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  • 3 days ago

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Transcript
00:17FAYING
00:35He was a king and then he saw the dream that he didn't see it, which he didn't see it.
00:45It was a dream that he reached the dream.
00:53Open the door of the sky, leave my power.
01:11But his great attitude here didn't stop.
01:14He wanted to leave such a name, which the whole world could not forget.
01:18He wanted to make his own power, and his name was NIMROD.
01:33He wanted to make his own power, and his name was NIMROD.
01:53He wanted to make his own power, and his name was NIMROD.
02:00He wanted to make his own power, and his name was NIMROD.
02:22He wanted to make his own power, and his name was NIMROD.
02:59He wanted to make his own power, and his name was NIMROD.
03:05He wanted to make his own power.
03:58KUSH!
04:23NIMROD!
04:24KUSH!
04:24KUSH!
04:26KUSH!
04:29KUSH!
04:54KUSH!
04:55KUSH!
04:56KUSH!
04:56KUSH!
05:02KUSH!
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06:05KUSH!
06:07KUSH!
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06:12KUSH!
06:12KUSH!
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06:14KUSH!
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06:15KUSH!
06:16KUSH!
06:16KUSH!
06:16KUSH!
06:18KUSH!
06:21KUSH!
06:37foreign
07:35it Nothing is supposed to be a matter of
07:37We just lived on our own territory.
07:40We lived in a large thing as such.
07:45In this case, there was a small one who came.
07:48On this case, it was a small one.
07:49By the end, he could see that the whole family was living on South Africa.
07:54These people could never live.
07:56I've never been to live.
07:56With that, his family had killed me.
07:58Kug of such a-just a-just a-just a-just a-just a-just a-just a-just a
08:01-just a-justay
08:32ुश्यूं
08:34वह एक दूर दर्शी भी था
08:38अकेले कबीले चाहे कितने भी बहादुर हों
08:40कभी सुरक्षित नहीं होते
08:43लोगों को सुरक्षा नहीं एक पहचान चाहिए
08:46बाण्ड के बाद की दुनिया अभी भी अस्थिर थी
08:48अभी भी डरी हुई थी
08:50लोगों को एक ऐसे नेत्रित्व की जरूरत थी
08:53जो उन्हें केवल सुरक्षा ही नहीं
08:55बलकि एक पहचान भी दे सके
08:57और इसी सोच के साथ निमरोद ने अपनी यात्रा शुरू की
09:00उस भूमी की तलाश में
09:02जहां वह अपने स्वपनों की नीव रख सके
09:05उसकी यह खोज उसे एक ऐसी घाटी तक ले आई
09:08जिसकी सुन्दर्ता ने उसकी सांसें रोग दी
09:12दो विशाल नदियां जैसे दो जीवन रे खाएं
09:15उस भूमी को घेरे हुए बहती थी
09:17मिट्टी इतनी उपजाओ थी कि बीज गिरते ही अंकुरित हो जाते
09:21यह भूमी किसी वर्दान से कम नहीं लगती थी
09:24उस भूमी का नाम था शिनार
09:28निम्रोद वहीं रुख गया
09:29उसने अपने साथ चल रहे लोगों की ओर देखा और कहा
09:36यहीं इस मिट्टी पर हम वो लिखेंगे
09:41जो अब तक किसी ने नहीं लिखा
09:44और वहीं जन्म लिया उसका पहला महान नगर बाबेल
09:48मिट्टी की इंटे ढली, दीवारें उठी, गलियां बनी
09:51और देखते ही देखते एक बंजर भूमी, एक जीवन्त नगर में बदल गई
