00:00द्वार का, सोने की वो नगरी जहां धर्म का वास्था, लेकिन उस रात स्वण द्वारों के पीछे एक अद्रिश्य जंग
00:10छिड़ी थी, ये जंग हत्यारों की नहीं, मैं की थी.
00:17सुदर्शन चक्र, जिसे ब्रह्मांड का सबसे घातक अस्त्र कहा जाता है, पक्षी राज गरुड, जिसकी रफ्तार के सामने समय भी
00:26ठहर जाए, और देवी सत्य भामा, जिनकी सुन्दर्ता का कोई सानी ना था, इन तीनों को लग रहा था, कि
00:35भगवान श्री कृष्ण इनके
00:36बिना अधूरे हैं, लेकिन नियती ने कुछ और ही तैकर रखा था, द्वारका की देह्मीज पर एक ऐसा तूफान दस्तक
00:47देने वाला था, जिसकी आहट से ही त्रिलोक काप उठते हैं।
00:58सबसे पहले एहंकार ने दस्तक दी, भगवान के सबसे शक्तिशाली अस्त्र सुदर्शन चक्र के भीतर।
01:06शस्त्रागार की दीवारों को चीरती हुई सुदर्शन की चमक उसे ये भ्रम दे रही थी, कि वही श्रिष्टी का केंद्र
01:14है।
01:15उसे लगने लगा कि श्री कृष्टी की ख्याती उनकी अपनी नहीं, बलकि सुदर्शन के भाय की वज़ा से है।
01:22संसार श्री कृष्टी का सम्मान उनकी बासुरी के कारण नहीं, बलकि मेरे भाय के कारण करता है।
01:32अगर मैं न हूँ तो वे केवल एक साधारन ग्वाले हैं, मेरी यगनी ही उन्हें भगवान बनाती है।
01:40अहनकार केवल शस्त्रागार तक सीमित नहीं था, वो महलों के भीतर रानी सत्यभामा के कक्ष में भी प्रवीश कर चुका
01:49था।
01:50अपनी सुन्दर्ता और श्यमंतक मनी के एश्वर्य में पली बढ़ी सत्यभामा को लगने लगा कि उनके रूप के सामने साक्षात
02:00दीवी सीता का तेज भी भी भीका है।
02:04क्या सीता के पास ऐसा तेज था?
02:09अगर त्रिता युग में प्रभू श्री राम ने मुझे एक बार देख लिया होता तो शायद वे उन्हें भूल जाते।
02:17मेरा सौन्दर्य ही मेरी असली शक्ती है।
02:21वहीं द्वारका के आकाश में पक्षी राज गरुड अपने पंखों से बवंडर पैदा कर रहे थे।
02:29उन्हें अपनी गती का ऐसा नशा था के वे खुद को भगवान का सेवक नहीं बलकि उनका आधार समझने लगे
02:37थे।
02:39मेरी रफ्तार के बिना तो नारायन भी असहाई है।
02:46मैं की वल उनका वाहन नहीं उनकी गती का आधार हूँ।
02:52जब अपनों का एहंकार ही उनके पतन का मार्ग बनने लगे तो भगवान को लीला रचनी ही पढ़ती है।
03:01श्री कृष्ण ने सबसे पहले गरुड को बुलाया। गरुड को लगा कि शायद कोई बड़ा युद्ध होने वाला है।
03:09पर श्री कृष्ण की यूजना कुछ और ही थी।
03:14गरुड आप गंध मादन परवज जाईए। वहां मेरे परमभक्त हनुमान रहते हैं। उन्हें ससम्मान यहां लेकर आईए।
03:23श्री कृष्ण जानते थे कि हनुमान केवल राम नाम के अधीन है। इसलिए उन्होंने गरुड को एक विशेश निर्दीश दिया।
03:33सावधान रहिएगा गरुड। हनुमान जी से ये मत कहिएगा कि श्री कृष्ण ने बुलाया है। उनसे कहिएगा कि उनके स्वामी
03:44अयोध्या के राजा प्रभू श्री राम ने उन ही याद किया है। और वे उनका इंदजार कर रही है।
03:55गरुड गंधमादन परवत पर उतरते हैं। चारो ओर धू लोरती है। लेकिं वहाँ हनुमान जी ध्यान में मग्न है।
04:05गरुड ने वहाँ अपनी शक्ती का प्रदर्शन किया ताकि हनुमान जी उनकी गती से प्रभावित हो जाए। उन्हें लगा कि
04:15ये व्रिद्ध वानर उनके सामने टिक नहीं पाएगा।
04:19हनुमान जी प्रभूश्री राम ने आपको बुलाया है। आप व्रिद्ध हो गए हैं। आपको चलने में तो महीनों लगेंगे। आप
04:29मेरी पीठ पर बैठ जाएए। मैं आपको पलक जपकते ही द्वार का ले चलूँगा।
