अब गुप्ता जी इंदौर के निवासी थे और राजेंद्र नगर के इलाके में रहते थे। वहां से उन्हे विजय नगर जाना था। ये दोनों इलाके शहर के अलग अलग छोर पर थे। पर उन्हे रूट दिया गया एयरपोर्ट के वहां से गांधी नगर तक। वो तो बहुत ही लंबा था। साथ ही बीच के कुछ स्टॉप थे जैसे, वहां काकुल होजियरी से 10 रु वाला एक रुमाल लेना था। जिसका बिल भी लेना था। वहां से मालगंज की बस पकड़नी थी जहां की सब्जी मंडी से दो खीरा, दो टमाटर और दो चुकंदर ’रामलाल ताज़ी सब्जी से लेना था। उसके बाद राजवाड़ा की बस पकड़नी थी जहां खजूरी बाजार से 2 रु वाला बॉलपेन और 5 रु वाली डायरी लेनी थी। उसके बाद सीधे विजय नगर चैराहे पर उतरकर ऑफिस में फोन करना था। गुप्ता जी को ये सब अजीब तो लग रहा था पर फिर भी उन्होंने सोचा टाइम मैनेजमेंट तो सीखना पड़ेगा इस तरह बोरिंग लाइफ अब नहीं जी जा सकती। अगले दिन सुबह 10 बजे नहा धोकर, नाश्ता कर के दिए हुए कार्यों को करते हुए 4 घंटे में गुप्ता जी ट्यूटोरियल वालों को ऑफिस पहुंचे। पेट में भूख के मारे चूहे दौड़ रहे थे। जल्दी जल्दी सारे बिल दिए वहां पर एक बुजुर्ग से व्यक्ति आए बोले “आप ही मिस्टर गुप्ता हैं न।“ गुप्ता जी बोले ’जी’ बुजुर्ग बोले “मैं रोशनलाल आपका ट्रेनर 3 दिन की ट्रेनिंग मैं ही दूंगा। चलिए 3000 रु फीस भर दें।“ गुप्ता जी अधिकारी रहे थे सो तीन हजार कोई बड़ी बात न थी वो तो बस जैसे तैसे इस नीरसता से निजात चाहते थे। उन्होंने फटाफट रिसेप्शन पर बैठी रिसेप्शनिस्ट को 3000 दिए और रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें एक कागज़ थमाया जो रसीद कम रूल्स एंड रेगुलेशन थे जिसमें लिखा था
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