00:00अगर एक छोटा सा फानूस, एक कमजोर दिल में इमान की पूरी दुनिया रोशन कर दे, तो आईशा को लगता
00:06था रोजा सिर्फ भूख है, मगर एक रात ने इसकी सोच हमेशा के लिए बदल दी, ये कहानी रमजान की
00:12नहीं, इस रोशनी की है जो अल्ला इंसान के दिल में ज
00:28चाहता हो, वो सिर्फ ग्यारा बरस की थी, मगर इसके दिल में सवाल ऐसे थे, जो बड़ी उम्र के लोगों
00:33को भी परेशान कर देते हैं, वो जानना चाहती थी कि अबादत किया है, सबर किया है, और अल्ला ताला
00:39इनसान से आखिर चाहता किया है, रमजान की आमद से चंद �
00:43दिन पहले ही घर का माहौल बदलने लगा था, अमू के चहरे पर संजीदगी और महबत एक साथ जलक रही
00:49थी, और अबू की बातों में नर्मी के साथ एक खास थहराओ आ गया था, आईशा ये सब महसूस तो
00:55कर रही थी, मगर इसके दिल में एक अंजानी घबराहत भी थी, �
01:10जब आईशा ने दब्बा खोला तो इसकी सांस रुकसी गई, अंदर एक नहायत खुबसूरत रमजानी फानूस था, शीशे पर बने
01:17नक्ष ऐसे लग रहे थे, जैसे किसी ने सबर और यकीन को रंगों में कैद कर दिया हो, जब फानूस
01:22जलाया गया तो इसकी नर्म रोशन
01:37ना समझ सकी, मगर इसके दिल में कुछ हलका सा जरूर हिलने लगा, पहला रोजा दिल की पहली आजमाईश, रमजान
01:44का पहला दिन आया, सहरी में आईशा ने कम ही खाया था, मदरिसे पहुंची तो सूरच तेज था और दिन
01:50गेर मामूली तोर पर लंबा महसूस हो रहा था,
01:53जब वकफा हुआ तो हर तर्फ खाने की खुश्बू फैल गई, आईशा एक तर्फ बैठी रही, इसका पेट खाली था,
02:00हलक खुश्क और आखों में बेचैनी, इसके दिल से एक सवाल उभरा जिसे वो रोक ना सकी, आ अल्ला, मैं
02:07क्यो भूकी हूँ, क्या मेरा ये दुख �
02:09तुम तक पहुंचता है, घर पहुंचकर वो सीधी अपने कमरे में गई, फानूस जलाया और इसके सामने बैठ गई, आखों
02:16में नमी थी, अगर ये रोजा मुझे तुम्हारे करीब ले जाने के लिए है, इसने कामती आवाज में कहा, तो
02:22मुझे रास्ता दुखा दो, खाम
02:37उभरता जैसे दिल के अंदर कोई जंग चल रही हो, और कभी वो खुद से ही सवाल करती, क्या मैं
02:43वाकी अल्ला के लिए ये सब कर रही हूं, एक दिन किसी ने कह दिया, तुम तो अभी बच्ची हो,
02:49रोजे की क्या जरूरत है, ये जुमला तीर की तरह इसके दिल में लगा,
02:53इसी रात वो फानूस के सामने बैठ कर जारो कतार रोने लगे, आ अल्ला, अगर मैं कमजोर हूँ तो मुझे
02:59मजबूत बना दो, अगर मेरा दिल खाली है तो इसे अपने नूर से भर दो, इसी रमजान की एक रात
03:06अचानक बिजली चली गई, घर अंधेरे में डूब गया, �
03:12इसने जल्दी से फानूस जलाया, रोशनी फैली, और साथ ही एक अजीब सा सुकून, तब अबू कमरे में आये, फानूस
03:20को देखकर उनकी आखों में नमी आ गई, आईशा, अबू ने घीमी आवाज में कहा, ये फानूस तुम्हारी नानी का
03:26था, आईशा चौंग गई, न
03:32दुनिया अंधेरी लगने लगे तो अल्ला एक चूटी सी रोशनी भी काफी बना देता है, अबू ने लमहा भार को
03:38तवकुफ किया, फिर बोले, नानी ने अपनी जिन्दगी का सबसे तनहा और मुश्किल रमजान इसी फानूस के साथ गुजारा था,
03:45सब साथ छोड़ ग�
03:50आखों से आंसू बहने लगे, इसे महसूस हुआ जैसे फानूस में सिर्फ चराग नहीं, बलके दुआई, सबर और यकीन बंद
03:57हैं, इस रात के बाद आईशा बदलने लगी, अब भूक इसे तोड़ती नहीं थी, बलके जखना सिखाती थी, गुसा आता,
04:04मगर वो अल्ला को
04:05याद करके खामोश हो जाती, जब कोई पूछता, रोजा क्यों रखती हो, तो वो आहिस्ता से कहती, ताका मेरा दिल
04:13जिन्दा रह, हर रात फानूस जलता, और हर रात इसका दिल अल्ला के करीब होता गया, चांद रात आई, आईशा
04:21ने फानूस खिलकी के पास रखा, असमा
04:35इसकीन इबादत की जान, फानूस की रोशनी मध्धम थी, मगर आईशा के दिल में इमान का चराख पूरी आब और
04:41ताप से रोशन था, सबक
04:45रमजान इनसान को भूका नहीं, बलके जिन्दा करता है, जो दिल सबर, शुकर और यकीन से भर जाए, वो ही
04:52असल रोशनी पा लेता है