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00:00एक गाय है वो एक शेर को दिखती है बताओ शेर ने अभी अभी जो देखा उसका अर्थ क्या है शेर के लिए मास शिकार हत्या मृत्य और वही गाय उसके अपने बचड़े को दिखती है बताओ अभी अभी बचड़े ने जो देखा उसका अर्थ क्या है उसके लिए दूद म
00:30मन दुख कानभव करता है
00:32मन के लिए दुएत क्या होता है
00:34कि मैं हूँ बाहर एक दुनिया है
00:37मैं अधूरा हूँ
00:39अपूर्ण हूँ
00:40शुद्र हूँ
00:41अतरिप्त हूँ
00:42मेरे लिए खतरा भी हो सकता है
00:44और ये संसार मेरी कामनाओं की
00:46पूर्ट का साधन और कारण भी बन सकता है
00:50तो फिर मेरा और संसार का रिष्टा क्या हो जाएगा
00:52अधूरायत क्या कह रहा है
00:53धूरायत कह रहा है
00:54ठीक है तुम्हें दुनिया दिखाई दे रही है
00:56बहुत सीधी बात है इमानदारी की
00:58चाहे रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्टावक्र हो रिष्ट
01:28सूला में कहते हैं कि द्वैत ही दुक का मूल है और अद्वैत ग्यान के अलावा इसका कोई लाज नहीं है द्वैत ही दुक का मूल है ऐसा क्यों कहा गया है इस पे थोड़ी स्पिश्टता दीजिए
01:41द्वैत क्या है कई तरीके से द्वैत की व्याख्या करी गई है परिभाशित किया गया है लेकिन अगर हमारा मन द्वैत में जी रहा है तो उसका अर्थ क्या है
02:11और मन के लिए द्वैत के अर्थ और अंजाम क्या होते हैं हम उसी पर ज्यादा ध्यान देंगे अभी अगर हम समझना चाहते हैं कि जैसा आपने कहा कि द्वैत दुख का मूल है रिश्य अश्टा वकर को उध्रत करते हुए तो दुख तो मन के लिए होता है ना
02:41मन दुख कानभव करता है तो मन के लिए द्वैत क्या होता है ये हम समझना चाहेंगे
02:50मन के लिए द्वैत होता है ये धारणा ये विश्वास कि मैं हूँ और बाहर एक दुनिया है
03:11और मैं अधूरा हूँ ये जो बाहर दुनिया बिखरी हुई है इससे मुझे पूरापन मिल जाएगा
03:26मैं हूँ बाहर एक दुनिया है ये दोनो अलग अलग है और दोनों की अपनी प्रथक सत्ता है
03:42दोनों एक दूसरे से अलग है और दोनों है मिथ्या दोनों में कोई नहीं है दोनों है तो यहां से आया दुएत कि दो है एक मैं हूँ और एक मुझसे बाहर ये एक अनंत संसार है जो पसरा हुआ है
04:05मैं अधूरा हूँ और इस संसार से मुझे पूर्ति मिल सकती है क्योंकि हम दोनों अलग अलग है तो इस संसार के पास कुछ ऐसा हो सकता है बल्कि है जो मेरे पास नहीं है
04:26समझना इस संसार के पास ऐसा कुछ हो सकता है जो मेरे पास नहीं है क्योंकि मैं तो बहुत आधा धूरा हूँ
04:34तो फिर संसार आपके लिए क्या हो जाएगा मैं हूँ अपूर्ण हूँ खुद्र हूँ अत्रिप्त हूँ और बाहर ये संसार है इतना बड़ा ठीक
04:50और ये संसार मेरे लिए खतरा भी हो सकता है ये मुझे भय, कष्ट, मृत्यु दे सकता है और ये संसार मेरी कामनाओं की पूर्ट्य का साधन और कारण भी बन सकता है
05:10साधन और कारण तो छोड़ दो ये संसार मेरे लिए साध्य भी बनेगा क्योंकि मुझे जो चाहिए वहीं तो है तो अंतता मुझे संसार ही चाहिए
05:20तो फिर मेरा और संसार का रिष्टा क्या हो जाएगा द्वैत में व्यक्तिका और जगत का रिष्टा क्या हो जाएगा
05:40जगत को पूजने लगेगा
05:41वो सीधे नहीं कहेगा कि
05:43संसार में तेरी पूजा कर रहा हूँ
05:45वो संसार में किसी तरह
05:48कि छविया निर्मित करेगा
05:51और उनकी पूजा शुरू कर देगा
05:52क्योंकि पूरे संसार की पूजा कैसे करोगे
05:54बड़ा मुश्किल हो जाता है, संसार में
05:56महाते भाते की चीज़ें हैं, हर चीज सब को
05:58नहीं चाहिए न, सब को
06:00सब चीज़ें नहीं चाहिए, हाला कि संसार में
06:02ऐसा कुछ भी नहीं है, जो किसी को नहीं चाहिए
06:04तो पूरे संसार की आप पूजा
06:08नहीं करोगे लेकिन संसार में आपको जो कुछ भी वांचनी है जिस भी
06:17चीज की आपको कामना है आप उन सब को इकठा करके उनकी
06:25पूजा करना शुरू कर दोगे और सब के लिए संसार में ऐसा
