Skip to playerSkip to main content
  • 3 months ago
नक्सलबाड़ी, एक ऐसा गांव, जिसने कभी नक्सल आंदोलन को जन्म दिया और आज, वही गांव पश्चिम बंगाल की बदली हुई राजनीति का प्रतीक बन चुका है. नक्सलबाड़ी में ये बदलाव साफ दिखता है. गांव के नए कारगिल वॉर मेमोरियल से लेकर इसके ऐतिहासिक  तियानमेन स्क्वायर तक.उत्तर बंगाल का नक्सलबाड़ी, जो कभी नक्सल आंदोलन का केंद्र था, अब भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ बन चुका है. इस बदलाव की शुरुआत मानी जाती है साल 2017 से जब अमित शाह ने नक्सलबाड़ी में एक दलित परिवार के साथ भोजन किया और इसे ऑपरेशन लोटस की शुरुआत के तौर पर देखा गया.बीते वर्षों में भाजपा ने पश्चिम बंगाल में तेजी से विस्तार किया. विधानसभा में लगभग शून्य से दो अंकों की सीटों तक, खास फोकस रहा उत्तर बंगाल की आदिवासी और हाशिए पर रहने वाली आबादी पर, कभी फूस की झोपड़ियों में रहने वाले परिवारों को अब पक्के घर मिले.  उत्तर बंगाल की 54 विधानसभा सीटें निर्णायक मानी जाती हैं, दार्जिलिंग के गोरखा और कूचबिहार के राजबंशी समुदाय अपनी अलग पहचान और राजनीतिक अलगाव की उम्मीद के साथ भाजपा को मसीहा के तौर पर देख रहे हैं. यहां तृणमूल कांग्रेस हाशिए पर दिखाई देती है.कभी वामपंथ का गढ़ रहा नक्सलबाड़ी, अब इतिहास के पन्नों में सिमटता दिखता है. कानू सान्याल और चारु मजूमदार से शुरू हुआ आंदोलन. आज कुछ मूर्तियों और स्मारकों तक सीमित रह गया है.नक्सलबाड़ी का ये इलाका स्थानीय लोग, तियानमेन स्क्वायर के नाम से जानते हैं. लेकिन आज हालात ये हैं कि पास के खेत में काम करने वाली महिलाओं को भी ये नहीं पता कि यहां खड़ी मूर्तियां किसकी हैं.इसके उलट, गांव के प्रवेश द्वार पर बना कारगिल वॉर मेमोरियल हर किसी की नजर में है. युवा यहां सेल्फी लेते हैं और इसे देशभक्ति के प्रतीक के तौर पर देखते हैं. ये स्मारक धीरे-धीरे नई पीढ़ी की स्मृति का केंद्र बनता जा रहा है.87 साल की शांति मुंडा आज भी उस दौर को याद करती हैं. जब नक्सलबाड़ी में वाम आंदोलन अपने चरम पर था. उनका मानना है कि सशस्त्र संघर्ष एक गलती थी लेकिन उन्हें अब भी भरोसा है कि वाम आंदोलन एक दिन लौटेगा.कानू सान्याल की बांस की झोपड़ी, जो अब एक पुस्तकालय है. आज भी नक्सलबाड़ी के इतिहास की गवाही देती है. इसे पर्यटन स्थल बनाने की योजना पर स्थानीय लोगों में नाराजगी भी है.क्सलबाड़ी आज दो स्मृतियों के बीच खड़ा है. एक ओर नक्सलवाद का अतीत, दूसरी ओर राष्ट्रवाद का नया प्रतीक. 2026 के चुनाव में ये गांव एक बार फिर पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय करता दिखेगा. 

Category

🗞
News
Comments

Recommended