00:00जब खुद राश्ट्रपती ने राए मांगी है तो इसमें दिक्कत क्या है? क्या आप वाकई इसे चुनौती देना चाहते हैं?
00:19सुप्रीम कोर्ट की पांच जचों की समविधान पीठ ने केंद्र सरकार से ये तीखा सवाल पूछा जब राज्य सरकारों द्वारा पास किये गए बिलों पर राश्ट्रपती की मंजूरी में होने वाली अनिश्यत कालीन देरी पर सुनवाई हो रही थी। ये पूरा मामला �
00:49कहता है कि यथा शीगर होना चाहिए लेकिन इस यथा शीगर की कोई सामय सीमा नहीं यानि कि 5 दिन, 10 दिन, 2 महीने, 6 महीने या फिर साल भर ऐसा कुछ भी वर्नित नहीं है। इसी का फायदा उठा कर खास कर उन राज्यों में जहां केंद्र और राज्य में अलग-अलग द
01:19करने के लिए एक निश्यत समय सीमा तै करवाने के लिए ये पूरा मामला सुप्रीम कोट पहुंचा है।
01:49इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार का मानना है। समय सीमा तै करना समविधान में बदलाव करने जैसा है और ये अधिकार सरफ संसत का है अदालत का नहीं। सरकार के इस कड़े रुख के पीछे एक बड़ा राज्यों नैतिक कारण है।
02:04राज्यपार जो केंद द्वारा नियुक्त होते हैं उसके पास राज्य सरकार के किसी भी कानून को अनिश्यत कालीन तक रोखने की ताकत है और ये केंदर के लिए एक बड़ा राजनैतिक हत्यार है अगर सुप्रीम कोट एक समय सीमा तै कर देता है तो केंद सरकार का विपक्
02:34की भूमिका भी एहम है क्योंकि राज्यपाल किसी बिल को राश्यपाल के पास विचार के लिए भीज सकती हैं जिससे देरी और बढ़ेगी सुप्रीम कोट का जो शुरुवाती सवाल था वो इस पूरी प्रक्रिया पर एक गहरी टपणी है कोट ये नहीं कह रहा कि राश्य
03:04कोट का असली मकसद लोगतंत्र की रक्षा करना है उसका मानना है कि अगर जनता द्वारा चुनी गई विधान सभा के फैसलों को एक गयर निर्वाचित पद पर बैठा व्यक्ति अर निशत काल तक रोग सकता है तो ये जनता के जनादेश और लोगतंत्र का सीधा अपमान ह
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