00:00करीब एक हजार साल पुरानी भारत की वो धरोहर जो सदियों तक विदेश की जमीन पर बंद रही अब आखिर
00:06कार वापिस अपने घर लोटाई है
00:09प्रधानमंत्री नरेंद्र मोधी की नीडलेंड्स यात्रा के दौरान भारत को एक ऐसी एतिहासिक विरासत मिली है जिसे सिर्फ तामबे की
00:16प्लेट्स कहना गलत होगा
00:18ये भारत के गौरव, चोल सामराज्य की ताकत और उस दौर की समरिध संस्कृती की जीती जागती कहानिया है
00:24नीडलेंड सरकार ने भारत को ग्यारावी सदी की अनै मंगलम ताम्र पटिकाहें लोटाई है
00:30इतिहास की दुनिया में इन्हें लाइडन प्लेट्स के नाम से जाना जाता है
00:34करीब 30 किलो वजन वाली ये तामबे की प्लेट्स चोल राजवंश के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में गिनी जाती है
00:41बताया जाता है कि करीब 200 साल पहले आपनिवेशिक दौर में डच इन्हें भारत से अपने साथ ले गए थे
00:48अब इतने लंबे इंतिजार के बाद इनकी वापसी हुई है
00:51इन तामर पट्टिकाओं की सबसे खास बात ये है कि ये सिर्फ कोई शिलालेक नहीं है बलकि उस दौर के
00:58शाही आदेशों का रिकॉर्ड है
01:00इसमें 21 बड़ी और 3 छोटी तामबे की प्लेट्स हैं जो एक विशाल गोलाकार तामबे की अंगूठी से जुड़ी हुई
01:07है
01:07इसी अंगूठी पर चोल सामराज्य की आधिकारिक मुहर बनी हुई है
01:11इसमें बैठा हुआ बाग चोल राजवंश का प्रतीक है
01:15साथ में दो मचलियां बनी हैं जो पांड्य राजवंश की जीत को दर्शाती है
01:19वही धनुष चेर राजवंश का प्रतीक माना जाता है
01:22इसके उपर शाही छत्र भी उकेरा गया है
01:25इन प्लेट्स पर दो भाशाओं में लिखावट दर्ज है
01:28संस्कृत भाशा ग्रंथ लिपी में लिखी गई है
01:31जिसमें चोल राजाओं का इतिहास और वन्शावली दर्ज है
01:35वही तमिल भाशा में जमीन, टैक्स, गाउं की सीमाएं
01:39और प्रशासन से जुड़ी जानकारियां लिखी गई है
01:41इतिहास कार मानते हैं कि ये दस्तावेज उस दौर के शासन और प्रशासन को समझने का सबसे मजबूत सबूत है
01:48इस कहानी की शुरुवात होती है तमिल नाडू के नागापटिनम से
01:52साल एक हजार पांच इसवी में श्री विजय सामराज्य के राजा ने वहां चूड़ा मनी विहार नाम का एक भव्य
01:59बौध मठ बनवाया था
02:00इस मठ के रख रखाओ के लिए चोल समराट राजराज चोल प्रथम ने अनयम अंगलम गाउं की पूरी आय और
02:07टैक्स उस मठ को दान करने का आदेश दिया था
02:09बाद में उनके बेटे राजेंद्र चोल प्रथम ने इस आदेश को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए तामबे की
02:16प्लेट्स पर खुदवाया
02:17इतिहासकारों के मुताबिक ये तामर पट्टिकाएं सिर्फ प्रशासनिक रिकॉर्ड नहीं है बलकि उस दौर के धार्मिक सौहार्द और दक्षिन भारत
02:25और दक्षिन पूर्व एशिया के बीच मजबूत व्यापारिक रिष्टे भी उस समय मौजूद थे
02:30फिर आया अपनिवेशिक दौर साल 1690 में डच इस्ट इंडिया कंपनी ने नागा पटिनम में अपना मुख्यालय बनाया इसी दौरान
02:39इन एतिहासिक पटिकाओं को भारत से बाहर ले जाया गया
02:42रिकॉर्ड बताते हैं कि फ्लोरेंटियस कैमपर नाम के एक डच अधिकारी ने इन्हें हासिल किया था और बाद में ये
02:48नीदरलैंड पहुँच गई
02:49अब जब ये धरोहर भारत लोटी है तो इसे सिर्फ एक सांस्कृतिक वापसी नहीं बलकि इतिहास की घर वापसी माना
02:56जा रहा है
02:57प्रधान मंत्री मोदी ने भी इसे भारत की विरासत और गौरव से जड़ा बड़ा पल बताया
03:03सदियों तक विदेश में रहने के बाद अब चोल सामराज्य की ये अमानत फिर से अपनी मिट्टी में लोट आई
03:08है