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Transcript
00:00औरत का सबसे बड़ा धर्म घर ग्रहस्ती ही होता है
00:04जो महिलाएं होती हैं में कहा ही यही जाता है कि तुम्हारा सरवोपरी धर्म तो ग्रहस्ती ही है
00:10आप जब ग्रहस्ती में हो न तो सड़त की धूल खाने से बच जाते हो
00:14दिल्ली की धूप में और धूल में वो सब करने की सोचो जो पुरुषवर्ग किया करता है दिन भर ताकि
00:20वो शाम को घर में कुछ पैसा ला सके
00:22ये सब कहानी करना बहुत आसान है कि महिलाई बिचारी तो ग्रहस्ती में बंदी है
00:26जब उन्हें ग्रहस्ती से आज बाहर निकलने का मौका मिलता भी है तो अधिकांश महिलाई निकलना बाहर चाहती ही नहीं
00:33कौन बाहर की दूल फाकेगा कौन बाहर की इतने कश्ट सहेगा और बाहर बहुत कश्ट हैं महिला अपनी दुश्मन स्वयम
00:40रही है
00:41ग्रहस्ती में बंधना उसको भी बहुत पसंद है
00:43तभी तो खूब पड़ी लिखी, सशक्त महिलाएं भी नौकरी औगरा छोड़ करके पसंद करती हैं कि घर पर ही बैठ
00:50जाओ
00:50मैं इस घर की महरानी हूँ
00:53ये बेचारगी का स्वांग छोड़ो, ये जिम्मेदारी से मूँ चुराने वाली बात है
00:57आप महिला पैदा हुई है, पुरुष पैदा हुए है, अपनी देखभाल करना आपका अपना दाईत है
01:02आप एडल्ट हैं और किसी वयस्क की जिम्मेदारी कोई दूसरा नहीं उठा सकता
01:06अगर पाती हो कि कष्ट में हो तो अपने जीवन का नियंत्र अपने हाथ में लो
01:11आप वास्ताव में अपनी बहतरी चाहती है तो कहिए मैं जिम्मेदारी उठाती हूं, जिंदगी मेरी है, मैं सोयमी से बहतर
01:17बनाऊगी
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