00:00यह बिल्कुल मत कहना कि, चाहते तो हम कुछ और हैं, पर मजबूर हैं, इसलिए कर कुछ और रहे हैं।
00:10जो तुम कर रहे हो, वही तुम चाहते हो, वही चुनाव है तुम्हारा एक बात, खुद को धोखा मत दो।
00:17और इस तरक का इस्तिमाल हम सब करते हैं, लगातार, बखु भी करते हैं, करते हैं कि नहीं? कि अंदर
00:23ये अंदर से तो जाने मन आशेख हम तुम्हारे थे, बाहर बाहर फेरे कहीं और ले आए, सब की जिंदगी
00:31का आलम बिलकुल यही है, ये अंदर बाहर का भेद बताओ, ये
00:46कुछ और चाहते होते तो कुछ और कर रहे होते हैं