04:34प्रभूश्री राम का नाम सुनते ही हनुमान जी की आँखों में आसु आ गए। उन्होंने गरूड के भीतर के अहंकार
04:43को पढ़ लिया। उन्होंने मुस्कुरा कर गरूड को पहले प्रस्थान करने को कहा।
04:50पक्षी राज आप प्रस्थान कीजिए। मैं बस आपके पीछे ही आ रहा हूँ। गरूड मन ही मन हसने लगे। उन्हें
05:01लगा कि हनुमान जी अपनी जिद में बहुत पीछे छुट जाएंगे। वे अपनी पूरी शक्ती लगा कर द्वार का की
05:08ओरोडे।
05:09इधर द्वार का में श्री कृष्ण ने खेल का दूसरा पासा भेंका। उन्होंने सुदर्शन चक्र को बुलाया और उसे मुख्य
05:18द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया।
05:21श्री कृष्ण ने विशेश रूप से कहा कि बिना अनुमती कोई भी अंदर ना आए। सुदर्शन को लगा कि आज
05:30उसकी शक्ती की असली परीक्षा है।
05:33तब ही बिना किसी आहट के हनुमान वहाँ प्रकट हो गए। भक्ती की गती गरुड की भौतिक गती से कहीं
05:46तेज थी।
06:03एक खिलोने की तरह देखा।
06:07बालक हट मत कीजिए। मुझे मेरे श्री राम से मिलना है। मार्ग छोड़ दीजिए।
06:15सुदर्शन क्रोध में हनुमान जी पर जप्टा। पर जो हुआ उसकी कलपना किसी ने नहीं की थी।
06:24हनुमान जी ने फुर्ती से सुदर्शन को हाथ में पकड़ा और उसे अपने मुह में दबा लिया।
06:31सुदर्शन की सारी अगनी और घमंड हनुमान जी के मुह के भीतर शांत हो गए।
06:39कुछ देर बाद गरुड हाफते हुए और पसीने से लत्फत होकर दरबार में गिरे। पर वहां का दृष्य देखकर उनके
06:48होश ओड़ गए।
06:50हनुमान जी पहले से ही श्री कृष्ण के चरणों में बैठे थे।
06:55गरुड का गगन चुम्बी अहंकार पल भर में ढह गया। तभी श्री कृष्ण ने मुस्कुरा कर हनुमान जी के भूले
07:04हुए मुह का कारण पूछा।
07:06हनुमान जी ने अपना मुह खोला और सुदर्शन चक्र किसी साधारन पत्थर की तरहा फर्ष परागिरा।
07:15पूरी तरहा ठंडा और निस्तेज। लेकिन लीला अभी बाकी थी।
07:22श्री कृष्ण के कहने पर हनुमान जी रनिवास की ओर बढ़े।
07:26वहां सत्यभामा माता सीता का वेश धरकर भारी आभूशणों और अहंकार के साथ बैठी थी।
07:34उन्हें लगा कि हनुमान जी उनकी रूप को देखकर स्तुती करेंगे।
07:39लेकिन जैसे ही हनुमान जी कक्ष में प्रविष्ठ हुए, उन्होंने सत्यभामा को पूरी तरहां नजर अंदास कर दिया।
07:47उनकी लिए वो रूप और श्रिंगार कीवल एक दिखावा था।
07:52वी बिना प्रणाम किये, वापस दरबार लोट आए।
07:55प्रभू, क्षमा करें। आपने कहा था कि माता सीता बुला रही हैं, पर वहां सिंगहासन पर तो कोई दासी बैठी
08:07है।
08:08जिसने माता के वस्त्र और गहनी पहन रखे हैं।
08:12वो रूप तो है प्रभू, पर वो ममता कहां।
08:18मेरी असली माता सीता कहां है।
08:21मीरा हृते उन्हीं यहां नहीं पा रहा प्रभू।
08:25तब ही द्वार से साधारन साडी में माता रुकमिनी ने प्रवेश किया।
08:31उनके चहरे पर सेवा और भक्ती का वो तेच था, जिसे देखते ही हनुमान जी भावुक होकर उनके चरणों में
08:41गिर पड़े।
08:42यह देखकर सत्यभामा, गरुण और सुधर्शन तीनों के मस्दक लज्जा से जुग गए।
08:50उस रात द्वार का शुद्ध हो गई।
08:54गरुण की गती, सुधर्शन का बल और सत्यभामा का रूप सब भगवान की देन है।
09:02हमारा अपना कुछ भी नहीं। यह कथा हमें सिखाती है कि प्रभु के पास वही रह सकता है जो हनुमान
09:12है।
09:12अर्थात जिसमें मान यानि अहंकार का नाश हो चुका हो।
09:18याद रखीगा जहां राम है वहां मैं के लिए कोई जगा नहीं।
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