00:00सर जब शुरुवात में आप आ रहे थे तो मुझे ऐसा लगा कि बहुत सारे लोग होंगे टीका लगाये होंगे
00:06आप साथ में कोई न कोई गेरुआ वस्तरा पहने होंगे आशार ए गुरू लेकिन आपका पहनावा बहुत सरल है
00:13दूसरे वस्तर क्यों पहनूँ जब इन ही में दिन भर रहता हूँ तो आपके सामने आने के लिए मैं शुएत
00:20शाम गेरुआ कुछ भी धारण क्यों करूँ जिस भाशा में दिन भर बोलता हूँ आपके सामने भी भाशा बोलूँगा जो
00:28मत मेरा सदा रहता है आपके सामने भी
00:31तब ही तो जैसी हम जिन्दगी जी रहे हैं उसका उक्चार होगा न।
00:35मैं अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में घर में व्यापार में दुकान में समाज में जैसा हूं ऐसा हूं मेरा चल
00:43रहा है
00:43और फिर जब धर्म की बात आती है तो एक अलग दुनिया मैं उसमें प्रवेश कर जाता हूं थोड़ी देर
00:51बहां रहता हूं और फिर लौट आ जाता हूं अपनी ही पुरानी जिन्दगी में पुराने धर्रों पर पुराने केंद्र से
01:00तो हुआ क्या जीवन तो नहीं बदला ना जीवन नहीं बदला क्योंकि आपने एक वैकलपिक जीवन खड़ा कर दिया जिसमें
01:06आप जा करके थोड़ी देर के लिए शरण पनाह ले लेते हो और अपने आपको ये जता देते हो कि
01:11मैं धार्मिक हूं और वहां मुझे कुछ राह
01:27देखनी आई ना देखना है हमें इसी को बहतर बनाना है
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