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Transcript
00:00सूरे से प्रेम प्रसंग था कुंती का
00:02कुंती विवाहिता तो है नहीं
00:03करण पैदा हो गए
00:04और प्रेम की लाज नहीं रखी कुंती ने क्या करा
00:07बच्चा ही बहा दिया
00:08समाज और समाज से मिलने वाली इज़त
00:12बड़ी चीज हो गई प्रेम से
00:14ले लगो गई अब महाभारत
00:15वो तुम्हारे प्रेम का फूल था
00:18और तुम उसको बहाँ आई
00:19और अब जीवन भर अपनी आखों के आगे
00:21तुम उसकी दुर्दशा होती देखती रही
00:23लेकिन सामाज एक इज़त
00:25मैं तो रानी हूँ
00:26मैं तो राष्ट्रमाता हूँ
00:28मैं कैसे बता दूँ
00:29कि लोकधर्म की सीमाओं से आगे जाकर
00:32प्यार किया था मैंने कभी
00:33कैसे बता दूँ
00:34भले ही जिससे मैंने प्यार किया
00:36वो सूरे जैसा तेजस्वी हो
00:37मैं कैसे बता दूँ
00:38और पूरी महाभारत कहती है कि कर्ण को हराना बड़ा मुश्किल था क्योंकि सूरे का पताप था उनमे और अंत
00:46में भी वो इसलिए हारे क्योंकि सूरे ने उनको जो दे रखा था वो आ करके अरजुन के जो पिता
00:51जी थे इंद्र वो उनसे छल से मांग कर ले गए एक उचा प्
01:08कि बिना शादी के तुमने प्रेम कैसे कर लिया और यह बालक कहां से आ गया तो मेरी मेरा सम्मान
01:15दुनिया की नजरों में कम नहीं होना चाहिए लो बचा लो अपनी इज़त कुंती को प्रेम समझ में ही नहीं
01:20आया जीवन भर
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