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Yeh kahani hai ek chhoti si bachi ki, jo Ramzan ke andheron mein ek fanoos ke zariye iman ki roshni dhoond leti hai. Bhook, aansu aur aazmaish ke beech, ek chhoti si roshni uske dil ko Allah ke aur qareeb le jaati hai.
Yeh sirf Ramzan ki kahani nahi… yeh har us dil ki kahani hai jo sabr aur yaqeen se zinda rehta hai. 🌙🕯️

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00:00अगर एक छोटा सा फानूस, एक कमजोर दिल में इमान की पूरी दुनिया रोशन कर दे, तो आईशा को लगता
00:06था रोजा सिर्फ भूख है, मगर एक रात ने इसकी सोच हमेशा के लिए बदल दी, ये कहानी रमजान की
00:12नहीं, इस रोशनी की है जो अल्ला इंसान के दिल में ज
00:28चाहता हो, वो सिर्फ ग्यारा बरस की थी, मगर इसके दिल में सवाल ऐसे थे, जो बड़ी उम्र के लोगों
00:33को भी परेशान कर देते हैं, वो जानना चाहती थी कि अबादत किया है, सबर किया है, और अल्ला ताला
00:39इनसान से आखिर चाहता किया है, रमजान की आमद से चंद �
00:43दिन पहले ही घर का माहौल बदलने लगा था, अमू के चहरे पर संजीदगी और महबत एक साथ जलक रही
00:49थी, और अबू की बातों में नर्मी के साथ एक खास थहराओ आ गया था, आईशा ये सब महसूस तो
00:55कर रही थी, मगर इसके दिल में एक अंजानी घबराहत भी थी, �
01:10जब आईशा ने दब्बा खोला तो इसकी सांस रुकसी गई, अंदर एक नहायत खुबसूरत रमजानी फानूस था, शीशे पर बने
01:17नक्ष ऐसे लग रहे थे, जैसे किसी ने सबर और यकीन को रंगों में कैद कर दिया हो, जब फानूस
01:22जलाया गया तो इसकी नर्म रोशन
01:37ना समझ सकी, मगर इसके दिल में कुछ हलका सा जरूर हिलने लगा, पहला रोजा दिल की पहली आजमाईश, रमजान
01:44का पहला दिन आया, सहरी में आईशा ने कम ही खाया था, मदरिसे पहुंची तो सूरच तेज था और दिन
01:50गेर मामूली तोर पर लंबा महसूस हो रहा था,
01:53जब वकफा हुआ तो हर तर्फ खाने की खुश्बू फैल गई, आईशा एक तर्फ बैठी रही, इसका पेट खाली था,
02:00हलक खुश्क और आखों में बेचैनी, इसके दिल से एक सवाल उभरा जिसे वो रोक ना सकी, आ अल्ला, मैं
02:07क्यो भूकी हूँ, क्या मेरा ये दुख �
02:09तुम तक पहुंचता है, घर पहुंचकर वो सीधी अपने कमरे में गई, फानूस जलाया और इसके सामने बैठ गई, आखों
02:16में नमी थी, अगर ये रोजा मुझे तुम्हारे करीब ले जाने के लिए है, इसने कामती आवाज में कहा, तो
02:22मुझे रास्ता दुखा दो, खाम
02:37उभरता जैसे दिल के अंदर कोई जंग चल रही हो, और कभी वो खुद से ही सवाल करती, क्या मैं
02:43वाकी अल्ला के लिए ये सब कर रही हूं, एक दिन किसी ने कह दिया, तुम तो अभी बच्ची हो,
02:49रोजे की क्या जरूरत है, ये जुमला तीर की तरह इसके दिल में लगा,
02:53इसी रात वो फानूस के सामने बैठ कर जारो कतार रोने लगे, आ अल्ला, अगर मैं कमजोर हूँ तो मुझे
02:59मजबूत बना दो, अगर मेरा दिल खाली है तो इसे अपने नूर से भर दो, इसी रमजान की एक रात
03:06अचानक बिजली चली गई, घर अंधेरे में डूब गया, �
03:12इसने जल्दी से फानूस जलाया, रोशनी फैली, और साथ ही एक अजीब सा सुकून, तब अबू कमरे में आये, फानूस
03:20को देखकर उनकी आखों में नमी आ गई, आईशा, अबू ने घीमी आवाज में कहा, ये फानूस तुम्हारी नानी का
03:26था, आईशा चौंग गई, न
03:32दुनिया अंधेरी लगने लगे तो अल्ला एक चूटी सी रोशनी भी काफी बना देता है, अबू ने लमहा भार को
03:38तवकुफ किया, फिर बोले, नानी ने अपनी जिन्दगी का सबसे तनहा और मुश्किल रमजान इसी फानूस के साथ गुजारा था,
03:45सब साथ छोड़ ग�
03:50आखों से आंसू बहने लगे, इसे महसूस हुआ जैसे फानूस में सिर्फ चराग नहीं, बलके दुआई, सबर और यकीन बंद
03:57हैं, इस रात के बाद आईशा बदलने लगी, अब भूक इसे तोड़ती नहीं थी, बलके जखना सिखाती थी, गुसा आता,
04:04मगर वो अल्ला को
04:05याद करके खामोश हो जाती, जब कोई पूछता, रोजा क्यों रखती हो, तो वो आहिस्ता से कहती, ताका मेरा दिल
04:13जिन्दा रह, हर रात फानूस जलता, और हर रात इसका दिल अल्ला के करीब होता गया, चांद रात आई, आईशा
04:21ने फानूस खिलकी के पास रखा, असमा
04:35इसकीन इबादत की जान, फानूस की रोशनी मध्धम थी, मगर आईशा के दिल में इमान का चराख पूरी आब और
04:41ताप से रोशन था, सबक
04:45रमजान इनसान को भूका नहीं, बलके जिन्दा करता है, जो दिल सबर, शुकर और यकीन से भर जाए, वो ही
04:52असल रोशनी पा लेता है

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