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  • 17 hours ago

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00:00मेरा सवाल होली के उपर है, जैसे महिलाओं के साथ अवज्रता और होली के साथ मास्की खपद, तो होली का
00:09क्या यही मतलब है?
00:10टीवी, एकवार, सोशल मीडिया शुरू हो गया है, वही चल रहा है, यहो लीमाने यह, एक एक बात प्रतिकात्मक है,
00:18उसको समझो, नहीं तो फिर वही करो गया है, जिसकी प्रशनकरता बात कर रही थी, हिरने कशिपु ने अध्भुत तपस्या
00:24करी, तपस्या करी और कहते है
00:27प्रहमा से वर्दानवान गिया, और उसने धिन्होरा पिटवा दिया, कोई मिल गया, इदर-दर किसी की पूजा करते हुए, तो
00:32मार मूर दूंगा, मेरे ही मंदिर बनाओ, मुझे ही पूजो, निन्ना सा यह तने निकलाया, यह देखो प्रहलाद, अपने ही
00:38घर में निकलाय
00:39वो इतना सा निकलाया, बोला, यह एसा पूछ नि, घर की बात है, मैं तो जानता हूँ न, तो बुआ
00:45जी ने कहा होगा, अरे यह तो लड़का बिलकुल हाथ से निकल गया है, और जनता तक बात पहुच गई,
00:50कि अरे हिरन कशिपू के तो घर में ही विद्रो हो गया है, तो �
00:53पूरी प्रजा ही क्या पता विद्रो ही हो जाए, कि जब ही अपने घर को ही नहीं सम्हाल सकते हैं,
00:57तो राजी क्या सम्हालेंगी, तो ले इस लड़के को तो उड़ा देते हैं, जो खतम करते हैं, भुआ जी को
01:03दां उल्टा पड़ गया, भुआ जी भसमी भूत, सोचनाली �
01:06बात नहीं है, दोनों हाड मासके हैं, जैसे हुआ जी जली, वैसे ही बच्चा भी जल जाता, यह नहीं जल
01:13जाता, पर यहां आग एक विशिष्ट प्रतीक की तरह है, यह वो आग नहीं है, जो आप ले आ करके
01:18लिकड़ी कठा करके अभी कल परसों जलाओ गे, पर हम उस आग
01:21इसको जाने बिना क्या करते हैं, किसी घर के सामने कुरसी उठा के लिए आप भूगती, अब वो तीछे से
01:28दोड़ता हूँ आ रहा है, उससे करें बुरा ना मानो होली है, अब वो होली का के जाने के बाद
01:34की कहानी तो पता ही है फिर, वो आत कौन सी है, इसका हमें कुछ ग्
01:52प्रणा महारा जी, मेरा सवाल होली के उपर है, जैसे कुछ दिन बाद ही होली आने वाली है, तो जहां
02:02अभी शेही मितलब होली शुरू हो चुका है, वहां से ऐसे नियूज सामने आ रही है कि महिलाओं के साथ
02:09अवद्रता, और जैसे कि हम जानते ही है कि होली के साथ मास और
02:15जो नशा, मास की खपत, और नियूज में भी मतलब होली के साथ साथ यही सब चाय हुए रहते है
02:23कि रंग, गुलाल, तो मेरा सवाल यही है कि होली का क्या यही मतलब है, अगर यह नहीं है तो
02:31वास्तवी कर्थ क्या है?
02:38वास्तवी कर्थ तो बहुत अच्छा है, आनंद प्रद है, रस्पूर्ण है, उसमें बोध भी है, मजा भी है, पर वास्तवी
02:53कर्थ समझ लोगे तो जिस स्तर का अभी मजा लेते हो आप लोग होली का,
03:01उस स्तर का मजा थोड़ा, खत्रे में पड़ जाएगा, उंचा मजा होता है जिसको शास्तर आनंद कहते हैं, वो साधारन
03:17मजे, वो खत्रे में डाल देता है, विसलिए फिर हम उंचे अर्थ और उस से मिलने वाला उंचा आनंद,
03:31सब को ठुकरा देते हैं,
03:43राजा का क्या नाम था, मैं भूल गया,
03:51हिरन्य कश्यप नहीं नाम था, ये सब लोगधर्म यहीं से शुरू हो जाता है, नाम ही खराब कर देता है,
04:00नाम ही बड़ा सांकितिक है, नाम से ही सीख लोगे,
04:05हिरन्य कशिपू, हिरन्य माने होता है, सोना या धन, अच्छा वेदों या उपनिशदों में हिरन्य सुनाया कहीं,
04:19कहां सुनाया है, हिरन्य गर्ब, और कहां सुनाया, कई जगे आता है, एक बड़े बहुत, बड़ा महत्यपूर्ण सुक्त है, उसमें
04:30आता है,
04:34क्या है, हिरन्य माने होता है, सोना, धन, कुछ भी ऐसा जिसमें सुर्ण प्रभा हो,
04:46माने, सोने जैसे चका चाओंत, हिरन्य, और कशिपू माने होता है, बिस्तर, शय्या,
05:02जो अपने आपको सुख की, स्वर्ण की, धन की, शय्या देना चाहता हो, वो हो गया, हिरन्य कशिपू,
05:17वो किसका प्रतीक है, कौन हर समय यही मांग रहा होता है, सुख, सुविधा, सोना, किसको चाहिए,
05:24अहंकार, हिरन्य कशिपू, अहंकार का प्रतीक है, ठीक है,
05:32मज़धार बात है, आज ही हूली पर सवाल की, आज ही करोगे, हूली आ रही है,
05:40आज, गीता में, क्या कह रहे थे, शेह कृष्ण, कि, यत्न तो बहुत करते हैं,
05:50साथवाध्याय, तीसरा श्लोग, यत्न तो बहुत करते हैं, पर सिद्ध के लिए यत्न करने वाला, हजारों में एक होता है,
05:58तो हिरने कशिपु ने भी बड़ा यत्न किया
06:01बड़ा यत्न किया
06:05अहंकार खूब यत्न कर सकता है
06:07हिरने कशिपु ने अद्भुत तपस्या करी
06:10अहंकार बड़ा महनती हो सकता है
06:12खूब महनत करता है
06:15तपस्या करी और कहते हैं ब्रहमा से वरदान मांग लिया
06:20तपस्या करने वाला भी कौन है
06:23पर वो एक शर्थ रखकर तपस्या कर रहा है
06:27खुद को बचाऊंगा और अपने ही लिए
06:31वर्दान मांगूंगा वही नामी है उसका हिरंडे कशिपू
06:35तो वो वर्दान सब अपने ही लिए मांगेगा
06:39आप भी अगर महनत और गहरा कर रहा हो
06:40तो ये कोई अनिवार्य रूप से आपकी श्रिष्टता का प्रमाण नहीं है
06:51किसी को आप देखो कि बहुत जान लगा रहा है बहुत महनत कर रहा है
06:54तो इससे जरूरी नहीं कि उसके बारे में कुछ अच्छा ही साबित हो रहा हो
07:08दुर्गा सबच्छती में न जाने कितने ये दानवी चरित रहते हैं
07:12जो सब तपस्या किये बैठे थे और वर्दान पाई बैठे थे
07:19कुछ तो ऐसे हैं जिनको सांकेति ही रूप में कहा गया कि वो सीधे
07:24विश्णू के शरीर से ही पैदा हो रहे हैं
07:29पहला ही चरण सबच्छती का
07:36और मेहनती इतने हैं कि वो हजारों साल तक
07:39फिर युद्ध भी कर रहे हैं किस से
07:42वो विश्णू से युद्ध भी कर रहे हैं अब युद्ध में इतना लंबा युद्ध है उसमें मेहनत चाहिए
07:46तो ऐसा नहीं है कि अहंकार आलसी, काहिल, तामसिक ही होता है, ऐसा कुछ नहीं है, वो बहुत महनती ही
07:53होता है, वो जान लड़ा सकता है, इस बात को अच्छे समझना।
08:16कर सकता है, बात यह है कि यह सारे काम वो करता है अपनी सुरक्षा के लिए, खुद को बचाने
08:22के लिए, तो यह राजा हिरण्य कशिपू, अच्छा यह जो राजा जी थे, यह भी पुत्र रिशी के ही थे,
08:33यह इनका भाई था यह हिरण्याक्ष, दोनों,
08:43रिशीयों से भी जो उत्पन्न होता है, अहंकार वहां भी हो सकता है।
08:51मनें, उचे से उचे गरंथ भी होते हैं, पर जब वह आगे बढ़ते हैं, वन्ष में, तो वह अहंकार का
09:02रूप ले सकते हैं।
09:03खीक वैसे जैसे, शुरुति धर्म लोकधर्म बन जाता है।
09:10रावण भी किसकी संतान था?