06:33कुछ ना कुछ बलकि बहुत कुछ है जरूर जो उनको चाहिए है ठीक है ना जो चीज आप त्याग देते हो
06:39वो किसी और को चाहिए होती है जो आप के लिए बिलकुल त्याज्य है वो किसी और की कामना बन जाता है
06:50ऐसा होता है कि नहीं
06:53और संसार में कुछ भी ऐसा नहीं
06:56जो सब की कामना हो और कुछ भी ऐसा नहीं
06:59जो सब को त्याज्य हो
07:01ले देखर करके जिसको जो कुछ भी चाहिए संसार से ही चाहिए
07:07तो सब फिर संसार में निर्मित करते हैं
07:12अपने लिए एक पूज्य च्छवी वो जो पूज्य च्छवी होती है उसके माध्यम से आप कुछ नहीं कर रहे संसार की ही आराधना कर रहे हो
07:24आप संसार के ही सामने नमित हो गए हो संसार की पूजा करना शुरू कर देते हो
07:29उसका प्रमाण ये है, कि फर्क नहीं पड़ता कि आप किसको पूझते हो, पूझते आप कामना के लिए ही हो, और कामना की जो वस्तु होती है, बताईए वो कहां होती है, स्थित कहां होती है वो, संसार में, कामना की जो वस्तु है आपकी, वो सदा स्थित कहां होती है, पाई
07:59मूल क्योंकि द्वयत हमें भ्रम में डाल कर हमें भिखारी बना देता है हमारी सच्चाई ये है कि अनंथ हैं हम और पूर्ण है हम और कहीं इधर उधर हाथ जोड़ने की भिखारी
08:19बनने की कोई आवश्यक्ता है नहीं पर द्वायत हमें ये जतला देता है कि एकदम खाली हैं हम दरिद्र हैं हम बेसहारा हैं हम और हमारा मालिक बना देता है संसार को
08:35और फिर इंसार जीवन भर कटोरा लिये लिये फिरता है
08:41इसलिए इस्टा वक्र कह रहे हैं कि द्वैत ही दुख का मूल है
08:47अब बात थोड़ी और आगे बढ़ेगी
08:57एक तो यह है कि मैं भिखारी बन गया
09:01और संसार से भीख मांगने लगा
09:04यह मेरी बात थी
09:05मैं भिखारी बन गया
09:06मैं संसार से भीख मांगना हूँ
09:08अब जरा संसार की बात करते हैं
09:09कि संसार भीख देने में सक्षम कितना है
09:11मैंने तो मान लिया है कि
09:14दुनिया से यह ले लूँ वो ले लूँ
09:15संसार भीख दे भी पाएगा क्या
09:18ये संसार क्या है समझने वालों ने पाया है और समझाया है कि संसार आप ही कि प्रतिछवी है प्रतिधोनी है प्रतिबिम्ब है अनुगूज है
09:35आप चल रहे हों आपकी पदचाप है संसार की आप से प्रतिधक कोई सत्ता नहीं है आप ही का प्रक्षेपण है संसार ये बात समझने में थोड़ी सी जटिल हो जाती है कि संसार मेरा ही प्रक्षेपण कैसे है
09:53दो अर्थों में संसार हमारा प्रक्षेपण होता है अस्तित्यों के तल पर और अर्थ के तल पर अस्तित्यों के तल पर संसार ऐसे हमसे भिन्न नहीं होता
10:09कि क्या आपके लिए संभव है कि आप संसार को द्वि आयामी देख पाएं या चार आयामों में देख पाएं आप संसार को त्री आयामी थ्री डायमेंशनल ही क्यों देखते हो
10:31क्योंकि आपका अपना शरीर त्री आयामी है क्योंकि आपकी अपनी आखें तीन आयामों के अलावा कुछ और देख भी नहीं सकती
10:45तो संसार को जो हमने त्यायामी सत्ता दी है
10:51जो three dimensional existence संसार का हमें प्रतीत होता है
10:56वो वास्ताव में संसार का नहीं है वो हमारा है
10:58यो ही कलपना कर लिजिए ऐसा हो नहीं सकता
11:04पर कलपना कर लिजिए कि कोई ऐसा जीव है कोई कीट है
11:07जो दो ही आयामों में होता है
11:12एकदम चप्टा है, ठीक है, एकदम चप्टी, अब एकदम चप्टा कुछ हो नहीं सकता, कुछ न कुछ तो उसको उचाई चाहिए, भले एकदम नियून उचाहिए, माली जी कुछ एकदम चप्टी चीज है, टू डाइमेंशनल, वो सिर्फ एक्सवाई प्लेन में होती है, �
11:42तुम्हारा जो मस्तिश्क है, ये सिर्फ थ्री डाइमेंशनल प्रोसेसिंग कर सकता है, तो इसलिए तुम्हें ये थ्री डाइमेंशनल यूनिवर्स जो है, वो experience होता है, ये तुम्हारी आखें तीन आयमों के लावा कुछ, ये तुम्हारे कान, एक बहुत सीमित फ्रीक्�
12:12अबजेक्ट को रखने के लिए थ्री डाइमेंशनल स्पेस चाहिए न, अगर आपको लगता है कि आपका शरीर त्रियायामी है, तो कोई थ्री डाइमेंशनल चीज रखने के लिए आपको क्या चाहिए होगा, टू डाइमेंशनल में काम चल जाएगा, तो इसलिए थ्री ड
