा थोड़ा जल रहा है और इसलिए बहुत लंबा हम चल
00:34लेते हैं इस हालत में आगे कहते हैं कि ये हालत खतम हो जाए जिस हा
00:44जालत से तो कहीं बहतर है कि तुम पूरे ही जल जाओ यही मेरी शिक्षा इतला है तुम पूरे ही
00:50जल जाओ क्या गिली लकडी की तरह धुआ दिये ही जा रहे हो दिये ही जा रहे हो क्या छुप
00:55छुप कर आंसू बहाते हो क्या भीतर भीतर रोते हो आखें तो अब पथरा ग
01:12करो नहीं प्रसंदता का संतुष्टि का जूठा नकाब पहन करके घूमते रहते हो