09:15रिशी की संतान था?
09:18मतलब समझ रहे हैं, वो इन सब संकेतों को समझो
09:22कि कैसे शुरुति धर्म लोकधर्म बन जाता है
09:27कि दिया तो रिशीयोंने कुछ और है
09:30शुरू रिशी से हुआ है वो बन गया रावण
09:33शुरू रिशी से हुआ है बन गया
09:35हिरने कशिपू
09:37ये बिलकुल हो सकता है
09:39तो जीवन के बारे में बहुत कुछ
09:42बताती है ये कथाई अगर उन्हें
09:43हम ध्यान से समझें और इन कथाओं को
09:45ध्यान से समझेंगे तो फिर हम तेवहार को भी ठीक से
09:47मना पाएंगे
10:03जहां सुरक्षा पाता है
10:06द्वैत में
10:08जहां द्वैत है वहां अंकार को कोई नहीं मार सकता
10:12जहां द्वैत है वहां अंकार कोई नहीं मार सकता
10:16तो हिरन ने कशिपू ने अपने लिए
10:18सारे द्वैत मांग लिए
10:19क्या बोले
10:21दिन में भी सुरक्षित रहूंगा
10:33महल भवन या घर के भीतर असुरक्षित रहूंगा न बाहर।
10:39पहुज़रो न मैं भीतर मारा जा सकता न मैं बाहर मारा जा सकता।
10:48नास्त्र से मरूंगा नाशस्त्र से मरूंगा।
10:52और एक चौती चीज और रखी थी।
10:56हाँ, ना जमीन पर ना आकाश में।
11:03ना नर द्वारा ना पशु द्वारा।
11:07माने जितने भी इसी को, यह तो चार-पांच शर्त हैं इसको आप और आगे बढ़ा लो, 14-15 कर
11:11लो, पर इशारा समझो।
11:15सब तरीके के द्वैतों में मैं सुरक्षित रहूंगा।
11:20और द्वैत के लावा हांकार कुछ जानता नहीं।
11:23और उसने द्वैत में अगर अपने लिए सुरक्षा मांग ली। तो अपने देखे तो वह सुरक्षित ही हो गया।
11:29कि दिन के बाद रात आती है यही द्वैत का चक्र चलता है।
11:32ना दिन में मरूँगा, ना रात में मरूँगा, ना अंदर मरूँगा, ना भार मरूँगा, ना आदमी से मरूँगा, ना जानवर
11:36से मरूँगा, तो फिर तो अब मुझे कोई मारी नहीं सुरक्षित है।
11:41अंकार ने अपने लिए यह मांग लिया।
11:44और क्यों नहीं मरना है? क्योंकि दरा हुआ है, इतना दरा हुआ है कि जानता है कि मरण धर्मा है,
11:58जूठ तो कभी जिंदा ही नहीं हुआ, तो उसको तो मरने से डर लगे गई ना?
12:04जो नकली जान लेकर जी रहा है
12:07उसको तो मरना भी नहीं है
12:09उसकी तो बस पोल खुलनी है
12:12अहंकार तो सच पूछो तो जिन्दा भी नहीं है
12:14वो तो जिन्दा होने का ढोंग करता है
12:16तो उसको हमेशा खत्रा लगा रहता है
12:19कहीं मेरी पोल ना खुल जाए
12:20तो इसलिए फिर वो अगर तपस्या भी करता है
12:24तो बस यही वरदान मांगने के लिए कि मरू ना मरू ना
12:27मुझे मरना नहीं है मुझे मरना नहीं है
12:28और ना मरने के लिए वो द्वैत का आश्रे लेता है
12:32अहंकार ना मरने के लिए द्वैत का आश्रे लेता है
12:39कितना भी आश्रे ले ले उसको भरोसा ही नहीं आता
12:43कि वो अमर है क्योंकि अमर तो मात सत्य होता है
12:47हंकार सत्य तो है नहीं
12:49अमर तो सिर्फ सत्य होता है
12:51हंकार सत्य है नहीं तो उसको भरोसा नहीं आता
12:53कि मैं अमर हूँ
12:55तो फिर वो क्या करता है कि वो पूरे राज्य में आदेश पारित कर देता है
13:04कि सब मुझे ही सर्वोच मानेंगे
13:09इस पूरे राज्य में किसी की पूजा नहीं होगी क्योंकि मैं ही सत्य हूँ
13:16ये हंकार क्या घोशना कर रहा है मैं हंकार थोड़ी हूँ
13:19मैं आत्मा हूँ मेरी पुझा करो
13:21मैं हंकार थोड़ी हूँ
13:22मेरी पुझा करो
13:26सबसे खतरनाक
13:27बात तब होती है
13:29और यह बड़ी
13:32बड़ी
13:34जुरभाग्य पूर्ण
13:35क्षमता है हंकार के पास
13:38वो
13:41विश्ययता तो है
13:42वो स्वयम अपना विशय भी बन सकता है
13:50वो स्वयम ही अपने दो फाड कर सकता है
13:54और अपने एक फाड को अपना विशय बना सकता है
13:58वो अपने दूसरे फाड को इश्वर घोशित कर सकता है
14:03और कहा सकता है मैं तो इश्वर की पुजा कर रहा हूं
14:06जबकि वो जो इश्वर है वो अहंकार का ही प्रक्षेपन है
14:09अहंकार का ही एक फाड है
14:13सब्जेक्ट नहीं अपने आपको क्या बना लिया है
14:16और उसकी पूजा करनी शुरू कर दिये
14:20अहंकार ही अपने आपको क्या घोशित कर देता है
14:23आत्मा
14:24और जब वो अपने आपको आत्मा नहीं घोशित कर देता तो इतना तो करी देता है
14:27कि अच्छा मैं आत्मा नहीं हूँ, मैं हंकार हूँ
14:29पर वो आत्मा है और मैं तो उसका सेवक हूँ
14:33और वो जिसको वो आत्मा कह रहा है, वो भी क्या है
14:37वो अहंकार का ही एक रूप है
14:39वो अहंकार की ही परिभाशा से बंदी हुई चीज है
14:43तो अहंकार
14:45जब अपने आपको आत्मा नहीं घोशित कर सकता
14:49तो अपने किसी प्रक्षेपन को
14:55अपनी किसी कहानी को आत्मा घोशित कर देता है
14:59और उसकी पूजा शुरू कर देता है
15:01हिरन्य कशिपू के पास ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी
15:04तो उन्होंने कहा अरे
15:09आत्मा की पूजा क्या करनी है
15:12खुदी अपने आपको घोशित कर दो ना मैं इच भगवान हूँ
15:16तो हिरन्य कशिपू ने क्या आदेश चला दिया
15:19यहां किसी की पूजा उजा नहीं होगी
15:24मैं ही भगवान हूँ मेरी पूजा होगी
15:25यह हंकार है जो दावा कर रहा है
15:27मैं ही आत्मा हूँ और उसे दावा इसले करना पड़ रहा है
15:44कि मैं सत्य हूँ, अजर, अमर, आत्मा हूँ
15:46कभी नहीं आ सकता क्योंकि
15:50मेरी जिंदगी है ना
15:51सच्चाई तो मैं जानता हूँ
15:52मुझे पता है मैं कौन हूँ
15:54मुझे पता है कि भीतर जूट है
15:56और मृत्यो कही खेल चल रहा है