12:42करिए जो फामे अपने चारों और जो यह एक्जिस्टेंशियल रियालिटी अनुभाव होती है उसमें यही तो होता है न एक्स वाई-जेटी एक्स वाई-जेट बॉड़ी है टी माइन्ड है
12:57तो यह जो आप दुनिया देख रहे हो यह आप से प्रिथक नहीं है
13:03यह तो बात हुई दुनिया के अस्तित्युकी अब दुनिया का अर्थ ले लीजिए
13:09आप सोचते हो कि दुनिया के पास जो अर्थ है वो दुनिया के अपने है नहीं दुनिया के अपने नहीं है
13:18किसी भी विशय में, अबजेक्ट में, आप जो अर्थ देखते हो, वो अर्थ उस अबजेक्ट का नहीं है, वो आपका है
13:25आप किसी भी अबजेक्ट में जो अर्थ देखते हो, वो अर्थ उस अबजेक्ट में नहीं है, वो अर्थ आपका है
13:34एक गाय है वो एक शेर को दिखती है बताओ शेर ने अभी अभी जो देखा उसका अर्थ क्या है शेर के लिए
13:47मास शिकार है ना हत्या मृत्यू और वही गाय उसके अपने बचड़े को दिखती है बताओ अभी अभी बचड़े ने जो देखा उसका अर्थ क्या है उसके लिए
13:59दूद मात्रित वमता एक ही अर्थ होता है किया किसी भी विशय का किनी भी दो लोगों के लिए
14:10मैं भी जो आप से बातें अभी यहां पर कर रहा हूँ
14:15क्या उन बातों का आप सब के लिए
14:16एक ही अर्थ है, साजहा अर्थ है? बिलकुल नहीं
14:19ये बहुत साधारन बाते की गई हैं
14:22और अभी बहुत कम बाते की गई हैं
14:23लेकिन फिर भी आप जितने लोग बैठे हुए हैं
14:26सबने इन बातों का अपने अपने अनुसार
14:28कुछ-कुछ अलग-अलग अर्थ कर लिया होगा
14:30समझ में आ रही है ये बात की नहीं?
14:36तो ये जो दुनिया है
14:38ये वास्तों में आप से बिलकुल जुड़ी हुई चीज है
14:43इतना आपको नहीं भी समझ में आ रहा हो
14:45कि मैं ही ये दुनिया हूँ
14:46कि मेरी ही चाया ये दुनिया है
14:49तो भी इतना तो इस पश्ट हो रहा है ना
14:50कि मैं और दुनिया बिलकुल
14:52एक सिक्क्य के दो पहलु ओ इतना सोच में आ रहा है न?
14:55दुएत में ये बात समझी ही नहीं जाती
14:58दुएत कह देता है मैं अलग हूँ दुनिएा अलग है
15:01मैं अलग हूँ और उधर कोई और है जो अलग है
15:03और जब उधर कोई और अलग है तो फिर ये आशा उठ खड़ी होती है कि उधर वाले के पास कुछ मुझसे बहुत भिन्न और बहुत विशेश होगा जो मेरे पास नहीं तो प्राप्ति हो जाएगी
15:15अगर दूसरा बहुत अलग है तो उससे कोई बहुत अलग चीज पाने की आशा भी आ जाएगी न
15:22अद्वायत में आप समझ जाते हो कि अरे ये दोनों तो एक ही माया के दो चेहरे हैं मैं और जगत जीव और जगत स्वहम और संसार ये एक ही सिक्य के दो पहलू है और दोनों एक दूसरे के बिना जी नहीं सकते
15:42जीव कहता है मैं जगत से आया और जीव जब आखे खुलता है तो उसने जगत को पाया कौन कहेगा जगत है अगर जीव नहों और जीव जैसा होता है जगत उसके नुसार होता है तो जगत को रूप रेखा जीव देता है और दूसरी और जगत अगर नहों तो जीव कहां से
16:12आप द्वैतवादी हो गए तो आपको लगेगा कि मुझसे अलग कहीं कुछ है जो बहुत भिन्न है और वो मुझे मिल सकता है कामना के माध्यम से मिल जाए चाहे पूजा के माध्यम से मिल जाए किसी भी माध्यम से मिल जाए मिलेगा मुझसे बाहर कहीं कुछ है उससे
16:30साधन बदल सकते हैं
16:35साधन बदल सकते हैं
16:36दोयतवादी नास्तिक होगा
16:38जिस अर्थ में नास्तिक शब्द का उपयोग होता है
16:41दोयतवादी नास्तिक होगा
16:43वो कहेगा मैं मेहनत करूँगा
16:44मैं कमाऊँगा और दुनिया से बहुत सारा
16:47पैसा आर्जित करके लाओंगा
16:49और द्वयतवादी आस्तिक होगा
16:51वो कहेगा
16:52मेरे भगवान है बाहर मुझसे दूर कहीं
16:56अलग है न वो
16:57मैं खूब साधना करूँगा
17:01मैं खूब
17:02पूजा करूँगा और वो प्रसंद हो करके
17:06मुझे
17:06वरदान दे देंगे
17:08मुझे त्रिप्ति हो जाएगी
17:10द्वयतवादी नास्तिक भी हो सकता है
17:13द्वयतवादी आस्तिक भी हो सकता है
17:14लेकिन दोनों का मानना
17:18एक अर्थ में बिलकुल साजा रहेगा
17:20क्या?
