उनीसवीं सदी में वैज्ञानिकों ने एक बहुत ही अनोखा प्रयोग किया था। उन्होंने गर्म दूध में सिरका यानी एसिटिक एसिड मिलाकर देखा। इस आसान सी रासायनिक प्रक्रिया से दूध में मौजूद कैसीन प्रोटीन अलग होकर जम गया। छानने के बाद जो सख्त पदार्थ बचा उसे कैसीन प्लास्टिक कहा गया।
यह कोई साधारण खोज नहीं थी क्योंकि उस समय आज का सिंथेटिक प्लास्टिक मौजूद नहीं था। बीसवीं सदी की शुरुआत में इस दूध वाले प्लास्टिक का इस्तेमाल महारानी विक्टोरिया के गहने बटन और कंघी बनाने में खूब किया गया। यह पूरी तरह से प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल था।
समय के साथ नए और सस्ते प्लास्टिक आ गए जिससे कैसीन प्लास्टिक का उपयोग कम हो गया। लेकिन आज भी यह प्रयोग विज्ञान की प्रयोगशालाओं में बहुत प्रसिद्ध है। आप भी इसे घर पर सिरका और दूध की मदद से आसानी से करके देख सकते हैं।
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