15:58मुझे पता है
15:59तो अब ये सब प्रजा है
16:02किसी ने अगर
16:03किसी भगवान की पूजा की तो सर कटवा दूँगा
16:08मैं ही हूँ
16:08मैं ही हूँ
16:10मैं ही हूँ
16:12इससे इसको थोड़ा भरोसा आता है
16:15इससे इसको
16:16थोड़ा अश्वासन मिलता है
16:18कि जब इतने लोग बोल रहे हैं
16:20तो मैं ही होँगा कोई अकेला मैं खुद थोड़ी कह रहा हूँ कि मैं ही सत्य हूँ मैं ही परम
16:26मैं ही सरवोचू मैं ही थोड़ी बोल रहा हूँ इतने लोग बोल रहे हैं जब इतने लोग बोल रहे हैं
16:29तो शाय ठीक ही बोल रहा हूँ जैसे आपको भरोसा आ जाता है आप सच
16:46भाई भाई भाई हमारा भाई का भाई है तो भाई भी ऐसे फूल जाता है कि जरूर मैं कोई होँगा
16:51मैं भाई का भाई हूँ उसका जो भी मतलब है भाई का भाई बोलने से अच्छा भाई बोल देते हैं
16:57भाई का भाई तो भाई होता है होता है न अहंकार चुकि खुद को सी
17:07सिधे देखने से बहुत डरता है तो इसलिए वो स्वयम को अपने ही विशयों की आख से देखना चाहता है
17:15और धांदली कर लेता है मैं खुद को सीधे देखूं तो क्या पता पोल खुल जाए तो इससे अच्छा मैं
17:21सामने एक अबजेक्ट खड़ा करता हूं वो अबजेक्ट
17:37ने ये बात बोली है तो सच होगी मैंने थोड़ी बोली है उसने बोली है मैं कूल हूँ मैं डूड
17:42हूँ मैं सुन्दर हूँ मैं स्मार्ट हूँ मैं सेक्सी हूँ ये मैंने थोड़ी बोला है ये मैंने किससे सुना मैंने
17:50इससे सुना ये बोल रहा तो सही होगा और कैसे सुन
18:06मैं स्मार्ट हूँ की नहीं?
18:09हूँ की नहीं?
18:13मैं स्मार्ट हूँ?
18:15ये निकल आया पर ये देख ये देख रहे हूँ?
18:19अरे ये दिखा दो, हम मुगा देख रहे हूँ
18:21ये असली चीज यहाँ है
18:22तो मैं पता ही नहीं है
18:24उपर उपर घूम रहे हो
18:26तो ये, ये
18:29हाव ही मैं स्मार्ट हूँ की नहीं हूँ?
18:32जी
18:36ये काम करा हिरंडे कशिपू ने
18:38पूरी आग्या में बोल दिया कि
18:39सब बोलोगी मैं ही स्मार्ट हूँ
18:41मैं ही हाइस्ट हूँ
18:45और नहीं बोलोगे तो
18:47और जैसे ही सब ने बोला
18:48तो हमने कहा देखा
18:49अब मैं अकेला थोड़ी हूँ जो मानता हूँ
18:51कि मैं ही भगवान हूँ
18:53सब मान रहे हैं इसने अभी अभी अभी बोला
18:55अभी अभी इसने माना कि मैं ही हूँ
18:58यह हंकार करता है
19:00उसे अपनी बात पे कभी भरोसा आये नहीं सकता
19:02क्योंकि अपनी बात है उसे पता है वो बात जूट है
19:05तो उस जूट को वो दूसरों के मुझे कहलवाता है
19:08ताकि खुद को ही धोखा दे सके और जता सके कि
19:11दूसरों ने बोला है
19:13दूसरे तो सोतंत्र हैं तुन्होंने सच बोलाओगा पर दूसरे सोतंत्र नहीं है
19:17दूसरे तुम ही से बंधे हुए विशह है तुम्हारे ही
19:20यदि यो सचमुछ सोतंत्र होते तो तुमसे कुछ और बोलते
19:23और जो सचमुच सवतंत्र है उसकी बात तुम सुनना चाहते नहीं हो
19:26जो सचमुच सवतंत्र है उसको तुम बरदाश्ट कर नहीं सकते
19:29तो उसके पास तुम कभी जाओगे नहीं क्योंकि वो तुमारा विशय नहीं बन सकता
19:34तुम पूछने ही उनसे जाओगे
19:38जिनके बारे में तुम्हें पता है कि तुमसे सच नहीं बोलेंगे
19:44दाल में नमक ठीक है ना
20:00नमक की बात तो बात में आईगी
20:09और तुमने खुद कोई भरोसा दिला दिया कि मैंने दाल मस्त बनाईए
20:17जिससे पूछ रहे हो क्या वो सतंत्र है निश्पक्ष है नहीं वो तुम्हारा ही विशे है
20:22वो तुमसे कभी सच नहीं बोलेगा वो तुम्हारी जैसे है
20:30हिरन ने कशिपको भी कौन मिल गया विशे है अपनी प्रजा और उसने धिनोरा पिटवा दिया
20:37कोई मिल गया इदर अदर किसी की पूजा करते हुए तो मार मूर दूँगा
20:41मेरे ही मंदिर बनाओ मुझे ही पूजो
20:47और ये सब होने के बाद भी आप बताओ हिरन कशिपको क्या भरोसा आया होगा
20:52कोई भरोसा नहीं आया
20:54काईनी भरोसा आया वो एक निन्ना से यह ते निकलाया यह देखो यह प्रहलाद
20:59इतना बढ़ा
21:01अपने ही घर में निकलाया
21:04पूरी प्रजा बोल रही है कि हाँ
21:07महराज ही भगवान है
21:09महराज ही भगवान है
21:11वो इतना सा निकलाया
21:12बोला ये सब कुछ नहीं
21:15घर की बात है मैं तो जानता हूं न
21:19दूसरों को डरा लोगे
21:20मुझे सब पता है तुम्हारा
21:23मैं नहीं मानता
21:24कि तुम भगवान अगवान कुछ हो
21:29काइदे से तो कोई फर्क ही नहीं पढ़ना चाहिए था
21:31इतने बड़े राजा हो
21:32उपर से तुम वर्दान पा गए हो
21:35सब को डरावरा लिया है
21:36और कथा कहती है कि बहुत सारे इधर उदर
21:38जितने ते सब को जीत भी लिया था
21:40क्योंकि अब बल आ गया है मारे नहीं जा सकते ना
21:42तो सब को जीत भी लिया था
21:46तो तुम्हें क्या फर्क पढ़ना चाहिए था
21:48वो इतना सा पिद्दी सा बच्चा
21:50तुम्हारे ही अपना बेटा वो आकर कुछ बोल रहा है
22:05आपसे पूछा था न मैंने एक दिन की सामने बड़ा लंबा चोड़ा अंधेरा बिछा हुआ हो और बीच में कहीं
22:14कोई बत्ती टिम्टि मा रही हो तो आपकी आख कहां जाके ठहरेगी बत्ती पर तो इसलिए अंधेरा बहुत जलता है
22:21प्रकाश से बहुत जलता है तो इतना ब
22:33बच्चे ने बोल दिया हम नहीं मांते होना तो यह चाहिए था कि उपएक्षा कर देता इग्नोर कर देता कहता
22:38बच्चे आए कुछ है छोड़ तो क्या करक परता है पेक्षा में कर पाया क्योंकि वो छोटा सा दिया भी
22:45जान ले लेता है अंधेरे की औह भी दिया अपने ही
22:53अच्छा ये भी मतेदार बात?
