00:00नमस्ते आचारे जी, जैसे कि आज आपने बताया कि जब आपके जेवर में बहुत सारे विश्य होते हैं, तो आप
00:07डरे हुए होते हैं, और मैं डरी हुई भी रहते हूँ, लेकिन जब मैं उनसे बाहर निकलने की कोशिश करती
00:13हूँ, तो मैं और फस्ती जाती हूँ
00:15तुम्हारी ही मानेता है, तुम्ही कुछ बाते हैं जो मानते हो, वो बाते जब पूरी नहीं होती हैं तो दुखी
00:21हो जाते हो, वो बाते जब लगता है कि पूरी हो रही हैं, तो सुखी हो जाते हो, डर हमारा
00:26ये नहीं है, कहीं बंधन में फसना जाओं, हमारा डर ये रहता है क
00:31किसी आदमी को पकड़ लीजे, कोई इस बात के लिए नहीं डरा हुआ है कि कहीं जिन्दगी से सच्चाई न
00:36छिन जाए, लोग डरे हुएं कहीं जिन्दगी से बंधन न छिन जाए, बुनियात अगर मजबूत हो तो इमारत को कितने
00:43सहारों की जरूरत है, सहारों को समझो वि�
00:58जिन्दगी में चाहिए ही चाहिए, उतना समझे लो कि जिन्दगी की बुनियात में ही खोड़ है।
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