17:22उधर, आउट देर कुछ है
17:24जो मुझे
17:26त्रिप्ति और पूर्णता दे देगा
17:28समझवे आ रही है बात
17:31और
17:33रिशी अश्टावकर क्या समझाते हैं
17:35वो कहते हैं
17:37बिटा एक बात बताओ
17:38तुम आईने के सामने
17:41खड़े हो जाते हो
17:41जो चीज तुम्हारे चेहरे में नहीं है
17:43वो तुम्हें आईना दे देगा
17:44क्या
17:44क्यों नहीं दे पाएगा
17:47क्योंकि वो जो आईने में हो
17:52तुम्हारा ही तो प्रतिबिम्भ है
17:53अगर तुम्हारे पास नहीं है सरुप्रथम
17:54तो आईने में कहां से आएगा
17:57बात समझ में आ रही है
17:58जो तुम्हारे पास नहीं है
18:00वो जगत तुम्हें कैसे दे पाएगा
18:02क्योंकि जगत क्या है
18:03तुम्हारा प्रतिबिम भी है
18:05तुम्हारे पास नहीं है
18:06तो जगत कहां से पालोगे
18:07जगत के पास बहुत कुछ है निसंदे है
18:10पर जगत के पास जो कुछ है
18:11वो सरवप्रथम तुम्हारे पास भी है तुम्में ही मौजूद है
18:16प्रकृत के वही तीन गुणों से तुम निर्मित हो सतरजितम और उन्हीं तीन गुणों से संसार भी निर्मित है
18:26और तुम्हारी अकांक्षा है गुणातीत जाने की
18:30आप जिस अत्रिप्ति को पाले हुए हो जो अत्रिप्ति आपको भीतर ही भीतर खाये जा रही है
18:40वो इन तीन गुणों का कुछ पाने की है या इन तीन गुणों के पार जाने की है
18:45पार जाने की है अब वो जो तीन गुण है उनका पिंड तो आप सोयम भी हो ना
18:51उन तीन गुड़ों का पिंड तो आप स्वेम भी हो
18:55तीन गुड़ों से त्रिप्ति मिल सकती तो अपने साथ ही कुछ तर्कीब करके मिल गई होती
19:00जब अपने साथ त्रिप्ति नहीं मिली तो संसार से क्या मिलेगी
19:07संसार के पास भी ले दे के वो तीन गुड़ी है और तो कुछ है नहीं और तुम्हें तीन गुड़ों से संतुष्टी होने वाली नहीं तुम्हें जाना है तीनों गुड़ों के पार माने प्रक्रति के पार माने तुम्हें जाना है त्रिगुणा तीत वही मुक्ति कहलाती है
19:37वही तुम्हें संसार से सुनाई दे जाता है, तुम बहुत करकश आदमी हो, संसार से तुम्हें मधुरगीत कैसे सुनाई दे जाएगा, संसार तुम्हें कुछ कैसे दे देगा, जो तुम्हारे पास पहले से ही नहीं है, बोलो न, संसार तुम्हारी छाया है, और ये उदाहर
20:07आप बहुत छोटे से होते हैं
20:10छाया बड़ी लंबी प्रतीत होती है
20:11आदमी भ्रमित हो जाता है
20:13हमें लगता है देखो हम छोटे से हैं
20:16संसार इतना बड़ा है
20:17हम छोटे से हैं संसार इतना बड़ा है
20:22लिकिन बताईएगा
20:24आपकी छाया में कुछ ऐसा हो सकता है
20:37ले रहती है है ना तो जीव का और जगत का वही संबंद है जो व्यक्ति और उसकी चाया का है लेकिन अज्ञान में हम अपनी चाया से ही पचास चीजें मांगनी शुरू कर देते हैं
20:54एक व्यक्ति को सोचिए जो अपनी इच्छाया के प्रति बड़ा कामातुर हो गया हो
21:01अपनी इच्छाया को देख रहा है किया रहा है वहां क्या चीज है कितनी लंबी है
21:05क्या लंबाई है और काली-काली है टॉल डाक एन हैंडसम है
21:13अपनी ही इच्छाया के प्रेम में पड़ गया है
21:17जीवन भर क्या कर रहा है वो अपनी ही इच्छाया को पकड़ने का
21:23प्राप्त करने का
21:26पूजने का कभी पटाने का प्रेतन कर रहा है
21:30ये आम इंसान की जिंदगी है
21:34हम अपनी ही चाय के पीछे भाग रहें
21:36और बताईए अपनी चाय को कोई पकड़ पाया आज तक
21:38इसलिए द्वैत दुख है
21:40वो जीवन भर आपको दोडाता है
21:42आपके हाथ कुछ नहीं आता है
21:43समझें बात आ रही है
21:49अद्वैत क्या कह रहा है
21:51अद्वैत कह रहा है ठीक है तुम्हें दुनिया दिखाई दे रही है
21:54बहुत सीधी बात है इमानदारी की
21:56कोई उसमें
21:58ऐसा
21:59गहन उसमें कोई
22:02दार्शनिक जटिलता नहीं है कि आप कहें