22:57कि अहंकार में से ही ये मुक्ति की अभीवस्ता पैदा हो गई है
23:02ये भी बात सांकेतिक है
23:04कि प्रहलाद प्रजा से नहीं उठके आया है
23:07खिरण कश्यप की अपनी आफलाद है
23:13प्रहलाद कोई प्रजा से उठकर आया बच्चा नहीं है
23:17कोई बाहरी नहीं है
23:19वो अहंकार की अपनी पैदाईश है
23:21मतलब अहंकार के ही दिल में मुक्ति के प्रति प्रेम भी होता है
23:33अहंकार से ही मुक्षा पैदा होती है
23:36फिरन्ने कशिपु अहंकार है और प्रहलाद मुमुक्षा है
23:42अहंकार से ही तो मुमुक्षा पैदा होती है ना
23:44बंधन है तभी तो मुक्ति चाहिए होती है ना
23:47उस दिन मैं आपसे कह रहा था
23:49कि जिसे बंधनों से ही समस्या नहीं हो रही
23:52वो मुक्ति लेकर क्या करेगा
23:55बंधन जब घोर घना होता है
23:57तभी तड़प उठती है न आजादी की
24:02तभी तो लगता है कि क्यों फसें ऐसे नहीं जीना है
24:05प्रहलाद उसी तड़प का नाम है
24:07और ये बात कोई सायोगिक नहीं है
24:10कि उसको हिरन ने कशिपु के घर में ही पैदा होना था
24:14वो और कहीं नहीं पैदा हो सकता था
24:17उसको वहीं पैदा होना था
24:20क्योंकि सबसे आदा तड़प वहीं थी
24:24सब बंधनों का केंद्र वहीं था
24:26तो प्रहलाद को भी वहीं पैदा होना था
24:30और वो जो तड़प पैदा हो रही है
24:34अंत में वो खाई जाती है अंधेरे को
24:37खा जाती है कि नहीं
24:42अब हंकार के रिष्टेदार
24:45तीदी हो लिका
24:47जैसे तुम वैसे ही तुमारी बहन
24:51जैसे तुम वैसे ही तुमारी बहन
24:55मतलब समझो
24:56जैसे तुम होते हो वैसे ही तुम्हारा महाल होता है
25:00और जैसा तुम्हारा महाल होता है वैसे ही तुम हो जाते हो
25:03ये एक द्वैतात्मा करिश्टा होता है जो दोनों तरफ की गंदगी को सुरक्षेत रखता है
25:09जैसा राजा वैसी प्रजा ये तो दिख गया राजा भी बोल रहा है मैं कौन हूँ
25:14और प्रजा भी बोल रही है कि आप कौन है
25:18और जैसा भाई वैसी बहन
25:22जैसा भाई वैसी बहन
25:25तो जो ये पूरा जो
25:27कुल कुटम, नात, रिश्डारी, यारी, दोस्ती
25:29का जो पूरा जमघट होता है
25:31ये सच पूछो तो आप जैसे हो
25:33आपको वैसा ही बनाए रखने के लिए होता है
25:34ये आपको बढ़ने बदलने नहीं देगा
25:36यह आपको बहतर नहीं बनने देगा
25:42तो बुआ जी आ गई बिलकुल कुद के
25:48बुआ तुम्हें क्या लगता है आज कल यह ऐसी हो गई है
25:54यह बुआ लोगों का खेल तबी से ऐसा चल रहा है
26:01तो ने कहा आ जाओ इसका
26:04मेरे पास तो सिद्धी है
26:08मैं ऐसे डाल लेती हूँ
26:10आग वाग में मैं नहीं जलती
26:13और प्रहलाद के और थे तीन भाई थे
26:15तो बुआ जी ने कहा ओगा कि अरे तुम तो राजा हो
26:17तुम्हारे तीन और भी है
26:19और यह तो लड़का बिलकुल हाथ से निकल गया है
26:22और दूसरी बात इसकी देखा देखी
26:23बाकी तीन जो भाई है वो भी बागी हो गए
26:26विद्रोही हो गए तो कलबण हो जाएगी
26:27और जनता तक बात पहुँच गई
26:29कि अरे हिरन ने कशिपू के तो घर में ही विद्रोह हो गया है
26:33तो फिर पूरी प्रजा ही क्या पता विद्रोही हो जाए
26:35कि जब ही अपने घर को ही नहीं सम्हाल सकते
26:37तो राजी क्या सम्हालेंगे
26:38वो ले इस लड़के को तो उड़ा देते हैं
26:41तो खतम करते हैं
26:44तो आ गहीं बुआ जी
26:46जैसे इनको वर्दान मिला हुआ
26:48बुआ जी को मिला हुआ उनको कुछ मिला हुआ था
26:50कुछ चोला चोंगा आवरण
26:52या शायद सिर्फ शक्ति हाँ
26:55हाँ
26:56कि ये पहन कर बैठेंगी आग में
26:58तो जलेंगी नहीं
27:01पर यहाँ आग एक विशिष्ट प्रतीक की तरह है
27:04यहाँ आग किसकी है
27:06यहाँ आग विवेक की है
27:08यहाँ उसकी आग है
27:12जो सार को बचा देती है
27:14असार को मिटा देती है
27:15विवेक का क्या मतलब होता है
27:19सार असार में भेद कर पाना
27:21तो यह वो आग थी जो भेद कर लेती थी
27:23इस आग को पता तक क्या जलाना है क्या नहीं जलाना है
27:28यह वो आग है
27:29यह वो आग नहीं है वो जो आप ले आ करके लिकड़ी कठा करके अभी कल परसू चलाओगे
27:35यह वो आग थी
27:37जो सब कुछ indiscriminately नहीं चला देती थी
27:42यह discretion की आग थी
27:45यह विवेक की आग थी
27:48यह नित्य अनित्य में भेद करना जानती थी
27:51यह सत असत में भेद करना जानती थी
27:54यह वो आग है
27:56पर हम उस आग को जाने बेना क्या करते हैं
27:59किसी यह घर के सामने कुर्सी उठा के लिया फूग दी
28:03अब वो पीछे से दोड़ता हूँ आ रहा उससे करे बुरा ना मानो हो ली है
28:11होता है कि नहीं होता है
28:13किसी यह के घर के सामने उसका पेड़ काट दिया
28:16बुरा ना मानो हो ली है
28:17अरे यह विशिष्ट आग है जिसकी बात हो रही है
28:19यह विवेक की आग है
28:21लकड़ी वाली आग नहीं है
28:26तभी इस आग ने
28:28खुलिका को जला दिया
28:29प्रहलाद को बचा दिया
28:30अगर साधारण आग होती तो दोनों को जला देती
28:34सोचनली बात नहीं है
28:36दोनों हाल मासके है
28:39जैसे
28:40बुआ जी जली
