00:00रांवन ने विए अपने अंदर की बात शुनी थी
00:02राम ने उसकी बहन की नाका टी
00:04उसके अंदर तड़ पुटी कि मेरी बहन की बहन画 मान भूआ है
00:07गलती राम और लिख्षवन की ओर से सुरूई थी
00:09ने शुपनका की नाका काटी
00:11उसका जो बदला लिया
00:13अपनी बहन की अपमान का बदला रावण को लेना था ये धर्म कहता है लेकिन बात में अपके मानने से
00:22थोड़ी धर्म हो जाएगा तो फिर किसके मानने से अगर हमारे मानने से धर्म नहीं है तो आपके मानने से
00:28मैं आपकी क्यों मानने से मैं आपकी क्यों मानने किसी सुनिए �
00:48अपनी मानने का होता है ना दूसरे की मानने का होता है अरे तो रुखेंगे तो बोलूँगा एक तीसरा विकल्प
00:54होता है जो आपके जहन में आई नहीं रहा है
00:56धर्म होता है उसको जानना जो अपनी बात मानने को या दूसरे की बात मानने को या तो बड़ा उत्सुक
01:04है या बड़ा विरोध में है उसको जानने को धर्म कहते हैं
01:08अपनी बात मान लेना भी धर्म नहीं है, और दूसरे की बात भी मान लेना धर्म नहीं है, किसी भी
01:15बात को मान लेना धर्म नहीं है, भीतर जो तैयार बैठा है, या तो कुछ मानने को, या कुछ ठुकराने
01:23को, उसको जानना, उसके समक्ष खड़े हो जाना, उसका साक्षाकार
01:29कर लेना ये धर्म है
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