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  • 2 days ago
दिल्ली के सदियों पुराने और ऐतिहासिक 'हुमायूं के मकबरे' की सुंदरता पर वायु प्रदूषण का गहरा दाग लग रहा है. हाल ही में आईआईटी रुड़की और आईआईटी कानपुर द्वारा की गई एक संयुक्त स्टडी में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. रिसर्चर्स ने पाया है कि मकबरे के बलुआ पत्थर पर जम रही काली परत मुख्य रूप से 'जिप्सम' है, जो प्रदूषित हवा में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), धूल और नमी के रिएक्शन से बन रही है.इस खुलासे के बाद पर्यावरणविदों ने गहरी चिंता जताते हुए सवाल उठाया है कि जब खतरनाक प्रदूषण से सदियों पुरानी मजबूत इमारतें सुरक्षित नहीं हैं, तो इंसानों और बच्चों के फेफड़ों का क्या हाल हो रहा होगा?

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Transcript
00:01दिल्ली के सदियों पुराने हुमायू के मकबरे पर वायू प्रदूशन का असर पड़ रहा है ये बात उस अध्यन में
00:08साब में आई जो आयाईटी रुडकी और आयाईटी कानपुर ने मिलकर किया है
00:12रिसर्चरों ने इसकी बलुवा पत्थर की सतह से काली परत के सैंपल की जाँच की और पाया की वो वुख्या
00:18रूप से जिपसम की है जो प्रदूशत हवा में मौजूद सल्फर डायॉकसाइड, कैल्शियम से भरपूर धूल और नमी के साथ
00:25प्रतिक्रिया करने पर बंदी है
00:29जाहिर है नतीजों ने ना सिर्फ हमारी धरोहरों पर बलकि लोगों पर भी वायू प्रदूशन के असर को लेकर एक
00:35बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है
01:16जानकारों का मानना है कि दिल्ली में नमी और बदलते मौसम की वजह से ऐसे नुकसान से बचना लगातार बनी
01:22रहने वाली चुनाती है
01:23उनका ये भी कहना है कि इस मकबरे को बचाने के लिए जो कोशिशे चल रही है वो काफी हद
01:29तक कारगर भी साबित हुई है
02:06फिलाल हुमाईयों के मकबरे का अधियन हमें आघा करता है कि शहर की विरासत को बचाए रखने के लिए प्रदूशन
02:13कम करने के उपाय करना वक्त की दरकार है
02:16झाल झाल झाल झाल झाल
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