28:41वैसे बच्चा भी जल जाता
28:44कि नहीं जल जाता
28:47पर यह आग भी जैसे चैतन्य थी
28:51विवेक है इसके पास
28:53ये विवेक रूपी अगनी है
28:57इसको भेद करना
28:58विभाजन करना आता है
29:00किसको जलाना है उसी को जलाना है
29:02जिसको बचाना उसको बचा देना है
29:04सार सार को गही रहे
29:06थोथा दे उड़ा है थोथे को जला देना है
29:09गंदगी जला दो
29:11सोना बचा लो
29:12तो आग ने ये ही करा
29:15बुआ जी को दाँ उल्टा पड़ गया
29:19बुआ जी भसमी भूत
29:24अब प्रहलाद क्या रहा है दुबारा मत करना
29:30पूरी जनता खौफ में
29:35प्रहलाद रॉग्ड
29:40अंकार
29:46गड़बढ हो गई
29:49एक एक बात प्रतिकात्मक है उसको समझो
29:53नहीं तो फिर वही करोगे जिसकी प्रशनकरता बात कर रही थी
29:56कि लड़कियां छेड़ रहे हैं
29:58रंगल लगाने के बहाने जाकर
30:01और नशा और ये
30:06जानवरों को काट रहे हैं
30:07चिकन खाना है क्योंकि हो ली है बकरा खाना है
30:09हो ली है
30:13विदेशी महिलाओं का तो
30:15हर साल आता है
30:17अच्छा हो इस साल ना आए
30:22खासकरधार में एक जबहों से आता है
30:23और ये और ज़्यादा दुरभागे की बात है
30:25मृत्वरा ब्रिंदा बन यहां से ज़्यादा आता है कि गई थी उनको पकड़ करके
30:30रंग लगाने के बहाने छेड छाड़ दिया चूमा चाटी भी कर ली ये सब
30:37क्यों क्यों कि कथा जो समझाना चाहती है
30:39वो तो हमने समझा ही नहीं कथा के प्रतीकों को हम जानते ही नहीं
30:48आरी बात समझ में
30:54वो आग कौन सी है
30:58इसका हमें कुछ ग्यानी नहीं
31:00तो सचमुछ हमें भी क्या जलाना है हर साल होली पे
31:04ये भी हमें कुछ पता नहीं
31:06और होली हर साल लौट कर क्यों आती है ये भी हम जानते नहीं
31:10भाई होली का साफ हो गई
31:14उसके बाद अन्रिसिंग आये और फिर अने कशिप को भी साफ कर दिया
31:19तो होली हर साल क्यों आ रही है फिर
31:21जिनकी सफाई हो नी थी हो तो हो गई
31:23तो हर साल होली क्यों जला रहे है उसके पीछे भी कारण है
31:26पर वो कारण हम समझते नहीं
31:33क्या कारण है हर साल क्यों मनानी है
31:36अब वो
31:38होलिका के जाने के बाद की कहानी तो पता ही है फिर
31:40वो बोले की तू ऐसे नहीं मरेगा तो एक khambha तपवाया
31:45खमbha तपवाया और कहा की जाकर के
31:48तो इसको पकड़ के खळा ओ जाकि अब इसी में जलके मर जा
31:52उस आग में नहीं मरा तो तू इस आग में मरेगा
31:55तो वो उसी खंबे से फिर कहते हैं कि रसिंग प्रकट हुए और द्वैत की जितनी शर्ते रखी थी सब
32:07शर्तों का उलंगन कर दिया
32:09वो ले भीतर बाहर के मध्य की चौखट पर मारूँगा तुझे
32:14दिन और रात के बीच की सांज गोधूली बेला में मारूँगा तुझको
32:18नास्त्र चाहिए ना शस्त्र चाहिए ना खून से फाड़ दूँगा न धरती न आस्मान या जांग पर रखके फाड़ दूँगा
32:28बीच में
32:29मतलब समझ रहे हो अद्वैत
32:33अद्वैत है जो द्वैत को काट देता है ये होली का संदेश है
32:38अहंकार द्वैत के माध्यम से अपने आपको बचाने की कितनी भी कोशिश कर ले
32:43अद्वैत फाड़ ही देगा
32:46द्वैत कितना भी सुरक्षा का दुर्ग बना दे घेरा बना दे
32:51अद्वायत उपर की बात है
32:55वो द्वायत के सारे दाओं पेच काट देता है
33:06सिखा रही है हो लिए कि जाओ अद्वायत की शरण में
33:13पर तुम तो उसे और द्वायत का ही भूंडा कारिकरम बना देते हो
33:21और तुम्हारे भीतर भावन आ जाती है कि मैं पुरुशू मैं श्त्री की और जा रहा हूं रंग लगाने
33:27ये तो द्वायत हो गया
33:32मैं अपनी प्रजाति का हूँ आज मैं बकरा काट कर खाऊंगा ये तो
33:37होली उत्सव है चेतना के उत्थान का
33:50होली का मतलब हुआ चेतना को उठाना भीतरी बहोशी को और कम करना पर हम तो होली पर और नशा
33:55कर लेते हैं
33:56और होली जिस चीज का हमें संकेत दे रही हैं उसके बिलकुल विपरीत काम करते हैं
34:01होली इसलिए है कि जिस नशे में तुम साल भर रहे हो वो नशा आज कम हो जाए
34:06पर हम होली के दिन और नशा कर लेते हैं
34:11द्वायत माने नशा अद्वायत माने उस नशे का उतरना नशा माने क्या होता है जो तुम्हें सत्य से दूर रखे
34:19द्वायत मूल असत्य है क्योंकि द्वायत के एक छोर पर कौन बैठा होता है अहंकार
34:26द्वायत के एक छोर पर सदा अहंकार बैठा होता है
34:30और हंकार जूट है
34:31तो द्वायत मूल जूट है
34:39द्वायत का हटना ही अद्वायत होता है
34:40द्वायत के और नहीं कोई परिभाशा है
34:42अहंकार का विगलन ही अद्वायत होता है
34:46खोली यही आपको याद दिलाने के लिए
34:53आम आदमी आसानी से नहीं समझ पाता था
34:55सैध्धान्तिक बाते थी लोग इतना पढ़े लिखे नहीं थे
34:58कृषिप्रधान भारत देश था
35:01बढ़ वस्था थी पहले जो फिर जाते वस्था बन गई
35:05तो बहुत लोगों की पढ़ाई लिखाई पर तो वैधानिक रूप
35:09से रोक लगा दी गई थी उनसे कहा जैता तुम अपना
35:12पुष्टैनी काम ही करते रहो तो उन तक फिर अद्वायत कैसे
35:18पहुंचाया जाए तो इसके लिए कथाएं रची गई पर हंकार
