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Iran US Tension: अमेरिका के खिलाफ ईरान का क्या है सीक्रेट प्लान, इराक के इन लड़ाकों में क्यों छुपा है राज़? जानिए कैसे सिर्फ लेबनान का हिज़्बुल्लाह ही नहीं, बल्कि इराक के गुप्त शिया सशस्त्र समूह मिडिल ईस्ट की पूरी बाजी पलट रहे हैं।
ईरान और अमेरिका के बीच दशकों पुराना तनाव अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुका है। लगातार होती बातचीत और युद्धविराम की कोशिशों के बाद भी दोनों देशों के बीच स्थायी शांति नहीं हो पाई है। इसके पीछे केवल ईरान का परमाणु कार्यक्रम नहीं है, बल्कि मध्य-पूर्व (Middle East) में फैला उसका वो प्रॉक्सी नेटवर्क और व्यापक प्रभाव है, जो अमेरिका और इज़राइल के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।

इस पूरे घटनाक्रम पर भारत की भी पैनी नजर बनी हुई है। खाड़ी देशों (Gulf Countries) में लाखों की संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं और वहां की थोड़ी सी भी अस्थिरता या युद्ध जैसी स्थिति सीधे तौर पर भारत की विदेश नीति को प्रभावित करती है। इसके साथ ही कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आने वाला उछाल सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा और बड़ा असर डालता है। यही वजह है कि इराक के इन गुटों की हर हलचल पर ग्लोबल मार्केट और भारतीय रणनीतिकारों की नजरें टिकी हुई हैं।

About the Story:
The ongoing geopolitical conflict between Iran and the United States hinges on Iran's extensive network of proxy groups across the Middle East. Beyond Hezbollah in Lebanon, powerful Shia militant groups in Iraq act as Iran's shield, challenging US dominance and impacting regional stability, global crude oil prices, and Indian expats.


