00:00लोग आते हैं कहते हैं दिल अजीव अजीव सा डूबने लग जाता है यासा ही खर्च करने की बात आती
00:04है
00:04बोले क्यों अभी भी याद है पिटा जी साइकल पर चलते थे
00:08एक एक दो दो रुपया हम मांगा करते हैं बच्चे थे स्कूल जा रहे हैं
00:13जेब खर्च के लिए एक एक दो दो रुपया ऐसा लेते थे चानीस सान पहले
00:17अब आज अचानक कुछ कुछ चीज सामने आ जाते है जिस पे बीस जार पचास जार एक लाग खर्च करना
00:21है
00:21मैं खर्च कर सकता हूँ आराम से लेकिन दिन डूबने लग जाता है बिलकुल
00:25तो खर्च नहीं करता हिंदुस्तानी और उसको पता भी नहीं चलता कि वो जहां बचा रहा है वो कर कर
00:31अपना लुकसान
00:31और कर्म का यदे उद्देश एक है चेतना का उठ्थान तो उस कर्म से तुमने जो पैसे कमाए वो तुमने
00:39अपनी चेतना के उपर क्यों नहीं लगाए
00:42नहीं वो हमें क्योंकि वो इंटेंजिबल है ना अपरकट है बहुत एक नहीं पता नहीं चलता एक शर्ट खरीद लो
00:49तो अच्छा लगता अब हजार रुपए में कोई ऐसी चीज आए जिससे मन साफ हो तो छूने को तो छूत
00:53हो सकते नहीं प्रमान क्या रहे कि मन साफ हु�
00:56तो जैसा वो सजण मुझसे बोल रहे थे अचारजी दिल ऩूप जाता ए है
01:00खरच कैसे करदे है तो पर खरच तब नहीं किया जाता
01:04लाख दो لाख रुपए में बहुत अच्छी लाइब्रेरी बन जाती है किसी घरा में नहीं होती
01:09किताबें, किताबों पर दो लाग कैसे खर्च कर दें
01:12कैसे खर्च करते