35:22ने उन कथाओं का भी शोशन कर लिया हंकार ने उन कथाओं को भी पालतू बना लिया
35:35जो कथा आई थी हंकार को ध्वस्त करने के लिए हंकार ने उस कथा को अपने घर पर बांध लिया
35:39पालतू बना कर
35:45बात आ रही ये समझ में
35:50अद्वायत नियती है
35:51तुम कितना भी बड़ा सुरक्षा चक्र बना लो द्वायत का
35:57अनपेक्षित जगह से सत्य प्रकट होगा
36:00जैसे खंबे से नर्सिंग का प्रकट होना
36:03माने ऐसी जगह से जहां तुमने कभी
36:06सोचे ही नहीं था
36:09तुम्हारी योजना तो यही रहती है
36:12कि कभी भी सच्चाई सामने आये ही नहीं
36:14पर वो ऐसी जगह सामने आ जाएगी
36:17तुम कहोगे यह क्या हो गया
36:18मेरी घर में यह उलाद कैसी पैदा हो गई
36:21और मेरी घर के खंबे में से यह भगवान प्रकट हो गई
36:26आप में थी कितने लोगों ने सचमुच चाहा था कि
36:29आप इस तरह से एक दिन गीता पढ़ेंगे और परीक्षा देंगे
36:34यह देखो
36:37यह अद्वयत का तरीका है
36:39वो आपके बिना चाहे आपकी जिंदगी में घोसाता है
36:41क्योंकि आपकी चाहत का इंतजार करेगा तो प्रतिच्छा ही करता रह जाएगा
36:46आप कभी नहीं चाहने वाले
36:49हिरंडे कशिपू क्या कभी स्वयम चाहता कि मुझे मुक्ति मिले
36:53वो स्वयम कभी ना चाहता उसे मुक्ति मिले
36:55तो उसको तो फिर इसी तरीके से
36:57लगभग धोखे से ही मुक्ति दी जा सकती थी
37:00तो दे दी गई कि ले तेरे घर में आउलाद ऐसी हो जाएगी
37:02कि अब आउलाद के माध्यम से तुझे मुक्ति मिलेगी
37:05ले तुने बड़े प्यार से ये भवन बनवाया था ना
37:08ये खंभे लगवाय थे अब इसी स्तंभ में से देख अब कौन निकलता है
37:12जिसको तू जड़ समझ रहा था उस जड़ में से उच्चतम चेतना प्रकट हो जाएगी
37:24आ रही ये बात समझे
37:48लेकिन हिरने कशिपू मर कर भी नहीं मर सकता क्योंकि वो व्यक्ति नहीं है
37:52व्यक्ति तो चलो मर गया तो चला जाता है
37:55वो एक सिध्धान्त का प्रतीक है सिध्धान्त नहीं मरते
38:01उस सिध्धान्त का नाम है अहंकार अहंकार नहीं मरता
38:04जीव मरता है, हंकार नहीं मरता
38:07किस अर्थ में नहीं मरता?
38:09कि हर बच्चा जो पैदा होता है
38:11वो अहम वृत्ति लेकर पैदा होता है
38:13इस अर्थ में मैं कहा रहा हूँ कि हंकार नहीं मरता
38:17एक इंसान को मार दोगे अगला बच्चा पैदा होगा
38:19उसके भीतर भी हम वृत्ति होती है
38:24और जैसा मैं आप से कहा करता हूँ
38:26कि मुक्ति कोई मंजिल नहीं होती
38:28कोई पल नहीं होता
38:30जब तक शरीर है तब तक आपको
38:32लगातार मुक्ति की आत्रा करनी पड़ेगी
38:34लगातार आप रुक नहीं सकते
38:36आप ये नहीं कह सकते कि मैंने अपनी
38:38ईगो को अपने हंकार को
38:40पूरे तरीके से मिटा दीया है
38:41वो वापस आएगा चुनकि वो वापस आता है
38:44इसे लिए होली हर साल मनानी पड़ती है
38:48आप ये ना सोचेगी
38:50एक बार मिटा दिया हिरन कशिप गो तो चला गया नहीं चला गया वो वापस आता है रक्त बीज याद
38:55है अहंकार रक्त बीज होता है वो वापस आता है उसको आप कितना भी मिटाओ वो वापस आएगा तब तक
39:04वापस आएगा जब तक दे है क्योंकि वो दे है की उत्पत्ति
39:07है न जब तक दे है तब तक हम वृत्ति रहेगी और जब ये दे मिट भी जाएगी तो जो
39:16बच्चा नया पैदा होगा उसमें भी हम
39:17वृत्ति रहेगी तो हंकार हर तरीके से वापस आता है आप मिटा दो तो आप में वापस आएगा और आप
39:24ही मिट गए माने मर मुरा गए तो उसके बाद जो बच्चे हैं उन बच्चों में वापस आएगा तो इसलिए
39:31बार-बार होली मनानी पड़ती है बार-बार विवेक की
39:36आग में हंकार को जलना पड़ता है
39:37हर साल अपने आपको याद दिलाना पड़ता है
39:39कि अभी काम पूरा नहीं हुआ है
39:41जब तक सांस चल रही है
39:42तब तक माया का खतरा बना रहेगा
39:46इसलिए हम एक
39:48निश्चित अवधि पर एक एक अंतराल में
39:51बार बार अपने आपको याद दिलाने के लिए
39:53होली मनाते हैं ये होली का मर्म है
39:56ऐसे मनानी होती है
40:03लड़कियों पर गुबारा फेकने को होली नहीं बोलते
40:09या लड़कों पर अब लड़कियां भी तेजें भी फेकती है
40:13गुबारा फेको, कीचड़ फेको, पत्थर फेको, ये नहीं हो ली हो गई
40:26बात आ रहे हैं समझ में
40:35तुम्हें तो सब आया है न समझ में
40:39अब से आगे
40:51और हुली को अगर आपने विक्रत कर दिया है तो इसमें आप हुली को दोश मत दे दीजिएगा
40:56हुली का क्या दोश है? हुली के पीछे की जो कथा है वो तो बड़ी समरिद्ध है
41:01बहुत सुबोध है
41:04आप उसको नहीं समझ रहे हैं तो इसमें पर्व का दोश नहीं है
41:09लोकधर्म का काम ही है धर्म को विक्रत कर देना
41:16लोकधर्म होता ही इसी लिए ताकि वो धर्म को बिगाड सके
41:20और उसे अहंकार के उद्देश्यों की पूर्ति का साधन बना सके
41:35कथा कहीं नहीं कहती है कि आज बकरा कटेगा कथे में कथा में है कहीं है कथा तो कहती है
41:40हंकार कटेगा
41:41तुम बकरा काटने लग गए