22:04अद्वैत बात तो बड़ा भयंकर होता है
22:06समझ में नहीं आता साधारन लोगों के लिए नहीं है
22:08अद्वैत आपसे बहुत इमानदारी का सवाल पूछता है
22:14वो कोई वाद भी नहीं है
22:16वो कोई मत नहीं है
22:18जब आप कहते हो फलाना वाद
22:20या इज्म
22:22तो वो एक मत बन जाता है
22:25एक उपीनियन बन जाता है
22:26अद्वैत कोई मत है यह नहीं
22:27जग्यासा है बताओ जग्यासा में कोई
22:28उपीनियन होता है क्या
22:30जग्यासा में कोई मत होता है क्या
22:32मत
22:33जग्यासा में किसी प्रकार की
22:37कोई सैधान्तिक द्रढ़ता या आग्रह होता है
22:39क्या
22:39कुछ नहीं होता, वहाँ तो लोच होती है, वहाँ तो बस पूछा है
22:43अद्वायत कहता है ये बता दो, ठीक है दुनिया सामने दिख रही है, बड़ी प्यारी लग रही है, कि बड़ी भयानक लग रही है, कि बड़ी अबूज लग रही है, जैसी भी लग रही है
22:52दुनिया को देखने वाला कौन है ये बता दो बस
22:57तुम्हें कैसे पता कि जगत है भी और अगर है तो वैसा ही है जैसा तुम्हें लगता है
23:03और तुम बदल जाते हो तुम्हारा अपना अनुभव ये रहा है कि तुम्हारा जगत बदल जाता है हाँ या ना
23:10तुम बदल जाते हो, तुम्हारा अपना अनुभव यही है, कि जगत तुम्हारा बदल जाता है
23:16बहुत सारे बच्चे पैदा होते हैं
23:21तो उनमें एक आरंभिक रंग अंधता होती है
23:26वो जब पैदा होते हैं तो कुछ महीनों तक कुछ रंगों को नहीं देख पाते हैं
23:29बताईए उनका जगत कैसा होता होगा
23:30उन रंगों से खाली
23:32पिर धीरे धीरे बड़े होते हों अपने आप उन रंगों को देखना शुरू कर देते हैं
23:36बहुत सारे बच्चों के साथ होता है
23:38आप बदले आपका जगत बदल गया कि नहीं
23:43आपके जगत में आरंभ में दो ही रंग थे वसमान लीजिए
23:47सफेद और काला और उनके बीज का ग्रे
23:50और आप बड़े होते गए आपका जगत रंगीन होता गया
23:54तो ये जो जगत है इसका अनुभाव करने वाले तो तुम ही हो न
23:59तुम्हें कैसे पता कि जगत वैसा ही है जैसा तुम्हें लगता है
24:04और सब प्राणियों के लिए और जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं में जगत बदलता जाता है
24:11अलग-अलग प्राणियों के लिए अलग है और एक ही प्राणि के लिए भी अलग-अलग अवस्थाओं में
24:16बलकि दिन के भी
24:18अलग-अलग समय
24:21अलग-अलग आपकी मांसिक स्थित में
24:25आपकी दुनिया ही आपके लिए
24:26बदल जाती है कि नहीं बदल जाती है
24:28बोली हाँ या ना
24:29बदल जाती है ना
24:32तो अद्वायत कहता है अच्छा तो ये दुनिया जैसी भी है
24:37वो लग तुमको ही रही है ना कि वैसी है तुम्हारे लावा तो कोई नहीं है ना प्रमानित करने के लिए
24:42तुम्हारे लावा तो कोई भी नहीं है ना जो प्रमानित करें कि दुनिया ऐसी है
24:49आप कहते हैं नहीं साब पांच और लोग हैं
24:51मेरे दोस्तियार वो प्रमानित कर रहे है
24:53वो जो प्रमानित कर रहे है
24:55उनको भी कौन प्रमानित कर रहा है कि वो है
24:57तुम ही तो कर रहे हो
24:58तो ले दे करके तुम अकेले ही हो
25:00जो कहता है कि दुनिया ऐसी है
25:03दुनिया ऐसी है और अद्वायत नहीं कहता कि दुनिया ऐसी है कि वैसी है कि ना ऐसी है ना वैसी है कि इसी तीसरे तरह की है वो तो बस प्रश्न करता है एकदम सधारन पालक की तरह आपके सामने खड़े हो जाता है और बहुत मासूम से आपसे सवाल करता है यह अद्वायत �
25:33चलो, तुम जगत का सत्य जानना चाहते हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ, लेकिन जगत का सत्य अगर जानना है, तो जानना पड़ेगा कि जगत प्रतीत किसको हो रहा है, जगत मुझे प्रतीत हो रहा है, तो फिर मुझे अपना सत्य जानना पड़ेगा, मैं कौन हूँ, मैं कौ