#IranVsUSA #MiddleEastCrisis #Hezbollah #ProxyWar

~PR.514~HT.408~ED.276~GR.508~VG.HM~

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Transcript
00:00इरान और अमेरिका के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है। कई दौर की बापचीत, कई देशों की मध्यस्तता और
00:06बार-बार युद्ध विराम की कोशिशों के बावजूद दूनों देशों के बीच स्थाई शांती समझोता आज तक नहीं हो सका।
00:13इसकी एक बड़ी वज़े सर्फ इरान का परवाणू कारेकरम नहीं है, बलकि मध्यपुर्व में फैला उसका व्यापक प्रभाव भी है।
00:21जब भी इस्राइल लेबनान में हिजबुल्ला पर हमले तेज करता है, जब भी अमेरिकी से ना इराक या सीरिया में
00:28अपने ठीकानों
00:29को मजबूत करती हैं, तब सवाल उड़ता है कि आखिर इरान इतने बड़े विरोध के बावजूद अपने प्रभाव को कैसे
00:36बनाए रखता है? क्या आपने कभी सोचा है कि छेत्रपल और सैने ताकत के लिहाज से अमेरिका से कहीं छोटा
00:42इरान आखिर किस भरोसे दुनिया
00:57की ढाल सिर्फ हिजबुल्ला है, तो ठहरिए. क्योंकि इसका जवाब सिर्फ लेबनान का हिजबुल्ला नहीं है. इसके पीछे इराग में
01:04मौजूद कई ऐसे शिया सशेस्तर समोह हैं, जो वर्षों से इरान के सबसे भरोसे मंद सहयोगी माने जाते हैं. और
01:11जब भी इरान �
01:12पर हमला होता है, ये सब ही इरान के लिए गुप्त तरीके से लड़ाई लड़ते हैं. इन समोहों को समझना
01:18इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मध्यपुर्व में लाखो भारतिया काम करते हैं. खाडी देशों में रहने वाले भारतियों की सुरक्षा,
01:25वहां की स्थीर्ता और
01:26शेत्र में होने वाला हर बड़ा संघर्ष भारत की अर्थववस्था, तेल की कीमतों और विदेश नीती को प्रभावित करता है.
01:33तो आए जानते हैं कि आखिर कौन है ये इराक के समूव, ये कैसे बने, इन्हें कौन फंड करता है,
01:41इरान के लिए ये इतने महत्वपुर्�
01:46शान्ती और संघर्ष दोनों की दिशात तै करने की उप्षमता रखते हैं. नमस्कार, मेरा नाम है रिचा पराश्वर और आप
01:52देख रहे हैं, वानिट याहिन. इराक में इरान के प्रभाव की सबसे बड़ी ताकत Popular Mobilization Forces यानी की PMF
01:59है. अर्भी में इसे अलहश्द, अलशा�
02:03ये कोई एक संघठन नहीं, बलकि लगभग 50 से 70 अलग-अलग सशस्त्र समूहों का एक छत्र माना जाता है.
02:10इन सभी की विचारधारा, नित्रतों और प्राथमिक्ताएं अलग हो सकती हैं. लेकिन इनमें से कई गुट एरान के बेहत करीब
02:17माने जाते हैं. यही वज़ा है कि
02:20विशिशक ये अकसर कहते हैं कि इराक के भीतर सिर्फ सरकारी सेना ही नहीं, बलकि एक समनांतर सैन्य और राजुनितिक
02:27शक्ती भी मौजूद है. सबसे प्रभाविशाली समूह कौन-कौन हैं? चलिए आपको एक कुरी लिस्ट बताते हैं. इसमें सबसे उपर
02:32है बद्र और्
02:36इरान समर्थक संगठनों में गिना जाता है. 1980 के दशक में जब इरान और इराक के बीच युद्ध चल रहा
02:42था, उसी दोरान इस संगठन की निव पड़ी. वर्षव बाद ये किवल एक सश्यस्त्र संगठन नहीं रहा, बलकि इराक की
02:49राजुनिती और सुरक्षा व्यवस्
02:51की हिस्सा बन चुका है. कताईब हिजबुला, ये दूसरा है. नाम से भ्रमित मत हो येगा. ये लेवनान वाले हिजबुला
02:58से अलग इराकी संगठन है. इसे इरान का सबसे करीबी और सबसे कटर समर्थक सम्मूव माना जाता है. अमेरिका ने
03:06इसे विदेशी आतंकवादी स
03:07संगठन खूशिद किया हुआ है. क्योंकि अमेरिकी सेने ठिकानों पर कई हमलों का आरोप इसी संगठन पर लगाया जाता है.
03:15तीसरा, असाइब अहल अलहक. ये संगठन पहले मुक्तदा अलसद्र के आंदोलन का हिस्सा था, लेकिन बाद में अलग होकर इरान
03:24समर्थक धड
03:29प्रभाव भी रखता है. चोथा है हरकत अलनुजबा. सीरिया के ग्रहिद के तोरान इस संगठन की भूमिका तेजी से बढ़ी.
03:37इसे नकेवल इराक बलकि सीरिया में भी इरान समर्थक अभियानों में हिस्सा लिया. इसके बाद कुछ अन्य प्रभाव शाली संगठन
03:44भी है
03:44इनके अलावा कताइब सैयद, अलशुदा, हरकत अंसार, अलवफिया और कताइब अल इमाम अली जैसे कई संगठन भी इरान समर्थन नेट्वर्क
