00:08पशिमंगाल के बांगुडा में 64 साल के मारिक कर्मकार अपनी इसी कला से पथर को ऐसी शक्ल देते हैं कि
00:17उससे शंक जैसी मधुर्ध्वनी निकलती है
00:21महज 12 साल की उम्र में पिता से सीखा ये हुनर आज उनकी पहचान बन चुका है
00:30मुझे इस पत्थर तरासने की परंपरा से पहली बार मेरे पिता ने बच्पन में ही परिचित कराया था
00:35तब से यह मेरा जुनून और पेशा दोनों बन गया
00:38जब मुझे 1993 में राष्टपती पुरुषकार मिला तो मैं खुस तो था पर एक दुख मुझे घेरे हुए था
01:00पत्थर पर जरासी गलत चोट पूरी मेहनत पर पानी फेर सकती है
01:05डिजाइन की बारी कियों से लेकर पत्थर की बनावट तक हर कदम पर अनुभव और धैरे की जरूरत होती है
01:14यही वज़ा है कि उनके बनाए शंख सिर्फ कलाकृती नहीं बलकि दश्योकों के अभ्यास और हुनर का नतीजा है
01:23उनके एक शंख की कीमत करीब 7000 रुपे तक बताई गई है
01:29माडिक के लिए पत्थर तराशना सिफिक पेशा नहीं बलकि पिता के विरासत को आगे बढ़ाने का जरिया है
01:37उनकी मा पराली कर्मकार बताती है कि बच्चपन से ही माडिक की इस कला में गहरी दिलचस्पी थी
01:47चोटी उम्र से ही अपनी पढ़ाई के साथ साथ मेरे बेटे ने पत्थर की कारिगरी में कहरी रुची दिखाई
01:53बाद में उसने इस कला को अपना पेशा चुना
01:56पत्थर की कारिगरी पीडियों से हमारे परिवार की परंपरा रही है
02:00मुझे उस पर बेहत कर्व है
02:04मारिक के बनाए पत्थर के शंखों की मांग देश के अलग-अलग हिस्सों के अलावा विदेशों में भी है
02:10मारिक दूसरे लोगों को भी पत्थर तराशने का होनर सिखा रहे हैं
02:16उनसे प्रसिक्षन लेने वाले कई लोग इस कला को आजीविका के रूप में अपना चुके हैं
02:22पिता से बेटे तक पहुची ये परंपरा अब नए कारीगरों के हाथों में भी आगे बढ़ रही है
02:29हाला कि ऐसे कारीगरों के सामने अपने उत्पादों के लिए बाजार तलाशना और मेहनत के मुताबिक कीमत हासल करना चुनौती
02:38बना रहता है
02:38ऐसे में मारिक का प्रसिक्षन देना इस पारंपरिक कला को जिन्दा रखने की दिशा में एहम कदम है
02:46पशिम मंगाल के बांकुडा से ETV भारत के लिए सरमिष्ठा बेनरजी की रिपोर्ट