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नीदरलैंड्स से भारत लौटी 1000 साल पुरानी चोल ताम्र पट्टिकाओं ने इतिहास और संस्कृति को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। पीएम नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान भारत को यह बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि मिली। लाइडेन प्लेट्स के नाम से मशहूर ये ऐतिहासिक तांबे की प्लेट्स चोल साम्राज्य, समुद्री व्यापार, धार्मिक सौहार्द और प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण रिकॉर्ड मानी जाती हैं। आखिर डच इन्हें भारत से क्यों ले गए थे और अब इनकी वापसी क्यों खास मानी जा रही है? इस वीडियो में जानिए चोल इतिहास, अनैमंगलम कॉपर प्लेट्स और पीएम मोदी के बयान से जुड़ी पूरी कहानी।

India has received a major cultural treasure during Prime Minister Narendra Modi’s visit to the Netherlands. The Dutch government officially returned the 1000-year-old Chola Copper Plates, also known as the Leiden Plates, which were taken out of India during the colonial era. These historic copper inscriptions are among the most important surviving records of the Chola Empire and reveal details about administration, trade, land grants, and religious harmony in medieval India. Why were these priceless artifacts taken to the Netherlands, and why is their return so significant today? Watch the full story and historical analysis in this video.

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Transcript
00:00करीब एक हजार साल पुरानी भारत की वो धरोहर जो सदियों तक विदेश की जमीन पर बंद रही अब आखिर
00:06कार वापिस अपने घर लोटाई है
00:09प्रधानमंत्री नरेंद्र मोधी की नीडलेंड्स यात्रा के दौरान भारत को एक ऐसी एतिहासिक विरासत मिली है जिसे सिर्फ तामबे की
00:16प्लेट्स कहना गलत होगा
00:18ये भारत के गौरव, चोल सामराज्य की ताकत और उस दौर की समरिध संस्कृती की जीती जागती कहानिया है
00:24नीडलेंड सरकार ने भारत को ग्यारावी सदी की अनै मंगलम ताम्र पटिकाहें लोटाई है
00:30इतिहास की दुनिया में इन्हें लाइडन प्लेट्स के नाम से जाना जाता है
00:34करीब 30 किलो वजन वाली ये तामबे की प्लेट्स चोल राजवंश के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में गिनी जाती है
00:41बताया जाता है कि करीब 200 साल पहले आपनिवेशिक दौर में डच इन्हें भारत से अपने साथ ले गए थे
00:48अब इतने लंबे इंतिजार के बाद इनकी वापसी हुई है
00:51इन तामर पट्टिकाओं की सबसे खास बात ये है कि ये सिर्फ कोई शिलालेक नहीं है बलकि उस दौर के
00:58शाही आदेशों का रिकॉर्ड है
01:00इसमें 21 बड़ी और 3 छोटी तामबे की प्लेट्स हैं जो एक विशाल गोलाकार तामबे की अंगूठी से जुड़ी हुई
01:07है
01:07इसी अंगूठी पर चोल सामराज्य की आधिकारिक मुहर बनी हुई है
01:11इसमें बैठा हुआ बाग चोल राजवंश का प्रतीक है
01:15साथ में दो मचलियां बनी हैं जो पांड्य राजवंश की जीत को दर्शाती है
01:19वही धनुष चेर राजवंश का प्रतीक माना जाता है
01:22इसके उपर शाही छत्र भी उकेरा गया है
01:25इन प्लेट्स पर दो भाशाओं में लिखावट दर्ज है
01:28संस्कृत भाशा ग्रंथ लिपी में लिखी गई है
01:31जिसमें चोल राजाओं का इतिहास और वन्शावली दर्ज है
01:35वही तमिल भाशा में जमीन, टैक्स, गाउं की सीमाएं
01:39और प्रशासन से जुड़ी जानकारियां लिखी गई है
01:41इतिहास कार मानते हैं कि ये दस्तावेज उस दौर के शासन और प्रशासन को समझने का सबसे मजबूत सबूत है
01:48इस कहानी की शुरुवात होती है तमिल नाडू के नागापटिनम से
01:52साल एक हजार पांच इसवी में श्री विजय सामराज्य के राजा ने वहां चूड़ा मनी विहार नाम का एक भव्य
01:59बौध मठ बनवाया था
02:00इस मठ के रख रखाओ के लिए चोल समराट राजराज चोल प्रथम ने अनयम अंगलम गाउं की पूरी आय और
02:07टैक्स उस मठ को दान करने का आदेश दिया था
02:09बाद में उनके बेटे राजेंद्र चोल प्रथम ने इस आदेश को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए तामबे की
02:16प्लेट्स पर खुदवाया
02:17इतिहासकारों के मुताबिक ये तामर पट्टिकाएं सिर्फ प्रशासनिक रिकॉर्ड नहीं है बलकि उस दौर के धार्मिक सौहार्द और दक्षिन भारत
02:25और दक्षिन पूर्व एशिया के बीच मजबूत व्यापारिक रिष्टे भी उस समय मौजूद थे
02:30फिर आया अपनिवेशिक दौर साल 1690 में डच इस्ट इंडिया कंपनी ने नागा पटिनम में अपना मुख्यालय बनाया इसी दौरान
02:39इन एतिहासिक पटिकाओं को भारत से बाहर ले जाया गया
02:42रिकॉर्ड बताते हैं कि फ्लोरेंटियस कैमपर नाम के एक डच अधिकारी ने इन्हें हासिल किया था और बाद में ये
02:48नीदरलैंड पहुँच गई
02:49अब जब ये धरोहर भारत लोटी है तो इसे सिर्फ एक सांस्कृतिक वापसी नहीं बलकि इतिहास की घर वापसी माना
02:56जा रहा है
02:57प्रधान मंत्री मोदी ने भी इसे भारत की विरासत और गौरव से जड़ा बड़ा पल बताया
03:03सदियों तक विदेश में रहने के बाद अब चोल सामराज्य की ये अमानत फिर से अपनी मिट्टी में लोट आई
03:08है

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