00:00लोकधर्म जो है मासेस का, कॉमन्स का, गीड का, ये गरीबी के कारणों में से एक और गरीबी को प्रोचाहिद
00:07करता है, लोकधर्म चलता रहे, इसके लिए भी जरूरी है, कि गरीब लोग बने रहे, जिसे को लोकधर्म कहते हो,
00:14उसमें बुद्धी विवेक के लिए बहुत कम
00:29लगाओ, तुम तो अंध शद्धा और अंध भक्ती करो, बुद्धी बुरी चीज होती है, तुम तो भक्ती करो, और वो
00:36भक्ती, जिसमें बुद्धी शामिल नहीं है, इनमें एक पड़ा मूनले है, भाग्यवादिता, कि भाई, अगर राम चाहेंगे, तो तुमारा काम
00:43हो
00:44जाते हैं, और नहीं लिखाओ अग तुम टितना भी कर दो तो नहीं होगा, इनसान कभी बहुत जान लगा करके,
00:51ना तो श्रम करता है, ना कभी अपनी असफलता है के वास्तवे कारणों की जात करता है, ना कभी बहुत
00:57बुद्धी लगा पाता है, उस श्रम करते हुए भी �
01:01पर उश्रम करता है पर उश्रम वैसे होता है जैसे कि बिचारे किसी पशु से श्रम कराया जा रहा है
01:07और जो जानता ही नहीं हो श्रम क्यों कर रहा है उस श्रम में बुद्धी विवेक शामिल नहीं होता था
01:11लोगधर्म में तो फसे रहने का मतलब है कि तुमारी गरीवी बनी
01:14भी रहेगी वास्तव में लोकधर्म की जिसने सचाई देख ली और लोकधर्म को छोड़ करके सचे धर्म के और आ
01:22गया था उसको एक फाइदा ही होगा कि उसी गरीबी दूर होने लगेगी पर लोकधर्म ने भगवान को क्या करा
01:27है कामना पूरती का साधन बना दिया है कि बाह
01:43भगवान के आगे हाँ जोड़ने ऐसे थोड़ी भगवान काम करते हैं भगवान तुम्हारी कामना पूरती के लिए नहीं है भगवान
01:50तुम्हारी निश्च कामना में है भगवान बाहर कहीं नहीं है तुम्हारे ही भीतर बैठे है और भगवान अलग से नहीं
01:57तुमसे बोल
02:01तुम्हारी ही जो सत्यनिष्ठा की आवाज है वही भगवान की आवाज है, तुम्हारी भिवेक की आवाज भगवान की आवाज है,
02:08सुना है ने जाते हरी धितदा दीनी ताकि मते आगे हर लीनी, तो भगवान भी तुम्हारी मती के माध्यम से
02:15ही तुम्हारा भलाया बुरा कर
02:17लोग अपनी मतिय नहीं चलाना जाते हैं, अपनी बुद्धी अपनी विवेक नहीं लगाओगे, अपनी जिम्मेदारी नहीं उठाओगे, तो कोई उपर
02:26ही ताकत आकर करके तुम्हारा कल्यार नहीं कर सकती।
02:28भगवान माने वो दृष्टी जो देख ले कि हमने भगवान को भी कामना पूर्ति का साधन बना दिया, और इन्हीं
02:34मजाकों से फिर गरीबी और पक्की हो जाती है, इन्हीं मजाकों से आदमी पुष्ट दर पुष्ट, पीडी दर पीडी गरीबी
02:41बना रहता है।
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