03:55का हिस्सा माने जाते हैं. तो आखिर ये इरान के लिए करते क्या हैं? सबसे आसान भाशा में समझे तो
04:01ये समू इरान के लि
04:14अक्सी वार्स जो आप अक्सर सुनते हैं, वो यही संगठन है, जो इरान के पीट पीछे खड़े होकर इरान को
04:19बल देते हैं. इनकी भूमी का कई स्तरों पर होती हैं? अमेरिकी सेन ठिकानों और काफिलों पर हमले. सीरिया और
04:25लेवनान तक इरान समर्थक नेट्वर्क को स�
04:28हतियार और रसत पहुचाने वाले जमीनी गलियारों की सुरक्षा. इराक की राजनीती और सरकारी संस्थानों में प्रभाव बनाए रखना. पीमेफ
04:36के आधिकारिक धांचे के जरिये सरकारी संसाधनों तक पहुचना. यही वज़य कि इरान को हर बार अपनी सेना भेजने क
04:44जरूरत नहीं पड़े. इरान इन्हें इतना महत्व क्यों देता है? इरान के सुरक्षा रणिती केवल अपनी सीमाओं तक सिमित नहीं
04:50है. तेहरान मानता है कि अगर खत्रे वो अपनी सीमा से दूर ही रोक दिया जाए तो देश अधिक सुरक्षित
04:56रहेगा. इराक उसके लि
05:14है तो इरान अक्सर कह सकता है कि ये उनका सोतंतर फैसला था. ये रणिती वर्षों से उसकी छेत्रिय नीती
05:20का महतोपूर्ण हिस्सा रही है. यानि कि साब भी मर जाता है और लाठी भी नहीं तूटती है जो अपना
05:24भारत की जो कहावत है वो वहाँ पर बहत फिट बैटती ह
05:27चुलिए अब ये भी जाते हैं ये समूँ आखिर बने कैसे. इनकी कहानी केवल आईएस आईएस से शुरू नहीं होती.
05:321980 और 1990 के दशक में कई इराकी शियानेता इरान में शरल लेकर वहाँ से संगठेत हुए.
05:392003 में अमेरिका ने सद्दाम हुसाइन की सरकार गिराई तो इराक की सुरक्षय वबस्था बिखर गई. यहीं से इरान समर्थन
05:47संगठनों का प्रभाव बढ़ने लगा. लेकिन सबसे बड़ा मोड आया 2014 में. जब आईएस आईएस ने इराक के बड़े हिस्से
05:55पर कबजा कर �
05:56तब इराक के प्रमुख शिया धनगुरू ग्रेंड अयातुल्ला अली अल सिस्तानी ने लोगों से हथियार उठाने की अपील कर दी.
06:04इसी अपील के बाद PMF का गचन हुआ. आयस आईस के खिलाफ लड़ाई ने इन समुहों को बैद्यता, संसाधन और
06:11लोगप्रियता सब क�
06:13इराक लंबे समय तक राजुनितिक और संप्रदाइक हिस्से से जूचता रहा. जहां सरकार कमजोर होती गई वहीं इन समुहों का
06:22प्रभाव बढ़ता गया. विशिशग्यों के अनुसार इरान ने इन्हें प्रशुक्षन, हतियार, रणितिक सलाह और वैचारिक समर्थन द
06:32इन्होंने वियापारिक ठेके, सीमा, चौकियों, सीमा शुल्क, स्थानिय प्रिशासन और राजुनितिक दलो तक अपना प्रभाव बढ़ा लिया. यानि अब ये
06:40सिर्फ बंदूक नहीं चराते, बलकि राजुनीती और अर्थववस्था में भी महत्तोपूर्ण भूमी का
06:45निभाते हैं. तो एक सवाल लाजुमी है कि इनके पास इतना पैसा आता कहां से है, इन्हें पैसा कहां से
06:50मिलता है. इनकी फंडिंग कई सोर्स से जुड़ी मानी जाती है. विशलेशकों के अनुसार इनमें शामिल है इराग सरकार के
06:56बजट से PMF को मिलने वाला वेतन और संस
06:59इरान की ओर से मिलने वाला प्रशिक्षन और अस्यान ने सहयता जो की मोटा खर्च हो गया जो इरान खुद
07:04उठा लेता है. ठाने आर्थिक गते विदिया, व्यपारिक नेट्वर्क, सीमा शेत्रों से होने वाली आए. हालाकि अलग-अलग समुहों की
07:10आर्थिक व्यवस्थ
07:29विशेश रूप से नामी तो बैश्विक आतंकवादी संगठन की श्रेणी में रखा गया है. यानि इराक के भीतर इन्हें वैद्य
07:35सुरक्षा ढांचे का हिस्सा माना जा सकता है, जबकि पश्चिमी देशों की नजर में इनमें से कई संगठन इरान के
07:42प्रॉक्सी नेटव
07:58इनकी मौजूदगी ही वो कारण है जिसकी विशे से इरान अपने सीमाओं से बाहर भी प्रभाव बनाए रखता है. लेकिन
08:05यही नेटवर्क छेतर में तनाव बढ़ाने, संगर्ष लंबा खीचने और शांती प्रक्रिया को जटिल बनाने का कारण भी बनता है.
08:12यानि इराक के समूँ सिर्फ थानिय मिलिशिया नहीं है, बलकि मध्यपुर्व की, बदरती भूराजनिती के ऐसे खिलाड़ी है जिनका असर
08:20वशिंग्टन, तहरान, तेल, अवीव, बेरूत और बगदाद से लेकर हर उस छेतर तक पहुँचा हुआ है, जो इसके आस-पास
08:28है और इसके प्रभाव में है, इस ख़बर में इतना ही अपडेट्स के लिए देखते रहें, One India Hindi
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