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  • 7 minutes ago
कलचुरी राजाओं के शासनकाल की ऐतिहासिक विरासत आज भी मंदिरों, मूर्तियों और स्थापत्य कला के रूप में है मौजूद. विश्वजीत सिंह राजपूत की रिपोर्ट.

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00:02जबलपुर का बेडागाड प्राकर्तिक द्रस्टी से बेहत खुबजूरत है यहां की सफेद संगमर्मरी चट्टा ने दुनिया भर के परेटकों को
00:12अपनी ओर आकरशित करती हैं लेकिन यह इस्तान केबल प्रकर्तिके द्रस्टी से ही महत्पूर्ण नहीं है बलकि यह भारत
00:22की एक बेहत समरद साली परंपरा का स्थान भी है ऐसा माना जाता है कि आज से लगबग
00:30एक हजार साल पहले साथवी सताब्दी से लेकर तेरवी सताब्दी तक कल्चुरी राजाओं ने इस पूरे इलाके में अपनी राजधानी
00:40बनाई थी जो उस समय भारत का सबसे समरद साली सहर था
00:46इनकी राजधानी तरपूरी थी यहीं से पास से छे किलो मीटर के दाएरे में कई मंदिर हैं इन मंदिरों में
00:56आज भी अजारों साल पुरानी प्रतिमाएं हैं हर मंदिर का अपना एक इतहास है इन में से सबसे प्रशिद्ध मंदिर
01:03गोल की मट जिसे हम 64 योगनी मंदिर के �
01:06नाम से जानते हैं वह बेडा घाट के पास में हैं दूसरा मंदिर लक्ष्मी नारायन मंदिर है यह मंदिर गोल
01:14की मट से लगबग 5 किलो मीटर की दूरी पर है यहां पर भी 5 अलग-अलग मंदिरों की एक
01:22सरंखला है इन में मुख्य मंदिर में मता लक्ष्मी के साथ भगवा
01:36अलग-अलग भगवानों की मूर्तियां हैं हर कौने पर एक विशेश भगवान पर राजित हैं मंदिर की मुख्य प्रतिमा काले
01:44कलर के पत्तर से बनी हैं जबकि सूर्य देओ की प्रतिमा सफेद संगमनवर से बनी हैं इनकी बनावट देखकर लगता
01:51है कि इन्हें अलग-अ
01:53समयकाल परिस्तिती में बनाया गया होगा लेकिन यह मंदिर मूल रूप से लक्षमी नारायन मंदिर कहलाता है और यहां पर
02:02खासतोर पर दीपाबली के आसपास बिसेश पूजा नर्शन किया जाता है
02:08प्याचीन मंदिर है हजार ग्यारा सवर्ष अंदाजा लगाते हैं और हो सकता है ज्यादा भी हो ओई लक्षमी नारायन मंदिर
02:21के नाम से जाहिर है विश्णू पंचाइतन पंच दियुता विराजमान है
02:28शिद्धी बिनायक दाहिनवलती गडिश साथ घोड़ों के रत पर सुर नारायन और महिश्या शुर मदनी दुरगाजी मान अरवदा मक्रवाहिनी गोरी
02:47शंकर भगवान विराजमान है
02:49और गड़ुर के उपर नारायन लच्छमी नारायन विराजमान है लच्छमी जी के शाथ तो ऐशे विश्णू पंचाइतन के नाम से
03:00पैसिद्ध
03:04और यहां लच्छन होती है यहां भगवान का शिंगार होता है और भी इस्टोत्र उगेरा उनके विशिस पूजन होती है
03:16तो रात में
03:18पूरी रात पूज़ पाट चलता है हाँ हवन हवन अगेरा होता रात्री में लच्छमी जी का उसी दोर के मंदिर
03:28है और सब एक ही शमय के मंदिर है अपनी यहां जैसे भेडा घाट पचमठा मंदिर चर्शत योगमी पश्पतिना लच्छमी
03:41नारायन और लभेटा घाट में
03:43राधा कृष्ण मंदिर हैं ऐसे बहुत मंदिर हैं कि जो लुप्त भी होते जा गए गोपालपूर में एक राधा कृष्ण
03:52मंदिर हैं तो वह तो पुरा तत्त में मूलती चली गए हैं पर उसमें चहिए कि वह मूलती तीए इक
04:01प्रशिन स्थान है आपको जैसे ग्याति हैं
04:04कि लगवक 1100 वर्श प्रशिन है और राजा बली नहीं यहां पर यग्यपी किया है तो अभी कुछ विगत पांच
04:11बरसों से यहां निरंतर धंतिरस के समय में बिल उब्रक्ष की नीचे लक्ष्मिनान यग्य करते हैं अनुष्ठान यह प्रशिन है
04:19और बिल उब्रक्ष का व
04:34सब्सक्राइब का हवन होता है और वहीं बित्रण भी किया जाता है प्रशासरों जबलपुर में नर्मदा के किनारे मंदिरों का
04:41एक पैटर्न नजर आता है यह जादतर मंदिर 1000 साल से पुराने हैं ऐसा बताया जाता है कि यह कल्चुरी
04:47कालीन है मैं जिस मंदिर के सामने ख�
05:01कौर कल्चुरी कालीन मंदिर मिलता है जिसे हम 64 योगनी मंदिर के नाम से जानते हैं इस तरह के मंदरों
05:07का एक पूरा पैटर्न यहां मिलता है उसी जमाने की मूर्टियां भी यहां पर इस्तापे थे लेकिन इस जगह का
05:13सही सही इतिहास किसी के बारे में किसी के पास नहीं ह
05:18कुछे इन चीजों को बताते हैं इन मंदरों के बारे में इनका इतिहास किया था यहां कौन सी संस्कृति रहती
05:23थी कौन लोग थे जिन लोगों ने इन मंदरों को बनाया था उसके बारे में सोध होना चाहिए विशुजीत सिंग
05:30एकी बिभारत जवल्पर

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