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Transcript
00:00ये आचारे सब लड़कियों को बिगाड़ा रहा जिम जा रही है, मसल वसल निकल आईगी, मरदाने हाथ हो जाएंगे, लड़की
00:06तो कोमल और नाजुक ही भाती है, अच्छा, तो पुरुष तो आए तो हम कहते हैं ये जो ढाई किलो
00:11का गूसा है, और उसको बोलते हैं कि ना�
00:27क्यार करती है, क्या गहरा इसका ध्यान है, लगातार तारीफ करी जाती है, उसके शरीर की और उसकी भावुकता की,
00:34शर्मा जाती है, लजा जाती है, डर जाती है, सहम जाती है, यहां बैठ जाईए, ये महलाओं की सीट है,
00:41और कोई महला नहीं बोलती कि आप माया में हमारा �
00:43बच्चों के साथ क्यों नाम लिया रहे?
00:44बच्चा होगा तेरा बाप
00:47वो वजन उठा सकती है, वो बॉक्सिंग लड़ती है
00:50वो पहाड पे चड़ती है, वो जिमनास्टिक्स खेलती है
00:53उसके लिए तुम सीट क्यों बांध रहे हो कि वो सीट पे जा करके बैठे
00:56पर बड़ा अच्छा लगता है, सीट मिल गई
00:57अब सीट अगर मिल गई है, तो फिर टिकट से कहीं ज्यादा बड़ी कीमत भी चुका होगे
01:03इससे अच्छा होता कि यात्रा खड़े-खड़े पूरी कर लेते
01:07यह जो आरक्षित सीट मिलती है न, आप इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकाती है
01:11क्या बोलता है वेदांत? मजबूरी जैसा कोई शब्द नहीं होता
01:15अगर आपके पास बंधन है, तो आपने चुने है अपनी बेहोशी में
01:19मुक्त होना है, तो जो चुना है उसको पलटिये
01:23पुरुशों को दोश देने से कुछ नहीं होगा
01:24अपने आपको इनसान समझो और इनसान की नजर से देखो
01:28अपने आपको पुरुशों की नजर से देखना बंध करो
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