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  • 7 months ago
पूरा वीडियो : जिज्ञासा स्वास्थ्य है और मान लेना रोग || आचार्य प्रशांत (2025)
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Transcript
00:00नहीं, नहीं, मैं तो अब चाय भी नहीं पीती दूद की, पर ससुर जी, जेट जी, अब ये लोग जब मौज में आ जाते हैं, तो बकरा बना देती हूं, उसके तो मैं बरतन और मसाले भी अलग रखती हूं, वही अपना अपना करम है, मैं थोड़ी खा रही हूं, मैं तो तर
00:30थे, क्योंकि बोल दोगी, तो सुख सुईधा पे बड़ी चोट पड़ेगी, तो पाखंड एक पकड़ा है, कि नहीं, मैं तो ठीक हूं न, मैंने थोड़ी कोई खाया है, वो तो ससुर जी और जेट जी के लिए बनाया है, पहले भी पाखंड था, अब भी पाखंड है, कु
01:00यह सस्ती शुचिता होती है, मैं तो नहीं करता न, मैं तो अब इन चीजों से मुक्त हूं न, उससे नहीं होगा, अगर बंधन बुरा है, तो जितना तुम्हारे लिए बुरा है, उतना ही, सामने वालों के लिए भी बुरा है, अगर तुम बंधन से मुक्त हो, तो कहीं से �
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