09:56पर निम्रोद यहीं नहीं रुका
09:58उसकी महत्वा कांग्शा ने उसे आगे बढ़ने पर मजबूर किया
10:01बाबेल के बाद आया इरेक, एक और नगर, एक और स्वपन का साकातू
10:06फिर अकाद, जिसकी दीवारें और भी उची थी
10:09फिर काल ने, जो व्यापार का केंदर बन कर उभरा
10:12हर नए नगर के साथ निमरोद का नाम और विशाल होता गया
10:16जो लोग कभी बिखरे हुए कबीलों में जीते थे
10:18वे अब स्वयम को एक बड़े परिवार का हिस्सा मानने लगे
10:22निमरोद के सामराज्य का हिस्सा
10:24इतिहास में शायद ये पहली बार था
10:26जब कोई एक मनुष्य केवल अपनी ताखत और दृष्टी के बल पर
10:30इतने विशाल भूभाग का स्वामी बना
10:32निमरोद धर्ती का पहला समराट
10:34पहला ऐसा नेता जिसने भय से नहीं
10:37बलकि दृष्टी और इच्छा शक्ती से एक सामराज्य खड़ा किया
10:42मैं हूँ इस धर्ती का पहला समराट
10:56महराज उत्तर की सीमा पर विद्रोह की अफवाह है
10:58अफवाह को सेना भेज कर शांत करो
11:00मेरी आग्यां वहां तक पहुँचनी चाहिए
11:02इससे पहले की विद्रोह पहुँचे
11:04जैसी आग्या महराज
11:06महराज, कालने की नई मीनार की योजना तयार है
11:09आदेश का पालन हो
11:11हर नई इट इस सामराज्य की याद बन कर रहनी चाहिए
11:14जैसी आपकी आग्या
11:15एक समय था जब मेरी दुनिया सिर्फ एक जंगल थी
11:19और मेरा हथियार सिर्फ एक धनुश
11:21आज हजारों सांसे मेरे एक शब्द पर टिकी है
11:25उसके दर्बार में अब सलाहकार थे
11:27सेनापती थे, वास्तुकार थे
11:29उसकी आग्या एक सीमा से दूसरी सीमा तक गूंचती थी
11:33जो कभी एक अकेला शिकारी था
11:35अब हजारों का भाग्य विधाता बन चुका था
11:38पर सत्ता की एक अजीब प्रकृती होती है
11:40वह जितनी भी विशाल हो जाए
11:42कभी त्रिप्त नहीं होती
11:44जिस व्यक्ती ने सीहों को हराया था
11:46जिसने सामराज्य रचे थे
11:48जिसके पीछे अब हजारों चलते थे
11:50उसकी द्रिष्टी अब एक नई दिशा में उठने लगी थी
11:53उपर आकाश की ओर
11:54रात के सन्नाटे में जब पूरा नगर सो जाता
11:58निम्रोद अकसर अपने महल की छट पर
12:00अकेला खड़ा रहता
12:01तारों को निहारता हुआ
12:03और उन शांत क्षणों में
12:04एक पुराना भय जो उसने बचपन से सुनी
12:07कहानियों में गहरे कहीं दबा रखा था
12:09फिर से जागने लगता
12:10वह भय था जल प्रलय का भय
12:13पानी आ रहा है
12:16नूह हमें अंदर ले लो
12:17मेरे बच्चे को बचाओ
12:19दर्वाजा खोलो
12:20हमें बचाओ
12:23क्या ये सब
12:34क्या होगा
12:35क्या मेरा नाम
12:36मेरा सामराज्य
12:38मेरी संताने
12:39क्या सब कुछ फिर से मिठ जाएगा
12:46ऐसा कभी नहीं होने दूँगा
12:48मैं सब कुछ बदल दूँगा
12:50क्या हो
12:50अगर हम इतने उचे उठ जाएं
12:53कि कोई बाड हमें छूँ न सके
12:55क्या हो
13:25if the
13:29हम ऐसी मीनार बनाएंगे जो धर्ती से इतनी उची उठे कि उसकी चोटी आकाश के निकट पहुँच जाए
13:41महराज, महराज, इतनी उची मीनार, क्या ये संभव भी है?
13:49संभव? मनुष्य ने जितना संभव समझा है, उसकी सीमा वहीं तक है, मैं सीमा बदलना चाहता हूँ
13:58क्या ये उचित होगा? उचित? जब किसी मनुष्य के पास सामर्थे हो, तो क्या उसे अब सीमा से डर कर
14:04पीछे हट जाना चाहिए?
14:05मेरा उद्देश्य केवल सावधान करना है, महराज. मैंने जल को सब कुछ निगलते देखा है. मैंने सुना है कि कैसे
14:15एक पूरा संसार पानी के नीचे खो गया.
14:20अब मैं ऐसा स्थान बनाऊंगा, जहां विनाश की कोई लहर आसानी से ना पहुँच सके.
