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Transcript
00:00जैसे मेरी बहन है वो दो दिन चार दिन भी आ जाती है तो उन्हें ऐसा लगता है कि किसी
00:05पराय का समान चो रही है या समान ले रही है
00:08भाईया मैं ये लड़ू खालू?
00:11कुछ भी समान वगर जो उन्हें वैसे भी लेना होता है तो पूछ के लेती है
00:14उसकी बहुत बड़ी बचा है दहेज है वो इतना सारा दहेज पहले चला गया होता है उसके साथ
00:19कि उसको भी पता होता है कि अब जो बचा है वो भाईयों का है उसके मैं हाथ कैसे लगा
00:23हो
00:23वो इतना सारा लेके गई है
00:25कि वापस आती है क्याती है अब थोड़ा बहुत बचा है घर में
00:28बाकी तो घर लुट गया पूरा
00:29अब जो बचा है उसको भी कैसे छूदूं
00:31तो उसको भीतर से अपराद भाव आ जाता है
00:34ये दहेज हो गया रहता क्या मतलब मैं समझी नहीं पारा हूँ
00:37दहेज का मतलब क्या हूँ आज दहेज का क्या आर्थ है
00:39एक समय पर जानते हो दहेज का एक अर्थ होता भी था
00:42तब ये होता था कि ये जो लड़की है
00:44ये कोई factor of production तो है न इकनोमी में
00:48ठीक, यह घर देखती है बस, और उसके बाद संताने जनती है, तो अभी तक हम इसको खिलाते थे, अब
00:55पती के हां जा रही है, पती के हां अचाना के एक सदस से बढ़ जाएगा, एक ऐसा सदस से
01:00बढ़ेगा, जो कमाऊ नहीं है, तो उनका खर्चा बढ़ जाएगा, उनका खर
01:15के भेज रहा हूं कि दो महीने, चार महीने, जब तक ये वहाँ पर ठीक से, इसका संयूजन नहीं हो
01:21जाता, तब तक तुम इसका खर्चा, मैं ले लेता हूं, ये बात तब होती थी, आज क्यों है ये बात,
01:27ये दहेज का क्या आर्थ है, बलकि बहुत अपमान की बात है न, मैं
01:45अपमान की बात है, कि ये तुम शादी कर रहा है और उसके लिए कहो कि मुझे पैसा चाहिए, ये
01:50सब ज्यादा अभी भी उन्हीं घरों में पाया जाता है, जहां माबाब भी एकदम 101 किस्म के हैं, अंधेरे में
01:56जीने वाले, बहुत बड़ी तादाद में अब ऐसे जागु
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