00:00मूर्तियों का सिंबोलिजम क्या हमें समझाना जाते हैं?
00:03मूर्ति को जो कुछ भी सगोण है उसके समकक्ष मागा
00:10मूर्तियां सब वेवार एक तल पर होती है क्योंकि उनके साथ रूप, रंग, नाम, अकार, कथाएं होती है
00:15उनका काम है आपको, आपकी कलपना, आपकी अपनी जो अभिरंजना है, उसकी बिलकुल सीमा तक ले जाना
00:26तो कई धार्मिक धाराएं हैं जिनमें मूर्ति पूजन नहीं होता, पर शब्द तो वहां भी है ना
00:33तो वो भी तो सगुण ही हो गया ना
00:36जैसे भगवर्द गीता है, उसमें शब्द है ना
00:38तो शब्द मूर्ति है, क्योंकि मूर्ति भी सगुण है, शब्द भी
00:42हाँ, जो कुछ भी फिजिकल ही नहीं, मेंटल भी हो, वो मूर्ति है
00:45तो एक अर्थ में ये कहा जा सकता है कि धर्म की शुरुआत तो मूर्ति पूजन से ही होगी
00:52क्योंकि आप अगर फिजिकल मूर्ति को नभी पूजो तो भी आप शब्द तो रखोगे ना
00:59वो शब्द ही मूर्ति है, तो आप चाहो तो फिजिकल मूर्ति को पूझ लो, आप चाहो तो शब्द को पूझ
01:05लो, लेकिन मूर्ति से ही शुरुआत होगी, हाँ, मूर्ति पर रुक नहीं जाना होता, मूर्त अमूर्त का द्वार होना चाहिए,
01:12सगुण निर्गुण का द्व
01:16होना चाहिए व्यवहार परमार्थ का द्वार होना चाहिए