14:29क्या ये कठिन है? तो इसे कठिन ही रहने दो, लेकिन असंभव मत कहो. जैसी आपकी आग्या महराज.
14:39और इस तरह एक व्यक्ति के भीतर के भय से जन्मा एक विचार, धीरे-धीरे एक सामराज्य की सामुहिक महत्वा
14:46कांग्शा बनने लगा.
14:47जो अभी तक केवल एक सपना था, वह जल्द ही एक सभा में घोशित होने वाला था. एक ऐसी सभा
14:53में जो इतिहास की दिशा को हमेशा के लिए मोड़ देने वाली थी.
14:57चिनार की घाटी में उस भोर कुछ असाधारन होने वाला था. सूरज अभी क्षितिच पर पूरी तरह उगा भी नहीं
15:04था. और हजारों लोग पहले ही नगर के मुख्य चौक में जुट चुके थे. यह कोई साधारन सभा नहीं थी.
15:10हर किसी को पता था. आज कुछ ऐसा घो�
15:13होने वाला है जो पहले कभी नहीं हुआ. हमने बाढ़ की कहानिया सुनी हैं. हमने सुना है कि कैसे धर्ती
15:21डूब गई थी. कैसे परिवार बिखर गए थे. कैसे सब कुछ मिट गया था. हमारे पूरवज उस विनाश से बचे
15:29हैं. पर उन्होंने वो पीड़ा अपनी संतानों
15:32तक पहुंचाई. एक ऐसा भै जो पीड़ी दर पीड़ी चलता आया है. पर आज मैं कहता हूँ बहुत हुआ भै
15:42बहुत हुआ बिखरना निम्रो निम्रो निम्रो निम्रो आज हम एक हैं और मैं चाहता हूँ
15:58कि हम हमेशा के लिए एक रहें न केवल इस पीड़ी में बस हर आने वाली पीड़ी में. हम एक
16:06नगर बनाएंगे जो इतिहास में कभी
16:18न भुलाया जाए और उस नगर के हिर्दय में हम एक मीनार बनाएंगे. एक मीनार जो आकाश को छुएगी? क्या
16:31ये संभव है?
16:32इतनी उची कि उसकी चाया पूरी धर्ती पर पड़े. इतनी उची कि उसकी चोटी बादलों को चीर कर आकाश में
16:42प्रवेश करे.
16:44हमने कभी ऐसा कुछ नहीं बनाया. ये तो इतिहास रचने जैसा होगा. ये मीनार हमारा प्रमान होगी कि हम अब
16:52उस भय के बंधक नहीं है.
16:58आकाश को छुने की बात हमारे पूर्वजों ने ऐसा साहस कभी नहीं किया था.
17:14उस दिन के बाद शिनार की घाटी में एक नई उर्जा फैल गई. हर व्यक्ति चाहे वह किसान हो या
17:21योध्धा इस महान कारे में अपना योगदान देना चाहता था.
17:24जल्दी करो, और गहरा खोदो. यहां की मिट्टी बहुत कमजोर है. तो इसे और मजबूत बनाओ. काम रुकना नहीं चाहिए.
17:31जल्दी, रस्ती इदर लाओ. समय कम है, काम तेज करो.
17:45जल्दी करो, मिट्टी ज्यादा चाहिए. यहां की मिट्टी बहुत गीली है. जोर से दबाओ. देखो, कितनी सारी इटे तयार हो
17:53गई. काम तेज रखो.
18:06खीचो, खीचो, खीचो, खीचो, जल्दी करो, रस्ती खीचो, खीचो, सोर लगाओ. रुको मत, और खीचो. पत्थर उपर जाना चाहिए. रुकना
18:24मना है. और जोर लगाओ. पत्थर उपर चाहिए. रुको मत, काम पर लगे रहो.
18:33HITCHO!
18:49HITCHO!
18:51HUM KAHAN SE CHALES THESE
18:53OR AGE KAHAN KHARDA HAY
18:55HUM NENEM MITTI KKO EAT BANAYA
18:57EAT COO DIVAR BANAYA
19:00और दीवारों को आकाश की ओर उठा दिया
19:06लेकिन हमें यहीं नहीं रुखना है
19:08हमें आगे बढ़ना है
19:12आस्मान की सरगोशी की उचाईयों तक
19:23निम्रोद!