26:03मेरी चेतना के स्थिति मेरा जगत निर्धारित कर देती है
26:07आज मैं ऐसा था मुझे एक चीज बहुत पसंद थी
26:11कल मैं वैसा हो गया मुझे उसी चीज से नफरत हो गई
26:14यह हुआ है कि नहीं हुआ है
26:15बोलो आप कुछ खा रहे हो बड़ा रस ले लेके खा रहे हो
26:20तब ही कोई पीछे से दोड़ के आता बोलता अरे-अरे-अरे-अरे
26:22मक्ही गिरी हुई थी इसमें
26:24क्या हो गया वही जो इतना पसंद था ततकाल उससे घ्रणा हो गई है ना
26:30उठा करके दूर फेक देते हो चीखने चिलाने लगते हो
26:32क्या स्वाद लेकर खा रहे थे मन ऐसा खिला हुआ था
26:36और अब पूरे दिन ये खिला हुआ मन खिन रहेगा
26:40कि मक्ही खा ली आज तो
26:43बदल गया जगत के नहीं बदल गया
26:48जो इतना प्यारा था उसी से घ्रणा हो गई जगत बदल गया के नहीं बदल गया
26:52गया कहीं पर घुझ गये हो और ऐसा भ्रह्म हो गया है कि ये मेरा ही घर है और बड़ी देखभाल कर रहे हो उस जगह की कोई आकर बता देता है नहीं यह आपका नहीं आपका पडोस वाला है वही जो अपना था तत्काल बेगाना हो गया कि नहीं हो गया जिसकी अभी तक पर�
27:22जगत बदल गया कि नहीं, अगर जगत को एक घर मानो, हम जगत में रहते हैं, घर है हमारा, जगत को घर मानो, जगत बदल गया कि नहीं बदल गया, पूरा बदल गया, न?
27:30प्रसूती ग्रह होते हैं
27:35माओं को बच्चे होते हैं
27:37और अगर सरकारी इस्पताल हो गया रहा हो
27:38तो इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती हैं बहुत बार
27:41मा को उसको बच्चा लाकर के दिया
27:43वो बड़े प्यार से उसको दुलरा रही है
27:44हम और हाँ
27:49आधे एक घंटे उसको चूम लिया चाट लिया दुलरा लिया
27:53जो जो मा बेटे का रिष्टा होता हो सब हो गया
27:58वो पीछे से एक नर्स आती है वोलती है
28:01मैडम ये तुम्हारा नहीं है
28:03तुम्हारा वाला उधर है
28:06यही बच्चा
28:10जिसको मम्ता दे रही थी और पोशन दे रही थी अभी तक
28:14उसको तुरंत ऐसे दे देते हो
28:16जगत बदल गया न
28:17बदल गया की नहीं बदल गया
28:20तो इसलिए फिर
28:25विदान्त में आपको इस तरह के इतने ही उधारण मिलते है
28:29कि सीप को चांदी समझ लिया
28:33रसी को साप समझ लिया
28:37खंबे को भूत समझ लिया
28:41यह सब एकदम
28:45बड़े पुराने चले आ रहे उधारण है
28:48कि एक ही चीज होती है
28:51कितनों के लिए कितनी अलग-अलग हो जाती है
28:53सरोवर के उपर चान चमक रहा है
28:55और हवा चल रही है
28:57तो सरोवर में लहरें उठ रही है
28:59और चांद के कितने प्रतिविम बन जाते है
29:01नगाने कितने बन जाते है
29:02और सब थोड़े-थोड़े अलग-अलग रहते है
29:04लेकिन वस्तु एक ही है
29:05सब को अलग-अलग दिखाई देती है
29:07तो ये जो अलग-अलग दिखाई देता है
29:10ये जो अलग-अलग दिखाई देता है
29:12ये संसार है प्रक्रति
29:14प्रक्रति में बस विविधताएं होती है
29:16अनेकताएं होती है
29:17उसमें वास्तों में कुछ अलग-अलग है क्या
29:20अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं
29:24उन्हीं के कारण ये संसार सब के लिए अलग-अलग हो जाता है तो अद्वायत कहता है हम द्रिश्टा की पहले जांच पड़ताल करेंगे द्रिश्य की बाद में बात करेंगे
29:34आप डॉक्टर के पास जाएं
29:38आखों के डॉक्टर के पास गएं नेत्र चिकित्सक है आप कह रहे हैं
29:45डॉक्टर साब छे उंगलियां दिखाई देती है अब मुझे बताईए ये चिकित्सक आपके हाथ की चिकित्सक करें आपकी आँख की
30:00एकदम सोच समझ के बताईएगा क्योंकि दुनिया में कमी है ये हम सबको दिखाई देता है ठीक है यार लाइफ में ये ठीक नहीं चल रहा है बदलना मांगता है अपवर्ड मोबिलिटी मांगता है ये सब चलता है ना सबका