41:46कथा नहीं कहती है कि सालेंसर निकलवा करके बाइक करते हुए चलना है क्योंकि होली है बुरा न मानो हेलमेट
41:52भी नहीं पहनना है
41:52जाके भिडा देना है
41:55देखना कितनी सड़क दुरघटनाएं होती है
41:58खुली के आसपास
42:13देखो दार्शनिकों, चिंतकों, रिशियों ने
42:16जितने साधन हो सकते थे करे
42:18अब उसके बाद भी अगर हमको नालाइकी करनी है
42:22तो यह हम जाने है
42:24और नालाइकी तो हमारी भरपूर है
42:33टीवी, एकपार, सोशल मीडिया
42:36शुरू हो गया है सब पर
42:37वही चल रहा है कि हो लिमाने ये
42:41जिन लोगों का धर्म से कोई लेना देना नहीं
42:43वो उचल-उचल कर नाच रहे हैं
42:45और उसमें कुछ नहीं है
42:55धर्म समझते हैं नहीं, सत्ते से प्रेम नहीं
42:59पर होली में सबसे आगे है
43:03पाता आ रही है समझ में
43:09तो कथा इसलिए कि उससे सीख लो
43:12सारी बाते
43:15अंकार की क्या प्रकृति प्रवरति होती है समझो
43:18वो डरा हुआ रहता है
43:20वो मेहनद भी करता है तो
43:23बस अपने स्वार्थ और आत्मरक्षा के लिए करता है
43:26वो दूसरों को डरा धमका कर रखता है
43:30शरीर के
43:32रिष्टे उसके लिए बहुत अर्थ नहीं रखते
43:34वो अपने बच्चे को भी
43:37आग में डालने को तयार हो जाता है
43:40अच्छा ये मज़िदार बात है
43:44विरोध तो दोनी और से है
43:48हिरणे कशिपू भी कह रहा है कि प्रहलाद को
43:51भसम कर दो आग में डाल दो
43:52और प्रहलाद भी कह रहा है कि
43:54मैं पिता का विरोध करने को तयार हूं
43:57पर क्या इन दोनों विरोधों में अंतर है
44:05हिरणे कशिपू विरोध कर रहा है
44:08और खूनी विरोध कर रहा है किसका
44:12प्रहलाद का किसके लिए
44:13अपने अहंकार के लिए आत्मरक्षा के लिए
44:16अहमरक्षा के लिए
44:19और हिरणे कशिपू कह रहा है
44:21होगे तुम मेरे शरीर के देह के बाप
44:25सत्य से बड़े नहीं हो गए
44:30खून का कोई भी रिष्टा
44:34सत्य से बड़ा नहीं हो जाता
44:36सत्य की खातेर
44:39अगर देह के रिष्टों
44:42दोस्तों यारों
44:44यहां तक कि
44:45परिवार के लोगों का भी विरोध करना पड़े
44:47तो ठीक है
44:48यही तो किया है प्रहलाद ने
44:55बात आ रही है समझ में
45:00खूली इसलिए नहीं है कि आज के दिन
45:02तो जाकर दुश्मनों को भी गले लगाना होता है
45:08खूली सरप्रथम तो इसलिए है
45:10कि जाकर अपने दोस्तों के सामने
45:13कुछ सक्ची बाते कर लो
45:17हमारे दुश्मन कोई उधर थोड़ी है
45:19जिनको हमने दोस्त क्या रखा है
45:21सबस्यादर दुश्मनी तो हमारी उनी से रहती है
45:27हमको डुबोने का काम
45:29हमारे दुश्मन थोड़ी करते हैं
45:30हमें बरबात करने काम तो हमारे दोस्तों नहीं किया है
45:36पहला आज सिखा रहा है कि कोई तुमारा दोस्त हो
45:39यार हो, रिष्टेदार हो, भले ही बाप हो
45:43सच सबसे बड़ा होता है
45:45किसी के सामने मत जुकना
45:54और आप में ते जिनलों को लगता हो
45:55कि खून का रिष्टा बहुत बड़ा होता है
45:57भूलना नहीं
46:00कि वो
46:02जो होली थी
46:04जिसको चिता कहा आना चाहिए
46:06वो सजाई उस बच्चे के बाप नहीं थी
46:10और उस पर उस बच्चे को लेकर उसकी बुवाई चड़ी थी
46:15तो रिष्टे नाते औगेरा तब तक तो चल जाते हैं
46:19जब तक परस पर जूट का आदान प्रदान होता रहे
46:22लेकिन जिस दिन रिष्टे में कोई खड़ा हो जाता है
46:25सची बात करते हुए
46:27उस दिन बहुत संभव है कि ये रिष्टेदारी आपको आग में जोकने को तयार हो जाएं
46:31सच को जूट नहीं परदास्ट कर सकता
46:35जूट यही चाहता है कि सच को आग में जोक दे
46:37यद्य पे उस आग में जोकोगे तुम जूट को
46:42तो जलेगा जूटी
46:44सच तो बच जाएगा जली हो लिका
46:46प्रहलात तो बच गया
46:52बात आ रही है समझ में
46:54तुम्हें बहुत मदा आ रहा है न
47:00बोलिए
47:01अचारे जी इसके साथ ही मतलब फॉल्ल आप भी था
47:04कि इतना उंचा ये मरम एतना जाधा
47:09विक्रित कैसे है
47:12इतना विक्रित कैसे हो गया
47:13जान बचाने में के लिए कुछ भी करना पड़ता है
47:17जब तुम्हारी जिंदगी में पहली चीज यही रहती है
47:20कि मैं जैसी हो मैं ऐसी ही रहूँ
47:22तो फिर तुम्हें किसी भी हद तक गिरना पड़ेगा, ये अच्छे समझ लो, जिसने अपने साथ ये शर्त, ये मजबूरी
47:29बांध ली, कि मैं जैसी हूँ, मुझे अपने आपको ऐसा ही बचागे रखना है, उसे अब किसी भी हद तक
47:34गिरना पड़ सकता है,
47:42तो ये अनायास नहीं हो जाता कि व्यक्ति में, समाझ में, धर्म में इतने विकार आ जाते हैं, अनायास नहीं
47:50होता, इसके पीछे एक कारण है, छोस सिद्धानत है,
47:53ठो सिद्धानत यह है
47:54कि हम कहते हैं
47:56वो चीज अच्छी होगी
47:58मैं उसको पाल हूँ
47:59अपनी जेब में रख लूँ
48:00लेकिन मैं जैसा हूँ
48:01वैसी बना रहूँ
48:05गीता मुझे मिल जाए
48:06धर्म मुझे मिल जाए
48:08ग्यान मुझे मिल जाए
48:12ताकि
48:12मैं जैसा हूँ
48:14बलकि ये सब जो मुझे मिल जाए
48:15ये मुझे और एक सुरक्षा चक्र दे दे
48:19ये होती है पहली गलती