19:29जोर लगाओ, पत्थर उपर जाना चाहिए
19:33खीचो, जोर लगाओ, रुको मत, एक साथ खीचो
19:39पत्थर तैयार है, सब लोग अपनी जगा पकड़ो
19:42एक साथ, जोर लगाओ, सब लोग ताल मिला कर खीचो
19:48चलो, उपर तक ले जाना है, हिम्मत मत हारो
19:52बस थोड़ा और पत्थर उपर पहुँचाओ, काम रुकना नहीं चाहिए
19:56काम नहीं रुकेगा
19:58धर्ती पर मनुष्य एक होकर अपनी शक्ती और सामर्थे पर गर्व कर रहा था
20:03पत्थर पर पत्थर रखे जा रहे थे, और एक विशाल नगर के बीच
20:07वह उँचा गढ़ आकाश की और बढ़ता जा रहा था
20:10मनुष्य की आँखों में अपनी सफलता का घमन था
20:12उन्हें लगने लगा था कि यदि वे एक साथ रहें
20:15तो कोई भी उँचाई उनके लिए समधव नहीं
20:18और परमेश्वर ये सब देख रहा था
20:29उन्होंने मिट्टी से इट बनाई अपनी शक्ती से उँचाई खड़ी की
20:34पर उनकी आँखें अब अपनी सीमा भूलकर आकाश की ओर उठ रही है
20:43ये केवल एक मीनार नहीं
20:48ये उनके घमंड की उँचाई है
20:53खुल जाओ आकाश के द्वार छुख जाओ मेरी शक्ती के आगे
21:02उनका घमंड उन्हें एक कर रहा है
21:05इसलिए मैं उनकी भाशाओं में भेद डालूगा
21:12खीचो खीचो
21:15सब लोग काम जारी रखो
21:18जी मुख्या
21:19बाबेल और उचा उठेगा
21:21वे एक दूसरे की बात समझ नहीं पाएंगे
21:27और उनकी एकता बिखर जाएगी
21:42अब ऐसा नहीं होगा
21:44इट कहा है
21:47क्या कह रहे हो मुझे समझ नहीं आ रहा
21:49गारा लाओ
21:50गारा तुम किस भाशा में बोल रहे हो
21:53इट इट चाहिए
21:55रसी पकड़ो
21:56मिनार गिर जाएगी
21:58मिनार गिर जाएगी
21:59रसी सब लोग रुक जाओ
22:01हमारे साथ क्या हो रहा है
22:03काम मत रोको
22:05इटे उठाओ
22:07ये मिनार आज पहले से भी उची उठनी चाहिए
22:13सब लोग रुक जाओ
22:14कोई किसी की बात नहीं समझ रहा
22:17हमारे साथ क्या हो रहा है
22:21You guys don't understand my words. Why don't you keep working?
22:24You're going to keep working.
22:26What is happening?
22:28Why don't you understand my language?
22:33Go here!
22:34Here's nothing wrong.
22:35No work!
22:37We have to keep working.
22:41Our power, our power,
22:44How did we get to each other?
22:45There is some language related we have.
22:51I said,
22:51What does Chopper vest mean?
22:52What does Chopper vest mean?
22:53What does Emil Abuse mean?
22:56This is the STOPP made.
22:58A Tommy, the tribe.
22:59What should the 루� about Chopper vest mean?
23:01What doesisma mean?
23:02The precise and supplier mean another one's religion,
23:04What we're doing is making a sense.
23:04The translation of the reader is gives you every moment.
23:08What is his message behind us,
23:10और उसका अभिमान उसी मीनार के सामने तूट कर रह गया।
23:13परमेश्वर ने दिखा दिया कि मनुष्य अपनी सामर्थ से चाहे कितनी भी उचाई क्यों न बना ले वो अपनी सीमा
23:19से आगे नहीं जा सकता।
23:21बाबिल की कहानी हमें सिखाती है, एकता शक्ती है, लेकिन जब उसमें घमंड जन्म लेता है, तो परमेश्वर मनुष्य को
23:28उसकी सीमा याद दिलाता है।
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