30:18ये द्रिष्टा है ये ये द्रिष्टा है ये सामने बैठा है चिकित्सक डॉक्टर साहब ये न छे हो जाती है कभी पॉने साथ हो जाती है कुछ मजा नहीं आता है कभी तो ये रेंबो पाम बन जाती है इंद्र धनुशी पंजा अलग अलग रंग आते हैं पता नहीं क्या
30:48अगर चिकित्सक थोड़ा भी समझदार है तो किसकी चिकित्सा करेगा आख की ये द्रिश्य है ये द्रिश्टा है अद्वैत इसकी चिकित्सा करता है ये द्रिश्टा है ये द्रिश्टा है ये द्रिश्टा है ये द्रिश्टा है अद्वैत द्रिश्टा की चिकित्सा करता ह
31:18पुलट ही दिख रहा है बाबा सबको सब उलट पुलट दिख रहा है क्यों क्यों कि सब यहां से उलट पुलट हो दृष्टा ही जो है वही गड़बड है तो जो दृष्ट है वो तो गड़बड दिखाई देगा न मैं ठीक हो जाओं मैं ठीक हो जाओं तो मैं जान जाओंग
31:48दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोई
31:54तो चाहे रिशी अश्टवक्र हो, रिशीयों की चाहे पूरी परंपरा हो
31:58चाहे संत कबीर हो, चाहे संतों की पूरी परंपरा हो
32:02सबने एकमत से यही कहा है कि दुआत ही दुख का मूल है
32:06दो इपाटन के वीच में साबुत बचाना कोई
32:11सबने कहा है कि एक ही सत्य है
32:14दो सत्य नहीं हो सकते
32:16ये समझ में आ रही है बात
32:21उस बेचारे आदमी की दुर्दशा व्यथा देखो
32:26दोयत समझना चाहते हो तो जीवन भर अपनी छाया के पीछे भागा है
32:31न पकड सकता है न छोड सकता है छाया है तो छूटेगी तो नहीं
32:38आप कह दो कि आप महाग्यानी हो गए हो एकदम मुक्त पुरुश हो रहे हो
32:42तो भी छाया तो रहेगी न माने संसार का अनुभाव तो होता रहेगा होता रहेगा की नहीं
32:47यहां ऐसा हुआ है कि आपको जानने में आया है फलाने थे वो एकदम उन्हें बोध प्राप्त हो गया तो उनको संसार का अनुभव होना ही बंद हो गया ऐसा तो नहीं होता
32:58अनुभव तो होगा कि पाउं के नीचे जमीन है
33:01अनुभव तो होगा कि यहां महाल में हवा है
33:04उसी से सास ले रहे हो, जी रहे हो
33:06यहां मेज पर हाथ रखोगे
33:08तो त्वच्चा को लकड़ी का अनुभव तो होगा
33:11होगा कि नहीं होगा
33:13तो यह सब तो रहेगा
33:14चाया से कोई पिंड नहीं छोड़ा सकता, तो देखो दुरदशा हमारी, न उसको पकड़ सकते, न छोड़ सकते, आग खोलोगे, आग खोलते ही क्या दिखाई देता है, आग बंद भी कर लो तो क्या दिखाई देता है, छोड़ा जाता नहीं, और पकड़ में भी किसी की आता
33:44कि पकड़ना है कि छोड़ना है कि क्या गरना है हमें तो यह जानना है कि हमारा और उसका रिष्टा क्या है जीव और जगत का पुरुष और प्रक्रति का संबंध क्या है हमें तो यह जानना है और वो जानने के लिए आप प्रश्न किस से करेंगे जिग्यासा किस से जीव से ही
34:14फिर स्वयम से ही प्रश्न करा जाता है
34:16कि तुम ये जो बात सोच रहे हो
34:18ये कहां से आई
34:19फलाने विशय में तुमने जो अर्थ भर दिये हैं
34:23वो अर्थ कहां से आ गए
34:24ये सब जिग्यासाएं ही अद्वयत की विधियां है
34:29स्वयम से ही प्रश्न करना
34:31और जो एक चीज अद्वयत मांगता है वो है इमानदारी क्योंकि खुद से ही सवाल करने हैं तो कुछ भी उल्टा-पुल्टा जवाब देलो एक दफे मुझे बड़ा कटाक्ष करना पड़ा था कि एकदम प्रचलन हो गया है फैशन बन गया है अपने आप से पूछना मैं क�
35:01मुझे विधी आती है और मैं विधी के बिलकोल अंत तक पहुँच गया ऐसे नहीं चलता है यह अद्वयत के नाम पे मजाग चल रहा है कि जितने ज्यानी बुद्ध पुरुष थे वो बता गए हैं कि भाई तुम अपने आपको आत्मा कह सकते हो या शुद्धता कह सकते हो
35:31खुद से ही पुछो मैं कौन हूँ मैं कौन हूँ पूछते वक्त ऐसे बनो जैसे पता नहीं है है नहीं तो पता चल लागा कि मामला रिग्ड है मैं आज फिक्सड है तो ऐसे नहीं दिखाना है मैं आज फिक्सड है ऐसे पूछो मैं कौन हूँ मैं कौन हूँ और ऐसे दर्�
36:01यह सब नहीं करना होता है
36:04यह एक सतत जीवंत निरंतर जिग्यासा होती है
36:09क्योंकि जैसे आपकी छाया आपके साथ लगातार है
36:13तो छाया का रूप, रंग, ढंग सब बदलता रहता है
36:18तो यह जिग्यासा भी लगातार होनी चाहिए
36:21जैसे जीवन लगातार है, जैसे श्वास लगातार है, जैसे चाया लगातार है, कि ये सब है क्या, ये अभी अभी जो हुआ क्या हुआ, और जब वो लगातार होती है, तो उतनी स्थूल नहीं रह जाती, जैसी अभी मैं बता रहा हूँ, मैं जैसे बता रहा हूँ, वो बहु
36:51जो ये जानने को हमेशा आतोर रहती है कि भीतरी महौल कैसा है जैसे भीतर एक climate sensor लगा हुआ हो जो आप कुछ भी कर रहे हैं वो sensor लगातार सक्रिय है active है आप कुछ भी कर रहे हैं आप अभी बैठे सुन रहे हैं लेकिन एक भीतरी sensor है जो सुनने के साथ साथ ये भी देख रह
37:21आ रहे हैं उनके उत्तर में भीतरी प्रतिक्रिया क्या हुई ये है जिग्यासा की विथी कि बाहर जो चल रहा है भीतर एक continuous alertness है भीतर एक mechanical deadness नहीं है यंत्रवत
37:45जड़ता सी स्थिति नहीं है भीतर कि भीतर से क्यों कोई प्रतिक्रिया आ गई आपको पता ही नहीं चला ऐसा नहीं है भीतर
37:54बीतर से कुछ उठा और आप मुस्कुरा दिये
37:58मुझे पता है तू कहां से आया
37:59कहां से आया कहां से आया
38:01अरे कल जहां से तू आया था आज भी वहीं से आया
38:04कल कहां से आया था परसो जहां से आया था
38:07बता परसो कहां से आया मैं साफ साफ जवाब दो
38:11परसों तु वहीं से आया था जहां से जन्म के पहले दिन आया था
38:15हां जन्म के पहले दिन कहां से आया था मैं
38:18जन्म के पहले दिन तु आया था मां से और बाप से
38:21अच्छा मां और बाप में कहां से आया था मैं
38:24वहां से तु आया था, एकदम जो पहली मा है, महा मा, उससे आया था, तो मैंने महा मा से उठ रहे हैं मेरे ये सारे, हाँ, और उसी को अहम वृत्ति बोलते हैं, महा मा में वो सब कहां से आया, ये जानने के लिए महा मा के पास जाना,
38:40जहां तक मेरा मामला था मैंने बता दिया, अब यही पूछना है कि अहम वृत्ति कहां से आती है, तो जाओ और अहम वृत्ति में प्रवेश करता है, जानने वालों ने कहा है, कि फिर वो अहम वृत्ति को विगलित ही कर देता है, न खुद बचता है, न वृत्ति बचती है, म
39:10आपके पास इतना समय नहीं होगा
39:15रियल टाइम आप यह सब नहीं कर पाएंगे
39:17जो मैंने आपको बोला यह सब तो फिर ठहर के करना पड़ेगा
39:19और जीवन के प्रवाह में ठहरना संभव नहीं है
39:22ठहरने वतलब यह नहीं के चल रहे थे रुख गए
39:25तो यह जितनी मैंने बात बोली
39:29वो एक शडांश में हो जानी चाहिए
39:32यह होती है अंतरिक अलर्टनेस
39:38यह जितनी बात अभी समझाई
39:40मुझ मैं कहां से आया कल कहां से आया
39:42परसों कहां से आया
39:43इसको ऐसे
39:44पलक जपकते देख लेना है
39:47चुटकी बजाते देख लेना है
39:49ये पूरी जो प्रक्रिया रही है
39:52अहम वृत्ति से लेकर के
39:54आज तक के जीवन की
39:56वो एकदम ऐसे कौंध जाये
39:58जैसे आकाश में बिजली
39:59एक शण को कौंध ही और सब दिख गया
40:01सब समझ में आ गया
40:02उसमें फिर शब्दों से काम नहीं चलता
40:05मैं आपको शब्दों का साहरा ले लेकर समझा रहा हूँ
40:07अच्छा तू कहां से आया तेरा बाप कौन है
40:09ये वो फुलाना कल कहां से आता था
40:11घर बता ठिकाना पता
40:12ऐसे नहीं हो पाता है
40:14आप ऐसे करने बैठोगे तो गाड़ी निकल जाएगी
40:17समझ में आ रही बात
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