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Transcript
00:00एक बार मैंने बोला था, जो तुम्हारे साथ सोने को इतना आतुर है, वो तुम्हे कभी जगने देगा क्या, उसका
00:08तुमसे नाताई सोने का है, और तुम जग गए तो उसका स्वार्थ तूटेगा, तो उसकी तो इच्छा लगातार यही रहेगे
00:17कि तुम सोए पड़े रहो,
00:18कभी देखना है, आप में से, जो लोग जीवन की अन्भवों से गुजर चुके हो, आपकी नीन खुलने भी लगे,
00:25आप कहे आप उठना है, वो तो यही कहेगा कि अभी पड़े रहो, बलकि आप ज्यादा जोर लगाएंगे कि उठना
00:31ही है, तो हो सकता नाराज और हो जाए,
00:33पड़े रहो अभी तो, क्योंकि रिष्टा ही साथ सोने का है, फुली आखों का, चेतना का, जागरती का तो रिष्टा
00:41ही नहीं, आप अगर जगने लगोंगे उसको बुरा लगता है, पड़े रहो, यह सोने के साथियों को जागरती से बड़ी
00:48तकलीफ होने लगती है, जा�
01:02कून करता आपकी जम्द गीस नहीं है जुक 소न करता आप जगने लगे यापकी जागरत इसे जान लिजिएगा उसका स्वार्थ
01:12इन आहन के सोने 22 जितना ज़िए आपको रोके गीटा और उपनिश है उतना
01:23जान लीजे कि शरीर का रिष्टा है बस और मेरे शरीर से ही इसका नाता है शरीर से मुक्ति की
01:28और बढ़ रहा हूं तो इसको तकलीफ हो रही है
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