48:21इसको आप आखरी गलती भी कह सकते हो
48:23इसके बाद और कोई गलती नहीं चाहिए
48:33खुद को खत्रे में डालने की
48:37आदत डालो
48:39अभ्यास करना शुरू करो
48:43जो भीतर बैठा हुआ है जूट
48:45अंतह करण में ये जो हंकार बैठा है
48:48इसके मिठने का अपना एक आनंद होता है
48:52वो खत्रा उठाओ
48:53मिठने का खत्रा उठाओ
48:55उसका स्वाद अनूठा है
49:01और जो कुछ भी भीतर गट्री बांध कर बैठे हो
49:03उसको बचाने की कोशिश करोगे
49:06बरबाद हो जाओगे
49:09काय की गट्री होती है
49:10अंकार क्या है
49:11क्या है उसकी गट्री
49:12क्या है उसकी हस्ती
49:13विश्वास
49:15माननेताएं
49:17आशाएं
49:19कामनाएं
49:23आस्थाएं
49:25कहानिया
49:25ये सब बांध कर बैठा है
49:27तुम इनकी रक्षा करना जाते हो
49:31और भीतर के जूट की रक्षा करने के लिए
49:34तुम्हें बाहर के सच को जुठलाना पड़ता है
49:39बाहर से फिर कोई तुम्हें सच भी देने आए
49:42प्रहलाद आया तो था सच देने हिरनकशप को
49:45बाहर से फिर कोई सच भी देने आए
49:46तो तुम यही कहोगे कि तुझे आग में जला दूँगा
49:50जूट के लिए जानलेवा दुश्मन हो जाता है कौन
49:53सच वो कहता है तुम बुलाओ इसको जलाओ
50:04बुलना नहीं तुम अपने दोस्त नहीं हो
50:10तुम अपने दोस्त नहीं हो
50:11खुद से बच कर रहो हे राम मुझे मुझे से बचा
50:20बहुत होशियार मत बनो तुम्हारी होशियारी तुम्हें भारी पढ़ती है
50:25तुम्हें तुम्हारी होशियारी नहीं चाहिए
50:29तुम्हें तुम्हारी अनुपस्थित ही चाहिए
50:31तुम हटो तुम मिटो वो जरूरी है तुम्हारे लिए
50:38बोलिये, बोलिये, पोली से सम्मंदित कुछ हो तो अभी बोलिये, नी तुर आगे बढ़ें, कुछ बोलना है, बढ़ियां है ना,
50:47बढ़ियां है तो ही बोलना, चलो बोलो, जल्दी से बोलो, छोटा सा बोलो
50:52प्रणाम आचायरी जी, मुझे ये कहना है कि आपने अभी प्रहलाद की बात की और हिरने कशिपु की बात की
51:01तो ये कहा कि अज्ञान बहुत था जहां पर जैसे हिरने कशिपु में अज्ञान बहुत था तो वहीं पर उनी
51:10का जो पुत्र है वही जो प्रहलाद है वो वहीं पर
51:13पैदा हो सकता था
51:15तो उसी तरीके से मेरे घर में भी मैंने देखा कि
51:18बच्पन से बहुत ज़्यादा
51:20अंधविश्वास बहुत ज़्यादा ही था
51:22अगर थोड़ा मोटा भी होता तो शायद
51:24हम उसको थोड़ा नेगलेक्ट कर देते
51:25लेकिन कुछ जाद ही था, तो बचपन से हम ऐसे थे कि ये तो गलत है, ये चीज गलत है,
51:31ये तो अंदविश्वास है, लेकिन फिर भी ऐसे बोले जाता था कि मानो इसको मानो, तो आज जब आप बात
51:37करे थे तो मुझे ऐसे लग रहा था कि वो प्रालाद मैं ही हूँ, कि मतल�
51:53है, कि आपकी मैनत वेस्ट नहीं जा रही है, देखो, अहंकार बिचारे के साथ बदनसीबी यही है, वो बंधन है
52:10ना, वो जितना बढ़ेगा, खुद ही छट पटाएगा मुक्ति के लिए, इसी लिए तो प्रहलाद पैदा हो रहा है, हिरने
52:20कशिपू के यहाँ,
52:21मुक्ति की आकांख्षा बंधन से ही तो पैदा होती है, हिरने कशिपू महा बंधन है, तो प्रहलाद पैदा हो गया
52:32उसके, और फिर घरवालों से यह भी सुनने को प्रुटाएगा, यह बता दो, तुम कप, यह तो सब ठीक है
52:40कहानी औगेरा, हो गई यह पीर पर्वत सी पि
52:50लोगे तोहारी भी पीड़ा बहुत बढ़ गई है पर तुम पिघाली नहीं रहे तुम जमे बैठे हो अपनी जगे पर
53:04अपने प्रहलाद स्वयम बनो तुम ही इरणने कशिपु हो तुम ही प्रहलाद होना पड़ेगा तुम ही बंधन हो तुम ही
53:15अपनी मुक्ति का वाहक होना पड़ेगा
53:20कब पैदा होगा प्रहलाद लोग कहते हैं आचारे जी बच्चे नहीं पसंद करते हैं मैं तो कह रहा हूँ पैदा
53:28करो
53:30मैं तो कह रहा हूँ
53:34मैं तो सब लड़कियों से बोलता हूँ माँ बनो और खुद को पैदा करो योगी तो अभी तो तुम ही
53:40नहीं पैदा हुई हो
53:42और सब लड़कों से बोलता हूँ तुम भी बाप बनो पहले खुद को तो पैदा करो तुम कहां किसी और
53:49को पैदा करने निकल पड़े
53:59इतने सारे पैदा करके बैठे हो, एक प्रहलाद भी पैदा कर लो, ये होली का संदेश है
54:07मैंने कुछ बहुत गलत बोल दिया भी अभी, मैंने वो बिलकुल नहीं बोला है, जो आप में से कुछ ने
54:13समझा होगा
54:18मैं भौतिक शारिरिक प्रहलाद की बात नहीं कर रहा हूँ, पैदा करने मत लग जाना
54:24मैं कहा रहा हूँ, तुम्हे ही अपना प्रहलाद खुद होना पड़ेगा
54:31हम, हो गया
54:34धन्यवाद अचाधी जी
54:44क्या लगदा में
54:47सब्सक्राण नहीं
54:50परने देख पॉस्ट करने करते दो बेंगेदा तरीज में आपके इसना है
54:57कि अभीक दो
54:59क्यों हम गाफ़ा क्यों अभाज फूर्म करनी है
55:13प्रेशारा धेखिए
55:14तक दों क्यों है
55:15तुम क्या अभी लगा ओगें
55:19फ्रैस्ट
55:20अब ही सब लोग साइन करा रहे हैं अच्छा लगाओ
55:52अब ही सब दोगा हैं ही एफड़ा अच्छा दौगा रहे हैं अच्छा रहा हैं अच्छाओा रहे हैं हो अच्छास्टा कर
56:00दो लोगधा हैं
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