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यह वीडियो 04 मार्च 2026 को आचार्य प्रशांत द्वारा आयोजित "बोध प्रत्यूषा" सत्र से लिया गया है।

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Transcript
00:00जब जर्मनी लड़ाई लड़ रहा था, शुरू के दो साल, सीन साल, 39, 40, 41 तक, समर तक, जर्मनी को
00:08फ्यूल की, फूड की लगबग एक तिहाई सप्लाई USSR से ही आ रही थी, तो ये सब कुछ उसको USSR
00:15से ही मिल रहा था, वो एक दम ऐसे हो थे कि भाई है भाई भाई भाई भाई
00:29स्कालिन को जटका लग गया, बूल रहे हैं ये, दोस्त दोस्त ना रहा, यार यार ना रहा, जिंदगी हमें तेरा
00:35इतबार ना रहा, और लगभख कबजा करी लिया था हिटलर ने मॉस्कों के दरादे तक पहुंच गया था, रूस की
00:41लंबाई ने और सर्दियों ने बचा �
00:43दिया, सोवियत संग को, कुछ नहीं है, इस दुनिया में, अहंकार की दुनिया में, प्यार, वफा, निष्ठा जैसी कोई चीज
00:52नहीं होती, यहां बस एक चीज होती है, क्या, टाकत, जब रूस पर भी अटैक करा हिटलर ने, तो रूस
00:59का जो अम्यूनिशन आउटपुट �
01:02जर्मनी से उस वक्ट भी टीम गुना ज़ादा, पर क्यो अटैक कर लिया, क्योंकि वो अपनी ताकत दिखा नहीं रहे
01:07थे, अहंकार, अगर किसी को देखता है कि उसके पास ताकत है, पर ताकत दिखा नहीं रहे, तो सोचता है,
01:13वो कमजोर है, तो हिटलर ने क्या सोचा, कि �
01:15यह कमजोर है, ताकत प्रदर्शित करनी भी जरूरी है, ताकत का होना भी और ताकत का प्रदर्शित करना भी, यह
01:24दुनिया ऐसी है, सोते हुए, तो शेर के मुँ में भी अम्रिक अपने आप आके नहीं बैठ जाता, आप शेर
01:31भी हो, लेकिन अपनी ताकत दिखा नहीं रहे
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